निरत्ययं साम न दानवर्जितं
न भूरि दानं विरहय्य सत्क्रियाम् ।
प्रवर्तते तस्य विशेषशालिनी
गुणानुरोधेन विना न सत्क्रिया ॥
निरत्ययं साम न दानवर्जितं
न भूरि दानं विरहय्य सत्क्रियाम् ।
प्रवर्तते तस्य विशेषशालिनी
गुणानुरोधेन विना न सत्क्रिया ॥
न भूरि दानं विरहय्य सत्क्रियाम् ।
प्रवर्तते तस्य विशेषशालिनी
गुणानुरोधेन विना न सत्क्रिया ॥
अन्वयः
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तस्य निरत्ययं साम दान-वर्जितं न (प्रवर्तते)। भूरि दानं सत्क्रियां विरहय्य न (प्रवर्तते)। विशेष-शालिनी सत्क्रिया गुण-अनुरोधेन विना न प्रवर्तते।
English Summary
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His (Duryodhana's) unfailing conciliation is never without gifts; his generous gifts are not without respectful treatment; and his excellent respectful treatment is never bestowed without regard to merit.
सारांश
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'उसकी साम-नीति दान रहित नहीं होती और प्रचुर दान बिना सत्कार के नहीं दिया जाता। उसका विशेष सत्कार भी गुणों के सम्मान के बिना संपन्न नहीं होता है।'
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
'निरत्ययमिति ॥ तस्य दुर्योधनस्य निरत्ययं निर्बाधम् । अमायिकमित्यर्थः।अन्यथा जनानां दुर्ग्रहत्वादिति भावः। साम सान्त्वम् । 'साम सान्त्वमुभे समे' इत्यमरः। दानवर्जितं न प्रवर्तते अन्यथा लुब्धाद्यावर्जनस्य शुष्कप्रियैर्वाक्यैर्दुष्करत्वादिति भावः। उक्तं च–लुब्धमर्थेन गृह्णीयात्साधुमञ्जलिकर्मणा । मुर्खं छन्दानुरोधेन तत्त्वार्थेन च पण्डितम् ॥' इति। तथा भूरि प्रभूतम् । न तु कदाचित्स्वल्पमित्यर्थः । दानं धनत्यागः । सदित्यादरार्थेऽव्ययम्।'आदरानादयोः सदसती' इति निपातसंज्ञास्मरणात् । तस्य क्रियां सत्क्रियां विरहय्य विहाय ।
ल्यपि लघुपूर्वात् (अष्टाध्यायी ६.४.५६ ) इत्ययादेशः । न प्रवर्तते । अनादरे दानवैफल्यादिति भावः । न चैवं सर्वत्र, येनाविवेकित्वं कोशहानिश्च स्यादित्याह -प्रेति । विशेषशालिन्यतिशययोगिनी सत्क्रियादरक्रिया गुणानुरोधेन गुणानुरागेण विना न प्रवर्तते । पृथग्विना- (अष्टाध्यायी २.३.३२ ) इत्यादिना तृतीया । गुणेष्वेवादरो भूरिदानं चेति नोक्तदोषावकाश इत्यर्थः । अत्रोत्तरोत्तरस्य पूर्वपूर्वविशेषणतया स्थापनादेकावल्यलंकारः । तदुक्तं काव्यप्रकाशे—स्थाप्यतेऽपोह्यते वापि यथापूर्वं परं परम् । विशेषणतया वस्तु यत्र सैकावली द्विधा ॥' इति ॥ अथ दण्डप्रकारमाह
पदच्छेदः
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| निरत्ययम् | निरत्यय (१.१) | unfailing |
| साम | सामन् (१.१) | conciliation |
| न | न | not |
| दानवर्जितम् | दानवर्जित (१.१) | is devoid of gifts |
| न | न | not |
| भूरि | भूरि (१.१) | generous |
| दानम् | दान (१.१) | gift |
| विरहय्य | विरहय्य (वि√रह्+णिच्+ल्यप्) | abandoning |
| सत्क्रियाम् | सत्क्रिया (२.१) | respectful treatment |
| प्रवर्तते | प्रवर्तते (प्र√वृत् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is practiced |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| विशेषशालिनी | विशेषशालिन् (१.१) | excellent |
| गुणानुरोधेन | गुणानुरोध (३.१) | regard for merit |
| विना | विना | without |
| न | न | not |
| सत्क्रिया | सत्क्रिया (१.१) | respectful treatment |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | र | त्य | यं | सा | म | न | दा | न | व | र्जि | तं |
| न | भू | रि | दा | नं | वि | र | ह | य्य | स | त्क्रि | याम् |
| प्र | व | र्त | ते | त | स्य | वि | शे | ष | शा | लि | नी |
| गु | णा | नु | रो | धे | न | वि | ना | न | स | त्क्रि | या |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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