वसूनि वाञ्छन्न वशी न मन्युना
स्वधर्म इत्येव निवृत्तकारणः ।
गुरूपदिष्टेन रिपौ सुतेऽपि वा
निहन्ति दण्डेन स धर्मविप्लवम् ॥
वसूनि वाञ्छन्न वशी न मन्युना
स्वधर्म इत्येव निवृत्तकारणः ।
गुरूपदिष्टेन रिपौ सुतेऽपि वा
निहन्ति दण्डेन स धर्मविप्लवम् ॥
स्वधर्म इत्येव निवृत्तकारणः ।
गुरूपदिष्टेन रिपौ सुतेऽपि वा
निहन्ति दण्डेन स धर्मविप्लवम् ॥
अन्वयः
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सः वशी वसूनि वाञ्छन् न, मन्युना (दण्डं प्रयुङ्क्ते इति) न, (किन्तु) स्वधर्मः इति एव निवृत्त-कारणः (सन्) गुरु-उपदिष्टेन दण्डेन रिपौ सुते अपि वा धर्म-विप्लवं निहन्ति।
English Summary
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That self-controlled (Duryodhana) punishes violations of dharma, whether by an enemy or his own son, with the punishment prescribed by the scriptures. He does so not out of a desire for wealth or from anger, but simply because it is his duty, with all other motives set aside.
सारांश
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'वह काम या क्रोध के वश में होकर नहीं, अपितु केवल कर्तव्य मानकर दंड देता है। गुरु के उपदेशानुसार वह अपराधी शत्रु या पुत्र, दोनों को समान रूप से दंडित कर धर्म की रक्षा करता है।'
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
वसूनीति | वशी दुर्योधनो वसूनि धनानि वाञ्छन्न । लोभान्नेत्यर्थः । वसु तोये धने मणौ' इति वैजयन्ती । निहन्तीति शेषः । तथा मन्युना कोपेन न च । 'मन्युर्दैन्ये क्रतौ क्रुधि' इत्यमरः । ‘धर्मशास्त्रानुसारेण क्रोधलोभविवर्जितः' इति स्मरणादित्यर्थः। किंतु निवृत्तकारणो निवृत्तलोभादिनिमित्तः सन्स्वधर्म इत्येव । स्वस्य राज्ञ: सतो ममायं धर्मो ममेदं कर्तव्यमित्यस्मादेव हेतोरित्यर्थः । “अदण्ड्यान्दण्ड्यन् राजा दण्ड्याम्श्चैवाप्यदण्डयन् । अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति ॥' इति सरणादिति भाव: । गुरूपदिष्टेन प्राड़िवाकोपदिष्टेन । 'धर्मशास्त्रं पुरस्कृत्य प्राङ्विवाकमते स्थितः । समाहितमतिः पश्येद्व्यवहारामनुक्रमात् ॥' इति नारदस्मरणात् । दण्डेन दमेन । शिक्षयेत्यर्थः। रिपौ सुतेऽपि वा । स्तिमिति शेषः । एतेनास्य समदर्शित्वमुक्तम् । धर्मभिप्लवं धर्मव्यतिक्रमम् । अधर्ममिति यावत् । निहन्ति निवारयति । दुष्ट एवास्य शत्रुः शिष्ट एव बन्धुः । न तु संबन्धनिबन्धनः पक्षपातोऽस्तीत्यर्थः ॥ संप्रति भेदकौशलं दर्शयतिवि धाय रक्षान्परितः परेतरानशङ्किताकारमुपैति शङ्कितः । क्रियापवर्गेष्वंनुजीविसात्कृताः कृतज्ञतामस्य वदन्ति संपदः
पदच्छेदः
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| वसूनि | वसु (२.३) | wealth |
| वाञ्छन् | वाञ्छत् (√वाञ्छ्+शतृ, १.१) | desiring |
| न | न | not |
| वशी | वशिन् (१.१) | self-controlled |
| न | न | not |
| मन्युना | मन्यु (३.१) | out of anger |
| स्वधर्मः | स्वधर्म (१.१) | my duty |
| इति | इति | thus |
| एव | एव | only |
| निवृत्तकारणः | निवृत्तकारण (१.१) | with other motives removed |
| गुरूपदिष्टेन | गुरूपदिष्ट (३.१) | prescribed by the preceptor (scriptures) |
| रिपौ | रिपु (७.१) | on an enemy |
| सुते | सुत (७.१) | on a son |
| अपि | अपि | even |
| वा | वा | or |
| निहन्ति | निहन्ति (नि√हन् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | punishes |
| दण्डेन | दण्ड (३.१) | with punishment |
| सः | तद् (१.१) | he |
| धर्मविप्लवम् | धर्मविप्लव (२.१) | transgression of dharma |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | सू | नि | वा | ञ्छ | न्न | व | शी | न | म | न्यु | ना |
| स्व | ध | र्म | इ | त्ये | व | नि | वृ | त्त | का | र | णः |
| गु | रू | प | दि | ष्टे | न | रि | पौ | सु | ते | ऽपि | वा |
| नि | ह | न्ति | द | ण्डे | न | स | ध | र्म | वि | प्ल | वम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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