निसर्गदुर्बोधमबोधविक्लवाः
क्व भूपतीनां चरितं क्व जन्तवः ।
तवानुभावोऽयमबोधि यन्मया
निगूढतत्त्वं नयवर्त्म विद्विषाम् ॥
निसर्गदुर्बोधमबोधविक्लवाः
क्व भूपतीनां चरितं क्व जन्तवः ।
तवानुभावोऽयमबोधि यन्मया
निगूढतत्त्वं नयवर्त्म विद्विषाम् ॥
क्व भूपतीनां चरितं क्व जन्तवः ।
तवानुभावोऽयमबोधि यन्मया
निगूढतत्त्वं नयवर्त्म विद्विषाम् ॥
अन्वयः
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निसर्ग-दुर्बोधं भूपतीनां चरितं क्व, अबोध-विक्लवाः जन्तवः क्व। यत् मया विद्विषां निगूढ-तत्त्वं नय-वर्त्म अबोधि, अयं तव अनुभावः।
English Summary
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What a vast difference between the conduct of kings, which is by nature hard to understand, and creatures like me, who are confounded by ignorance! That I have been able to comprehend the enemy's policy, whose essence is deeply concealed, is due to your majesty's power.
सारांश
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'राजाओं का रहस्यमय चरित्र कहाँ और मुझ जैसा अज्ञानी प्राणी कहाँ? यह आपका ही प्रभाव है कि मैं शत्रुओं की उस अत्यंत गुप्त नीति-मार्ग को समझ पाया हूँ।'
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
निसर्गेति ॥ निसर्गदुर्बोधं स्वभावदुर्ग्रहम् । ईषद्दु:—' इत्यादिना खल्प्रत्ययः । भूपतीनां चरितं क्व । अबोधविक्लवा अज्ञानोपहृता जन्तवः । मादृशाः पामरजना,इत्यर्थः। क्व । नोभयं संघटत इत्यर्थः । तथापि निगूढतत्त्वं संवृतयाथार्थ्यं विद्विषाँ नयवर्त्म षाङ्गुण्यप्रयोगः 'संधिविग्रहयानानि संस्थाप्यासनमेव च । द्वैधीभावश्च विज्ञेयाः षङ्गुणा नीतिवेदिनाम् ॥' इत्यादिरूपो यन्मयावेदि । ज्ञातमिति यावत् । विदेः कर्मणि लुङ्। अयम् । इदं वेदनमित्यर्थः । विधेयप्राधान्यात्पुंलिङ्गनिर्देशः । तवानुभावः सामर्थ्यम् । अनुगतो भावोऽनुभाव इति घञन्तेन प्रादिसमासः । न तूपसृष्टाद्धञ्प्रत्ययः ।
श्रिणीभुवोऽनुपसर्गे (अष्टाध्यायी ३.३.२४ ) इत्यनुपसर्गाद्भवतेर्धातोर्धञ्विविधानात् । अतएव काशिकायमू-'कथं प्रभावो राज्ञां प्रकृष्टो भाव इति प्रादिसमासः' इति । दोषपरिहारौ सम्यग्ज्ञात्वैव विज्ञापयामि । न तु वृथा कर्णकठोरं प्रलपामीत्याशयः ॥ संप्रति यद्वक्तव्यं तदाह
पदच्छेदः
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| निसर्गदुर्बोधम् | निसर्ग–दुर्बोध–निसर्गदुर्बोध (१.१) | by nature difficult to understand |
| अबोधविक्लवाः | अबोध–विक्लव–अबोधविक्लव (१.३) | confounded by ignorance |
| क्व | क्व | where |
| भूपतीनाम् | भूपति (६.३) | of kings |
| चरितम् | चरित (१.१) | the conduct |
| क्व | क्व | where |
| जन्तवः | जन्तु (१.३) | (lowly) creatures |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| अनुभावः | अनुभाव (१.१) | power |
| अयम् | इदम् (१.१) | this is |
| अबोधि | अबोधि (√बुध् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was understood |
| यत् | यत् | that |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| निगूढतत्त्वम् | निगूढ (नि√गुह्+क्त)–तत्त्व–निगूढतत्त्व (२.१) | whose essence is concealed |
| नयवर्त्म | नय–वर्त्मन्–नयवर्त्मन् (२.१) | the path of policy |
| विद्विषाम् | विद्विष् (६.३) | of the enemies |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | स | र्ग | दु | र्बो | ध | म | बो | ध | वि | क्ल | वाः |
| क्व | भू | प | ती | नां | च | रि | तं | क्व | ज | न्त | वः |
| त | वा | नु | भा | वो | ऽय | म | बो | धि | य | न्म | या |
| नि | गू | ढ | त | त्त्वं | न | य | व | र्त्म | वि | द्वि | षाम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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