सुखेन लभ्या दधतः कृषीवलै-
रकृष्टपच्या इव सस्यसम्पदः ।
वितन्वति क्षेममदेवमातृका-
श्चिराय तस्मिन्कुरवश्चकासति ॥
सुखेन लभ्या दधतः कृषीवलै-
रकृष्टपच्या इव सस्यसम्पदः ।
वितन्वति क्षेममदेवमातृका-
श्चिराय तस्मिन्कुरवश्चकासति ॥
रकृष्टपच्या इव सस्यसम्पदः ।
वितन्वति क्षेममदेवमातृका-
श्चिराय तस्मिन्कुरवश्चकासति ॥
अन्वयः
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अथ स्थिर-पूर्ण-आयत-चाप-मण्डल-स्थः (सः) शिवेन सविस्मयम् ददृशे। (सः) तिसृणाम् पुराम् वधम् विधातुम् रचितः परेषाम् भयानकः आत्मा इव (आसीत्)।
English Summary
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Then he (Arjuna), standing within the steady, fully drawn circle of his bow, was seen with astonishment by Shiva. He looked like Shiva's own self, terrible to his enemies, prepared to accomplish the destruction of the three cities (Tripura).
सारांश
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'कुरु देश अब वर्षा पर निर्भर न रहकर भी सुखी है। दुर्योधन के उत्तम प्रबंध के कारण वहां किसान बिना अधिक परिश्रम के पकी हुई फसलों वाली भूमि से वैभव प्राप्त कर रहे हैं।'
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
सुखेनेति ॥ चिराय तस्मिन्दुर्योधने क्षेमं वितन्वति क्षेमंकरे सति । देवः पर्जन्य, एव माता येषां ते देवमातृका वृष्ट्यम्बुजीविनो देशाः । ते न भवन्तीत्यदेवमातृकाः। नदीमातृका इत्यर्थः ।
देशो नद्यम्बुवृष्ट्यम्बुसंपन्नव्रीहिपालितः । स्यान्नदीमातृको देवमातृकश्च यथाक्रमम् ॥ इत्यमरः (अमरकोशः २.१.१३ ) । एतेनास्य कुल्यादिपूर्तप्रवर्तकत्वमुक्तम्। कुरूणां निवासाः कुरवो जनपदविशेषः । कृष्टेन पच्यन्त इति कृष्टपच्या: । राजसूय— (अष्टाध्यायी ३.१.११४ ) इत्यादिना कर्मकर्तरि क्यप्प्रत्ययान्तो निपातः। तद्विपरीता अकृष्टपच्या इव। कृषिर्येषामस्तीति कृषीवलैः। कर्षकैरित्यर्थः ।रजःकृषि— आदिना वलच्प्रत्ययः ।वले (अष्टाध्यायी ६.३.११८ ) इति दीर्घः । सुखेनाक्लेशेन लभ्या लब्धुं शक्याः सस्यसंपदो दधतो धारयन्तः । नाभ्यस्ताच्छतुः (अष्टाध्यायी ७.१.७८ ) इति नुमागमप्रतिषेधः । चकासति । सर्वोत्कर्षेण वर्तन्त इत्यर्थः ।अदभ्यस्तात् (अष्टाध्यायी ७.१.४ ) इति झेरदादेशः । जक्षित्यादयः षट् (अष्टाध्यायी ६.१.६ ) इत्यभ्यस्तसंज्ञा। संपन्नजनपदत्वादसंतापकरत्वाच्च दुःसाध्योऽयमिति भावः ॥ नन्वेवं जनपदानुवर्तिनः कथमर्थलाभ इत्यत आह—उदारकीर्तेरुदयं दयावतः प्रशान्तबाधं दिशतोऽभिरक्षया । स्वयं प्रदुग्धेऽस्य गुणैरु पस्नुता वसूपमानस्य वसूनि मेदिनी
पदच्छेदः
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| ददृशे | ददृशे (√दृश् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was seen |
| अथ | अथ | Then |
| सविस्मयम् | सविस्मयम् | with astonishment |
| शिवेन | शिव (३.१) | by Shiva |
| स्थिर-पूर्ण-आयत-चाप-मण्डल-स्थः | स्थिर–पूर्ण–आयत–चापमण्डल–स्थ (१.१) | standing within the steady, fully drawn circle of his bow |
| रचितः | रचित (√रच्+क्त, १.१) | prepared |
| तिसृणाम् | त्रि (६.३) | of the three |
| पुराम् | पुर (६.३) | cities |
| विधातुम् | विधातुम् (वि√धा+तुमुन्) | to accomplish |
| वधम् | वध (२.१) | the destruction |
| आत्मा | आत्मन् (१.१) | the self |
| इव | इव | like |
| भयानकः | भयानक (१.१) | terrible |
| परेषाम् | पर (६.३) | to enemies |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सु | खे | न | ल | भ्या | द | ध | तः | कृ | षी | व | लै |
| र | कृ | ष्ट | प | च्या | इ | व | स | स्य | स | म्प | दः |
| वि | त | न्व | ति | क्षे | म | म | दे | व | मा | तृ | का |
| श्चि | रा | य | त | स्मि | न्कु | र | व | श्च | का | स | ति |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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