कृतप्रणामस्य महीं महीभुजे
जितां सपत्नेन निवेदयिष्यतः ।
न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं
प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः ॥
कृतप्रणामस्य महीं महीभुजे
जितां सपत्नेन निवेदयिष्यतः ।
न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं
प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः ॥
जितां सपत्नेन निवेदयिष्यतः ।
न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं
प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः ॥
अन्वयः
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सपत्नेन जितां महीं महीभुजे निवेदयिष्यतः, कृतप्रणामस्य तस्य मनः न विव्यथे। हि हितैषिणः मृषा प्रियं प्रवक्तुम् न इच्छन्ति।
English Summary
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The mind of that forest-dweller, who had paid his respects and was about to report to the king (Yudhishthira) about the earth conquered by the enemy, was not perturbed. For, well-wishers do not wish to speak what is pleasant but false.
सारांश
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शत्रु द्वारा कपट से जीती गई पृथ्वी का समाचार सुनाने से पूर्व युधिष्ठिर को प्रणाम करते हुए उस वनेचर का मन विचलित नहीं हुआ, क्योंकि सच्चे हितैषी प्रिय लगने वाला असत्य नहीं बोलते।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
कृतप्रणामस्येति ॥ कृतप्रणामस्य तत्कालोचितत्वात्कृतनमस्कारस्य सपत्नेन रिपुणा दुर्योधनेन ।
रिपौ वैरिसपत्नारिद्विषद्द्वेषणदुर्हृदः इत्यमरः (अमरकोशः २.८.१० ) । जितां स्वायत्तीकृतां महीं महीभुजे युधिष्ठिराय । क्रियाग्रहणात्सम्प्रदानत्वम् । निवेदयिष्यतो ज्ञापयिष्यतः । लृटः सद्धा इति शतृप्रत्ययः । तस्य वनेचरस्य मनो न विव्यथे। कथमीदृगप्रियं राज्ञे विज्ञापयामीति मनसि न चचालेत्यर्थः । व्यथ भयचलन्त्यो: इति धातोर्लिट् । उक्तमर्थमर्थान्तरन्यासेन समर्थयतेन हीति । हि यस्मात् । हितमिच्छन्तीति हितैषिणः स्वामिहितार्थिनः पुरुषा मृषा मिथ्याभूतं प्रियं प्रवक्तुं नेच्छन्ति । अन्यथा कार्यविघातकतया स्वामिद्रोहिणः स्युरिति भावः। अमौढ्यममान्द्यममृषाभाषित्वमभ्यूहकत्वं चेति चारगुणाः इति नीतिवाक्यामृते ॥ तथापि प्रियार्हे राज्ञि कटुनिष्ठुरोक्तिर्न युक्तेत्याशङ्क्य स्वाम्यनुज्ञया न दुष्यतीत्याशयेनाह
पदच्छेदः
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| कृतप्रणामस्य | कृत (√कृ+क्त)–प्रणाम–कृतप्रणाम (६.१) | of him who had paid obeisance |
| महीम् | मही (२.१) | the earth |
| महीभुजे | महीभुज् (४.१) | to the king |
| जिताम् | जिता (√जि+क्त, २.१) | conquered |
| सपत्नेन | सपत्न (३.१) | by the rival |
| निवेदयिष्यतः | निवेदयिष्यत् (नि√विद्+णिच्+श्य+शतृ, ६.१) | of him who was about to report |
| न | न | not |
| विव्यथे | विव्यथे (√व्यथ् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was perturbed |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| मनः | मनस् (१.१) | mind |
| न | न | not |
| हि | हि | for |
| प्रियम् | प्रिय (२.१) | what is pleasant |
| प्रवक्तुम् | प्रवक्तुम् (प्र√वच्+तुमुन्) | to speak |
| इच्छन्ति | इच्छन्ति (√इष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | wish |
| मृषा | मृषा | falsely |
| हितैषिणः | हितैषिन् (१.३) | well-wishers |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृ | त | प्र | णा | म | स्य | म | हीं | म | ही | भु | जे |
| जि | तां | स | प | त्ने | न | नि | वे | द | यि | ष्य | तः |
| न | वि | व्य | थे | त | स्य | म | नो | न | हि | प्रि | यं |
| प्र | व | क्तु | मि | च्छ | न्ति | मृ | षा | हि | तै | षि | णः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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