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॥ अथ प्रथमः सर्गः ॥
१.१
श्रियः कुरूणामधिपस्य पालनीं
प्रजासु वृत्तिं यमयुङ्क्त वेदितुम् ।
स वर्णिलिङ्गी विदितः समाययौ
युधिष्ठिरं द्वैतवने वनेचरः ॥
सारांश AI कुरुराज दुर्योधन की राजलक्ष्मी और प्रजा-पालन की पद्धति जानने के लिए युधिष्ठिर द्वारा नियुक्त वनेचर समस्त वृत्तांत जानकर द्वैतवन में उनके पास लौट आया।
१.२
कृतप्रणामस्य महीं महीभुजे
जितां सपत्नेन निवेदयिष्यतः ।
न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं
प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः ॥
सारांश AI शत्रु द्वारा कपट से जीती गई पृथ्वी का समाचार सुनाने से पूर्व युधिष्ठिर को प्रणाम करते हुए उस वनेचर का मन विचलित नहीं हुआ, क्योंकि सच्चे हितैषी प्रिय लगने वाला असत्य नहीं बोलते।
१.३
द्विषां विघाताय विधातुमिच्छतो
रहस्यनुज्ञामधिगम्य भूभृतः ।
स सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनीं
विनिश्चितार्थामिति वाचमादधे ॥
सारांश AI शत्रुओं के विनाश की योजना बनाने के इच्छुक राजा युधिष्ठिर की एकांत में अनुमति पाकर उस वनेचर ने शब्द-सौष्ठव और अर्थ-गांभीर्य से युक्त सुनिश्चित वाणी में अपनी बात कही।
१.४
क्रियासु युक्तैर्नृप चारचक्षुषो
न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः ।
अतोऽर्हसि क्षन्तुमसाधु साधु वा
हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ॥
सारांश AI वह बोला, 'हे राजन! गुप्तचरों द्वारा स्वामियों को धोखा नहीं दिया जाना चाहिए। अतः मेरी कड़वी या मीठी बातों को क्षमा करें, क्योंकि हितकारी और मन को प्रिय लगने वाले वचन अत्यंत दुर्लभ हैं।'
१.५
स किंसखा साधु न शास्ति योऽधिपं
हितान्न यः संशृणुते स किंप्रभुः ।
सदानुकूलेषु हि कुर्वते रतिं
नृपेष्वमात्येषु च सर्वसम्पदः ॥
सारांश AI 'वह बुरा मित्र है जो राजा को उचित सलाह नहीं देता, और वह बुरा स्वामी है जो हितकारी बात नहीं सुनता। जहाँ राजा और मंत्री परस्पर अनुकूल होते हैं, वहाँ समस्त संपत्तियाँ निवास करती हैं।'
१.६
निसर्गदुर्बोधमबोधविक्लवाः
क्व भूपतीनां चरितं क्व जन्तवः ।
तवानुभावोऽयमबोधि यन्मया
निगूढतत्त्वं नयवर्त्म विद्विषाम् ॥
सारांश AI 'राजाओं का रहस्यमय चरित्र कहाँ और मुझ जैसा अज्ञानी प्राणी कहाँ? यह आपका ही प्रभाव है कि मैं शत्रुओं की उस अत्यंत गुप्त नीति-मार्ग को समझ पाया हूँ।'
१.७
विशङ्कमानो भवतः पराभवं
नृपासनस्थोऽपि वनाधिवासिनः ।
दुरोदरच्छद्मजितां समीहते
नयेन जेतुं जगतीं सुयोधनः ॥
सारांश AI 'सिंहासन पर बैठा दुर्योधन वनवासी आपसे पराजय की आशंका करता है। जुए के कपट से जीती गई पृथ्वी को अब वह नीति और सदाचार के माध्यम से जीतना चाहता है।'
१.८
तथापि जिह्मः स भवज्जिगीषया
तनोति शुभ्रं गुणसम्पदा यशः ।
