व्रज जय रिपुलोकं पादपद्मानतः
सन्गदित इति शिवेन श्लाघितो देवसंघ्- ।
ऐः निजगृहमथ गत्वा सादरं पाण्डुपुत्रो
धृतगुरुजयलक्ष्मीर्धर्मसूनुं ननाम ॥
व्रज जय रिपुलोकं पादपद्मानतः
सन्गदित इति शिवेन श्लाघितो देवसंघ्- ।
ऐः निजगृहमथ गत्वा सादरं पाण्डुपुत्रो
धृतगुरुजयलक्ष्मीर्धर्मसूनुं ननाम ॥
सन्गदित इति शिवेन श्लाघितो देवसंघ्- ।
ऐः निजगृहमथ गत्वा सादरं पाण्डुपुत्रो
धृतगुरुजयलक्ष्मीर्धर्मसूनुं ननाम ॥
अन्वयः
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"पादपद्मानतः सन् व्रज, रिपुलोकम् जय" इति शिवेन गदितः, देवसंघैः श्लाघितः पाण्डुपुत्रः अथ निजगृहम् गत्वा सादरम् धृतगुरुजयलक्ष्मीः (सन्) धर्मसूनुम् ननाम ।
English Summary
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"Go, and being bowed at my lotus feet, conquer the world of your enemies." Thus addressed by Shiva and praised by the hosts of gods, the son of Pandu (Arjuna) then went to his own abode. Bearing the great glory of victory, he respectfully bowed to the son of Dharma (Yudhishthira).
सारांश
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शिव से शत्रुओं पर विजय का आशीर्वाद पाकर और देवगणों द्वारा प्रशंसित होकर अर्जुन अपने निवास लौटे और विजयलक्ष्मी धारण कर धर्मराज युधिष्ठिर के चरणों में सादर प्रणाम किया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
व्रजेति ॥ शिवेन व्रज स्वपुरं गच्छारिलोकं जयेति गदित उक्तः। यतः पादपद्मानत: शिवपादपङ्कजानतः संस्तथा देवसंघै: श्लाधितः स्तुतोऽत एव धृता गुर्वी जयलक्ष्मीर्येन स पाण्डुपुत्रोऽर्जुनो निजगृहं स्वाश्रमं गत्वा प्राप्याथ सादरं यथा तथा धर्मसूनुं युधिष्ठिरं राजानं ननाम नमश्चक्रे
पदच्छेदः
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| व्रज | व्रज (√व्रज् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | Go |
| जय | जय (√जि कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | conquer |
| रिपुलोकम् | रिपु–लोक (२.१) | the world of enemies |
| पादपद्मानतः | पादपद्म–आनत (१.१) | bowed at the lotus feet |
| सन् | सत् (√अस्+शतृ, १.१) | being |
| गदितः | गदित (√गद्+क्त, १.१) | addressed |
| इति | इति | thus |
| शिवेन | शिव (३.१) | by Shiva |
| श्लाघितः | श्लाघित (√श्लाघ्+क्त, १.१) | praised |
| देवसंघैः | देव–संघ (३.३) | by the hosts of gods |
| निजगृहम् | निज–गृह (२.१) | his own abode |
| अथ | अथ | then |
| गत्वा | गत्वा (√गम्+क्त्वा) | having gone |
| सादरम् | सादरम् | respectfully |
| पाण्डुपुत्रः | पाण्डु–पुत्र (१.१) | the son of Pandu |
| धृतगुरुजयलक्ष्मीः | धृत–गुरु–जयलक्ष्मी (१.१) | bearing the great glory of victory |
| धर्मसूनुम् | धर्म–सूनु (२.१) | the son of Dharma (Yudhishthira) |
| ननाम | ननाम (√नम् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | bowed to |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्र | ज | ज | य | रि | पु | लो | कं | पा | द | प | द्मा | न | तः | स |
| न्ग | दि | त | इ | ति | शि | वे | न | श्ला | घि | तो | दे | व | सं | घैः |
| नि | ज | गृ | ह | म | थ | ग | त्वा | सा | द | रं | पा | ण्डु | पु | त्रो |
| धृ | त | गु | रु | ज | य | ल | क्ष्मी | र्ध | र्म | सू | नुं | न | ना | म |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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