अथ क्षमामेव निरस्तसाधन-
श्चिराय पर्येषि सुखस्य साधनम् ।
विहाय लक्ष्मीपतिलक्ष्म कार्मुकं
जटाधरः सञ्जुहुधीह पावकम् ॥
अथ क्षमामेव निरस्तसाधन-
श्चिराय पर्येषि सुखस्य साधनम् ।
विहाय लक्ष्मीपतिलक्ष्म कार्मुकं
जटाधरः सञ्जुहुधीह पावकम् ॥
श्चिराय पर्येषि सुखस्य साधनम् ।
विहाय लक्ष्मीपतिलक्ष्म कार्मुकं
जटाधरः सञ्जुहुधीह पावकम् ॥
सारांश
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यदि आप युद्ध के साधनों को त्यागकर क्षमा को ही सुख का साधन मानते हैं, तो राजसी धनुष छोड़कर जटाएँ धारण करें और वन में अग्निहोत्र करें।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अथेति ॥ अथ पक्षान्तरे निरस्तविक्रमः सन् । चिराय चिरकालेनापि क्षमां क्षान्तिमेव ।
क्षितिक्षान्त्योः क्षमा इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१५१ ) । सुखस्य साधनं पर्येष्यवगच्छसि तर्हि लक्ष्मीपतिलक्ष्म राजचिह्नं कार्मुकं विहाय । धरतीति धरः। पचाद्यच् । जटानां धरो जटाधरः सन्निह वने पावकं जुहुधि । पावके होमं कुर्वित्यर्थः । अधिकरणे कर्मत्वोपचारः। विरक्तस्य किं धनुषेत्यर्थः । "हुझल्भ्यो हेर्धिः ॥ । अथ समयोल्लङ्घनाद्विभेषि तदपि न किंचिदित्याह
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | क्ष | मा | मे | व | नि | र | स्त | सा | ध | न |
| श्चि | रा | य | प | र्ये | षि | सु | ख | स्य | सा | ध | नम् |
| वि | हा | य | ल | क्ष्मी | प | ति | ल | क्ष्म | का | र्मु | कं |
| ज | टा | ध | रः | स | ञ्जु | हु | धी | ह | पा | व | कम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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