समुन्नयन्भूतिमनार्यसंगमा-
द्वरं विरोधोऽपि समं महात्मभिः ॥
सारांश AI 'कुटिल स्वभाव का वह दुर्योधन आपसे श्रेष्ठता सिद्ध करने हेतु गुणों द्वारा उज्ज्वल यश का विस्तार कर रहा है। सज्जनों के साथ किया गया विरोध भी दुष्टों की संगति से श्रेष्ठ होता है।'
१.९
कृतारिषड्वर्गजयेन मानवी-
मगम्यरूपां पदवीं प्रपित्सुना ।
विभज्य नक्तंदिनमस्ततन्द्रिणा
वितन्यते तेन नयेन पौरुषम् ॥
सारांश AI 'काम-क्रोध आदि षड्रिपुओं को जीतकर वह मनु के दुर्गम मार्ग का अनुसरण कर रहा है। आलस्य को त्यागकर वह दिन-रात का विभाजन कर नीतिपूर्वक अपने पुरुषार्थ को बढ़ा रहा है।'
१.१०
सखीनिव प्रीतियुजोऽनुजीविनः
समानमानान्सुहृदश्च बन्धुभिः ।
स सन्ततं दर्शयते गतस्मयः
कृताधिपत्यामिव साधु बन्धुताम् ॥
सारांश AI 'वह अहंकार रहित होकर सेवकों को मित्रों के समान, मित्रों को परिजनों के समान और परिजनों को स्वयं के समान शासन में आदर प्रदान करता है।'
१.११
असक्तमाराधयतो यथायथं
विभज्य भक्त्या समपक्षपातया ।
गुणानुरागादिव सख्यमीयिवा-
न्न बाधतेऽस्य त्रिगणः परस्परम् ॥
सारांश AI 'आसक्ति रहित होकर वह धर्म, अर्थ और काम का उचित विभाजन कर सेवन करता है। उसके गुणों के कारण ये तीनों पुरुषार्थ परस्पर विरोध छोड़कर मित्रता के समान प्रतीत होते हैं।'
१.१२
निरत्ययं साम न दानवर्जितं
न भूरि दानं विरहय्य सत्क्रियाम् ।
प्रवर्तते तस्य विशेषशालिनी
गुणानुरोधेन विना न सत्क्रिया ॥
सारांश AI 'उसकी साम-नीति दान रहित नहीं होती और प्रचुर दान बिना सत्कार के नहीं दिया जाता। उसका विशेष सत्कार भी गुणों के सम्मान के बिना संपन्न नहीं होता है।'
१.१३
वसूनि वाञ्छन्न वशी न मन्युना
स्वधर्म इत्येव निवृत्तकारणः ।
गुरूपदिष्टेन रिपौ सुतेऽपि वा
निहन्ति दण्डेन स धर्मविप्लवम् ॥
सारांश AI 'वह काम या क्रोध के वश में होकर नहीं, अपितु केवल कर्तव्य मानकर दंड देता है। गुरु के उपदेशानुसार वह अपराधी शत्रु या पुत्र, दोनों को समान रूप से दंडित कर धर्म की रक्षा करता है।'
१.१४
विधाय रक्षान्परितः परेतरा-
नशङ्किताकारमुपैति शङ्कितः ।
क्रियापवर्गेष्वनुजीविसात्कृताः
कृतज्ञतामस्य वदन्ति सम्पदः ॥
सारांश AI 'वह सर्वत्र रक्षक नियुक्त कर स्वयं को निडर दिखाता है। कार्यों की सफलता पर सेवकों को प्रदान की गई प्रचुर धन-संपत्ति उसकी कृतज्ञता को स्वयं प्रकट करती है।'
१.१५
अनारतं तेन पदेषु लम्भिता
विभज्य सम्यग्विनियोगसत्क्रियाम् ।
फलन्त्युपायाः परिबृंहितायती-
रुपेत्य संघर्षमिवार्थसम्पदः ॥
सारांश AI 'उचित विधि से प्रयुक्त किए गए उसके साम-दान आदि उपाय निरंतर फलीभूत हो रहे हैं। उसकी भविष्य की योजनाएँ परस्पर प्रतिस्पर्धा करती हुई सी अपार सुख-संपदा प्रदान कर रही हैं।'
१.१६
अनेकराजन्यरथाश्वसंकुलं
तदीयमास्थाननिकेतनाजिरम् ।
नयत्ययुग्मच्छदगन्धिरार्द्रतां
