इतीरयित्वा गिरमात्तसत्क्रिये
गतेऽथ पत्यौ वनसंनिवासिनाम् ।
प्रविश्य कृष्णा सदनं महीभुजा
तदाचचक्षेऽनुजसन्निधौ वचः ॥
इतीरयित्वा गिरमात्तसत्क्रिये
गतेऽथ पत्यौ वनसंनिवासिनाम् ।
प्रविश्य कृष्णा सदनं महीभुजा
तदाचचक्षेऽनुजसन्निधौ वचः ॥
गतेऽथ पत्यौ वनसंनिवासिनाम् ।
प्रविश्य कृष्णा सदनं महीभुजा
तदाचचक्षेऽनुजसन्निधौ वचः ॥
सारांश
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वनचर के चले जाने पर युधिष्ठिर ने द्रौपदी के कक्ष में प्रवेश किया और अपने भाइयों की उपस्थिति में वह सारा समाचार सुनाया जो गुप्तचर ने दुर्योधन के विषय में बताया था।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
इतीति ॥ वनसंनिवासिनां पत्यौ वनेचराधिप इति गिरमीरयित्वोक्त्वात्तसत्क्रिये गृहीतपारितोषिके गते सति। ‘तुष्टिदानमेव चाराणां हि वेतनम्। ते हि लोभात्स्वामिकार्येष्वतीव त्वरयन्ते' इति नीतिवाक्यामृते । अथ महीभुजा राज्ञा कृष्णासदनं द्रौपदीभवनं प्रविश्यानुजसंनिधौ तद्वनेचरोक्तं वचो वाक्यमाचचक्ष आख्यातम् । अथवा। कृष्णेति पदच्छेदः । सदनं प्रविश्यानुजसंनिधौ तद्वचः कृष्णाचचक्ष आख्याता । चक्षिङो दुःहादेर्द्विकर्मकत्वादप्रधाने कर्मणि लिट् ॥ ।
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ती | र | यि | त्वा | गि | र | मा | त्त | स | त्क्रि | ये |
| ग | ते | ऽथ | प | त्यौ | व | न | सं | नि | वा | सि | नाम् |
| प्र | वि | श्य | कृ | ष्णा | स | द | नं | म | ही | भु | जा |
| त | दा | च | च | क्षे | ऽनु | ज | स | न्नि | धौ | व | चः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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