अनारतं तेन पदेषु लम्भिता
विभज्य सम्यग्विनियोगसत्क्रियाम् ।
फलन्त्युपायाः परिबृंहितायती-
रुपेत्य संघर्षमिवार्थसम्पदः ॥
अनारतं तेन पदेषु लम्भिता
विभज्य सम्यग्विनियोगसत्क्रियाम् ।
फलन्त्युपायाः परिबृंहितायती-
रुपेत्य संघर्षमिवार्थसम्पदः ॥
विभज्य सम्यग्विनियोगसत्क्रियाम् ।
फलन्त्युपायाः परिबृंहितायती-
रुपेत्य संघर्षमिवार्थसम्पदः ॥
अन्वयः
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तेन पदेषु सम्यक् विभज्य, विनियोग-सत्क्रियां लम्भिताः उपायाः, परिबृंहित-आयतीः अर्थ-सम्पदः संघर्षम् उपेत्य इव, अनारतं फलन्ति।
English Summary
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The four political expedients (sama, dana, bheda, danda), employed by him constantly and appropriately in their respective spheres after due deliberation, yield ever-increasing wealth and prosperity, as if vying with one another.
सारांश
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'उचित विधि से प्रयुक्त किए गए उसके साम-दान आदि उपाय निरंतर फलीभूत हो रहे हैं। उसकी भविष्य की योजनाएँ परस्पर प्रतिस्पर्धा करती हुई सी अपार सुख-संपदा प्रदान कर रही हैं।'
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अनारतमिति ॥ तेन राज्ञा पदेषुपादेयवस्तुषु।
पदं व्यवसितत्राणस्थानलक्ष्माङ्घ्रिवस्तुषु इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१०१ ) । सम्यगसंकीर्णमव्यस्तं च विभज्य विचिच्य। विनियोग एव सत्क्रियानुग्रहः । सत्कार इति यावत् । यासां ता लम्भिताः । स्थानेषु सम्यक्प्रयुक्ता इत्यर्थः । उपायाः सामादयः । संघर्षं परस्परस्पर्धामुपेत्येवेत्युत्प्रेक्षा । परिबृंहितायतीः प्रचितोत्तरकालाः । स्थिरा इत्यर्थः । अर्थसंपदोऽनारतमजस्रं फलन्ति । प्रसुवत इत्यर्थः ॥ अर्थसंपदमेवाह
पदच्छेदः
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| अनारतम् | अनारतम् | constantly |
| तेन | तद् (३.१) | by him |
| पदेषु | पद (७.३) | in their proper spheres |
| लम्भिताः | लम्भित (√लभ्+णिच्+क्त, १.३) | employed |
| विभज्य | विभज्य (वि√भज्+ल्यप्) | having deliberated |
| सम्यक् | सम्यक् | properly |
| विनियोगसत्क्रियाम् | विनियोगसत्क्रिया (२.१) | with proper application |
| फलन्ति | फलन्ति (√फल् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | yield |
| उपायाः | उपाय (१.३) | the means (of policy) |
| परिबृंहितायतीः | परिबृंहित (परि√बृंह्+क्त)–आयति–परिबृंहितायति (२.३) | with ever-increasing future results |
| उपेत्य | उपेत्य (उप√इ+ल्यप्) | having entered into |
| संघर्षम् | संघर्ष (२.१) | a rivalry |
| इव | इव | as if |
| अर्थसम्पदः | अर्थसम्पद् (२.३) | riches and prosperity |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ना | र | तं | ते | न | प | दे | षु | ल | म्भि | ता |
| वि | भ | ज्य | स | म्य | ग्वि | नि | यो | ग | स | त्क्रि | याम् |
| फ | ल | न्त्यु | पा | याः | प | रि | बृं | हि | ता | य | ती |
| रु | पे | त्य | सं | घ | र्ष | मि | वा | र्थ | स | म्प | दः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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