भृशं नृपोपायनदन्तिनां मदः ॥
सारांश AI 'अनेक राजाओं के रथों और घोड़ों से भरे उसके राजमहल का आँगन, उपहार में आए हाथियों के सप्तपर्णी वृक्ष की सुगंध वाले मद-जल से सदैव गीला रहता है।'
१.१७
सुखेन लभ्या दधतः कृषीवलै-
रकृष्टपच्या इव सस्यसम्पदः ।
वितन्वति क्षेममदेवमातृका-
श्चिराय तस्मिन्कुरवश्चकासति ॥
सारांश AI 'कुरु देश अब वर्षा पर निर्भर न रहकर भी सुखी है। दुर्योधन के उत्तम प्रबंध के कारण वहां किसान बिना अधिक परिश्रम के पकी हुई फसलों वाली भूमि से वैभव प्राप्त कर रहे हैं।'
१.१८
महौजसो मानधना धनार्चिता
धनुर्भृतः संयति लब्धकीर्तयः ।
न संहतास्तस्य न भेदवृत्तयः
प्रियाणि वाञ्छन्त्यसुभिः समीहितुम् ॥
सारांश AI 'उसके पराक्रमी और स्वाभिमानी योद्धा धन और मान से संतुष्ट हैं। वे युद्ध में विजयी और परस्पर संगठित होकर अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी राजा का प्रिय करना चाहते हैं।'
१.१९
उदारकीर्तेरुदयं दयावतः
प्रशान्तबाधं दिशतोऽभिरक्षया ।
स्वयं प्रदुग्धेऽस्य गुणैरुपस्नुता
वसूपमानस्य वसूनि मेदिनी ॥
सारांश AI 'दयालु और रक्षक दुर्योधन के गुणों से द्रवित होकर यह पृथ्वी स्वयं कुबेर की भाँति इच्छित धन-धान्य प्रदान करती है, जिससे उसकी कीर्ति निरंतर बढ़ रही है।'
१.२०
महीभुजां सच्चरितैश्चरैः क्रियाः
स वेद निःशेसमशेषितक्रियः ।
महोदयैस्तस्य हितानुबन्धिभिः
प्रतीयते धातुरिवेहितं फलैः ॥
सारांश AI 'वह राजा गुप्तचरों के माध्यम से अन्य राजाओं के गुप्त कार्यों को भी जान लेता है। ब्रह्मा के संकल्प की भाँति उसके प्रयासों का पता केवल उनके सफल परिणामों से ही चलता है।'
१.२१
न तेन सज्यं क्वचिदुद्यतं धनु-
र्न वा कृतं कोपविजिह्ममाननम् ।
गुणानुरागेण शिरोभिरुह्यते
नराधिपैर्माल्यमिवास्य शासनम् ॥
सारांश AI दुर्योधन को अब धनुष उठाने या क्रोध प्रकट करने की आवश्यकता नहीं पड़ती; उसके गुणों के कारण अन्य राजा उसके शासन को माला की भाँति श्रद्धापूर्वक अपने सिर पर धारण करते हैं।
१.२२
स यौवराज्ये नवयौवनोद्धतं
निधाय दुःशासनमिद्धशासनः ।
मखेष्वखिन्नोऽनुमतः पुरोधसा
धिनोति हव्येन हिरण्यरेतसम् ॥
सारांश AI दुर्योधन ने शासन का भार युवराज दुःशासन को सौंपकर स्वयं को धार्मिक कार्यों में लगा लिया है; वह पुरोहितों की अनुमति से यज्ञों में हवि अर्पित कर अग्निदेव को प्रसन्न कर रहा है।
१.२३
प्रलीनभूपालमपि स्थिरायति
प्रशासदावारिधि मण्डलं भुवः ।
स चिन्तयत्येव भियस्त्वदेष्यती-
रहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता ॥
सारांश AI यद्यपि दुर्योधन निष्कंटक होकर समुद्र तक फैली पृथ्वी पर शासन कर रहा है, फिर भी वह आपसे होने वाले आगामी भय से चिंतित रहता है; बलवानों से शत्रुता का परिणाम अत्यंत दुखद होता है।
१.२४
कथाप्रसङ्गेन जनैरुदाहृता-
दनुस्मृताखण्डलसूनुविक्रमः ।
तवाभिधानाद्व्यथते नताननः
स दुःसहान्मन्त्रपदादिवोरगः ॥
सारांश AI बातचीत के दौरान जब कोई आपका नाम लेता है या अर्जुन के पराक्रम का स्मरण करता है, तो दुर्योधन असह्य मंत्र से पीड़ित सर्प की भाँति लज्जा से मुख नीचे कर व्यथित हो जाता है।
१.२५
तदाशु कर्तुं त्वयि जिह्ममुद्यते
विधीयतां तत्र विधेयमुत्तरम् ।
परप्रणीतानि वचांसि चिन्वतां
प्रवृत्तिसाराः खलु मादृशां धियः ॥
सारांश AI शत्रु द्वारा कपट की योजना बनाने पर आपको भी प्रतिकार हेतु उचित उपाय करना चाहिए; मुझ जैसे गुप्तचरों का काम केवल दूसरों के गुप्त वृत्तांत की सूचना देना मात्र है।
१.२६
इतीरयित्वा गिरमात्तसत्क्रिये
गतेऽथ पत्यौ वनसंनिवासिनाम् ।
प्रविश्य कृष्णा सदनं महीभुजा
तदाचचक्षेऽनुजसन्निधौ वचः ॥
सारांश AI वनचर के चले जाने पर युधिष्ठिर ने द्रौपदी के कक्ष में प्रवेश किया और अपने भाइयों की उपस्थिति में वह सारा समाचार सुनाया जो गुप्तचर ने दुर्योधन के विषय में बताया था।
१.२७
निशम्य सिद्धिं द्विषतामपाकृती-
स्ततस्ततस्त्या विनियन्तुमक्षमा ।
नृपस्य मन्युव्यवसायदीपिनी-
रुदाजहार द्रुपदात्मजा गिरः ॥
सारांश AI शत्रुओं की सफलता और अपनी दुर्दशा का वृत्तांत सुनकर द्रौपदी अत्यंत दुखी हुई और राजा युधिष्ठिर के क्रोध एवं उत्साह को जाग्रत करने के लिए ओजपूर्ण वचन कहने लगी।
१.२८
भवादृशेषु प्रमदाजनोदितं
भवत्यधिक्षेप इवानुशासनम् ।
तथापि वक्तुं व्यवसाययन्ति मां
निरस्तनारीसमया दुराधयः ॥
सारांश AI आप जैसे विद्वानों को नारी द्वारा उपदेश दिया जाना अपमान के समान है, किंतु मेरी असहनीय मानसिक पीड़ाएं मुझे स्त्री-ोचित मर्यादा त्यागकर बोलने के लिए विवश कर रही हैं।
१.२९
अखण्डमाखण्डलतुल्यधामभि-
श्चिरं धृता भूपतिभिः स्ववंशजैः ।
त्वया स्वहस्तेन मही मदच्युता
मतङ्गजेन स्रगिवापवर्जिता ॥
सारांश AI आपके पूर्वजों द्वारा लंबे समय तक अखंड रूप से भोगी गई इस पृथ्वी को आपने अपने हाथों से वैसे ही त्याग दिया, जैसे कोई मदमत्त हाथी अपनी माला को उतार फेंकता है।
१.३०
व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं
भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ।
प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधा-
नसंवृताङ्गान्निशिता इवेषवः ॥
सारांश AI वे लोग पराजय को प्राप्त होते हैं जो कपटियों के साथ कपट का व्यवहार नहीं करते; धूर्त लोग सीधे-साधे व्यक्तियों के हृदय में प्रवेश कर तीखे बाणों की भाँति उन्हें नष्ट कर देते हैं।
१.३१
गुणानुरक्तामनुरक्तसाधनः
कुलाभिमानी कुलजां नराधिपः ।
परैस्त्वदन्यः क इवापहारये-
न्मनोरमामात्मवधूमिव श्रियम् ॥
सारांश AI अपनी उस राज्यलक्ष्मी को, जो एक कुलीन और पतिव्रता स्त्री के समान गुणों से युक्त है, आपके अतिरिक्त और कौन स्वाभिमानी राजा शत्रुओं के हाथों में जाने देता?
१.३२
भवन्तमेतर्हि मनस्विगर्हिते
विवर्तमानं नरदेव वर्त्मनि ।
कथं न मन्युर्ज्वलयत्युदीरितः
शमीतरुं शुष्कमिवाग्निरुच्छिखः ॥
सारांश AI मनस्वियों द्वारा निंदित इस दीन अवस्था में आपको देखकर आपका क्रोध वैसे क्यों नहीं प्रज्वलित होता, जैसे अग्नि सूखे हुए शमी वृक्ष को जलाकर भस्म कर देती है?
१.३३
अवन्ध्यकोपस्य निहन्तुरापदां
भवन्ति वश्याः स्वयमेव देहिनः ।
अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना
न जातहार्देन न विद्विषादरः ॥
सारांश AI सफल क्रोध वाले व्यक्ति के सभी प्राणी स्वयं ही वश में हो जाते हैं; परंतु क्रोधहीन व्यक्ति से न तो कोई मित्र के रूप में स्नेह करता है और न ही शत्रु के रूप में डरता है।
१.३४
परिभ्रमंल्लोहितचन्दनोचितः
पदातिरन्तर्गिरि रेणुरूषितः ।
महारथः सत्यधनस्य मानसं
दुनोति ते कच्चिदयं वृकोदरः ॥
सारांश AI लाल चंदन के योग्य और सदा रथ पर चलने वाले भीम को धूल से धूसरित होकर पर्वतों में पैदल भटकते देखकर क्या आपके मन में तनिक भी पीड़ा नहीं होती?
१.३५
विजित्य यः प्राज्यमयच्छदुत्तरा-
न्कुरूनकुप्यं वसु वासवोपमः ।
स वल्कवासांसि तवाधुनाहर-
न्करोति मन्युं न कथं धनंजयः ॥
सारांश AI इंद्र के समान पराक्रमी अर्जुन, जिसने उत्तर कुरु प्रदेश को जीतकर अपार स्वर्ण भंडार जुटाया था, उसे आज वल्कल वस्त्र लाते देखकर क्या आपको क्रोध नहीं आता?
१.३६
वनान्तशय्याकठिनीकृताकृती
कचाचितौ विष्वगिवागजौ गजौ ।
कथं त्वमेतौ धृतिसंयमौ यमौ
विलोकयन्नुत्सहसे न बाधितुम् ॥
सारांश AI वन की कठोर भूमि पर सोने के कारण जिनका शरीर सख्त हो गया है और बाल बिखर गए हैं, उन नकुल और सहदेव की दुर्दशा देखकर भी आप अपना धैर्य कैसे नहीं छोड़ते?
१.३७
इमामहं वेद न तावकीं धियं
विचित्ररूपाः खलु चित्तवृत्तयः ।
विचिन्तयन्त्या भवदापदं परां
रुजन्ति चेतः प्रसभं ममाधयः ॥
सारांश AI मैं आपकी इस शांत बुद्धि को समझ पाने में असमर्थ हूँ; वास्तव में चित्तवृत्तियाँ अत्यंत विचित्र होती हैं। आपकी विपत्तियों के विचार मात्र से मेरा हृदय अत्यंत व्यथित हो रहा है।
१.३८
पुराधिरूढः शयनं महाधनं
विबोध्यसे यः स्तुतिगीतिमङ्गलैः ।
अदभ्रदर्भामधिशय्य स स्थलीं
जहासि निद्रामशिवैः शिवारुतैः ॥
सारांश AI जो आप पहले स्तुति-पाठकों के मंगल गीतों से सुखद शय्या पर जागते थे, वे ही अब कुशों वाली कठोर भूमि पर सोकर गीदड़ों के अमंगलकारी स्वर से जागने को विवश हैं।
१.३९
पुरोपनीतं नृप रामणीयकं
द्विजातिशेषेण यदेतदन्धसा ।
तदद्य ते वन्यफलाशिनः परं
परैति कार्श्यं यशसा समं वपुः ॥
सारांश AI ब्राह्मणों के भोजन के पश्चात बचे हुए श्रेष्ठ अन्न से पुष्ट आपका वह दिव्य शरीर अब केवल जंगली फल खाकर आपके यश के साथ-साथ क्षीण होता जा रहा है।
१.४०
अनारतं यौ मणिपीठशायिना-
वरञ्जयद्राजशिरःस्रजां रजः ।
निषीदतस्तौ चरणौ वनेषु ते
मृगद्विजालूनशिखेषु बर्हिषाम् ॥
सारांश AI आपके जो चरण पहले स्वर्ण पीठिका पर विराजे हुए राजाओं के मुकुटों की धूल से रंजित होते थे, वे ही अब मृगों द्वारा कुतरी गई तीक्ष्ण कुशों वाली भूमि पर पड़ रहे हैं।
१.४१
द्विषन्निमित्ता यदियं दशा ततः
समूलमुन्मूलयतीव मे मनः ।
परैरपर्यासितवीर्यसम्पदां
पराभवोऽप्युत्सव एव मानिनाम् ॥
सारांश AI शत्रुओं के कारण हुई यह दुर्दशा मेरे मन को व्यथित कर रही है। जिन स्वाभिमानियों का पराक्रम शत्रुओं द्वारा दबाया न जा सके, उनके लिए हार भी उत्सव के समान है।
१.४२
विहाय शान्तिं नृप धाम तत्पुनः
प्रसीद संधेहि वधाय विद्विषाम् ।
व्रजन्ति शत्रूनवधूय निःस्पृहाः
शमेन सिद्धिं मुनयो न भूभृतः ॥
सारांश AI हे राजन! शांति को त्यागकर शत्रुओं के नाश के लिए पुनः तेज धारण करें। शांति से सिद्धि मुनि प्राप्त करते हैं, राजा नहीं।
१.४३
पुरःसरा धामवतां यशोधनाः
सुदुःसहं प्राप्य निकारमीदृशम् ।
भवादृशाश्चेदधिकुर्वते परा-
न्निराश्रया हन्त हता मनस्विता ॥
सारांश AI यदि यश को धन मानने वाले आप जैसे तेजस्वी पुरुष भी ऐसे घोर अपमान को सह लेंगे, तो स्वाभिमान सदा के लिए निराश्रय होकर नष्ट हो जाएगा।
१.४४
अथ क्षमामेव निरस्तसाधन-
श्चिराय पर्येषि सुखस्य साधनम् ।
विहाय लक्ष्मीपतिलक्ष्म कार्मुकं
जटाधरः सञ्जुहुधीह पावकम् ॥
सारांश AI यदि आप युद्ध के साधनों को त्यागकर क्षमा को ही सुख का साधन मानते हैं, तो राजसी धनुष छोड़कर जटाएँ धारण करें और वन में अग्निहोत्र करें।
१.४५
न समयपरिरक्षणं क्षमं ते
निकृतिपरेषु परेषु भूरिधाम्नः ।
अरिषु हि विजयार्थिनः क्षितीशा
विदधति सोपधि संधिदूषणानि ॥
सारांश AI कपटी शत्रुओं के प्रति प्रतिज्ञा का पालन करना आपके जैसे तेजस्वी के लिए उचित नहीं है। विजयी राजा शत्रुओं के विरुद्ध युक्ति से संधि भंग कर देते हैं।
१.४६
विधिसमयनियोगाद्दीप्तिसंहारजिह्मं
शिथिलबलमगाधे मग्नमापत्पयोधौ ।
रिपुतिमिरमुदस्योदीयमानं दिनादौ
दिनकृतमिव लक्ष्मीस्त्वां समभ्येतु भूयः ॥
सारांश AI जैसे सूर्य अंधकार को मिटाकर पुनः उदित होता है, वैसे ही आप भी शत्रु रूपी अंधकार को नष्ट कर विपत्ति के सागर से निकलकर पुनः राजलक्ष्मी प्राप्त करें।
॥ इति प्रथमः सर्गः ॥
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