अनेकराजन्यरथाश्वसंकुलं
तदीयमास्थाननिकेतनाजिरम् ।
नयत्ययुग्मच्छदगन्धिरार्द्रतां
भृशं नृपोपायनदन्तिनां मदः ॥
अनेकराजन्यरथाश्वसंकुलं
तदीयमास्थाननिकेतनाजिरम् ।
नयत्ययुग्मच्छदगन्धिरार्द्रतां
भृशं नृपोपायनदन्तिनां मदः ॥
तदीयमास्थाननिकेतनाजिरम् ।
नयत्ययुग्मच्छदगन्धिरार्द्रतां
भृशं नृपोपायनदन्तिनां मदः ॥
अन्वयः
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नृप-उपायन-दन्तिनां अयुग्मच्छद-गन्धिः मदः अनेक-राजन्य-रथ-अश्व-संकुलं तदीयम् आस्थान-निकेतन-अजिरं भृशम् आर्द्रतां नयति।
English Summary
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The ichor of the elephants, presented as tribute by kings, which smells like the Saptaparna flower, thoroughly moistens his palace courtyard, already crowded with the chariots and horses of numerous princes.
सारांश
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'अनेक राजाओं के रथों और घोड़ों से भरे उसके राजमहल का आँगन, उपहार में आए हाथियों के सप्तपर्णी वृक्ष की सुगंध वाले मद-जल से सदैव गीला रहता है।'
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अनेकेति ॥ अयुग्मच्छदस्य सप्तपर्णपुष्पस्य गन्ध इव गन्धो यस्यासावयुग्मच्छदगन्धिः।
सप्तम्युपमान- इत्यादिना बहुव्रीहिरुत्तरपदलोपश्च । उपमानाच्च (अष्टाध्यायी ५.४.१३७ ) इति । समासान्त इकारः । नृपाणामुपायनान्युपहारभूता ये दन्तिनस्तेषां मदः । उपायनमुपग्राह्यमुपहारस्तथोपदा इत्यमरः (अमरकोशः २.८.२८ ) । राज्ञामपत्यानि पुमांसो राजन्या: क्षत्रियाः । राजश्वशुराद्यत् (अष्टाध्यायी ४.१.१३७ ) इति यत्प्रत्ययः । राज्ञोऽपत्ये जातिग्रहणादन्। रथाश्चाश्वाश्च रथाश्वम्। सेनाङ्गत्वादेकवद्भावः । अनेकेषां राजन्यानां रथाश्वेन संकुलं व्याप्तं तदीयमा स्थाननिकेतनाजिरं सभामण्डपाङ्गणं भृशमत्यर्थमार्द्रतां पङ्किलत्वं नयति । एतेन महासमृद्धिरस्योक्ता ।अतएवोदात्तालंकारः ।तथा चालंकारसूत्रम्-समृद्धिमद्वस्तुवर्णनमुदात्तः इति ॥ संप्रति जनपदक्षेमकरत्वमाह
पदच्छेदः
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| अनेकराजन्यरथाश्वसंकुलम् | अनेक–राजन्य–रथ–अश्व–संकुल–अनेकराजन्यरथाश्वसंकुल (२.१) | crowded with the chariots and horses of many princes |
| तदीयम् | तदीय (२.१) | his |
| आस्थाननिकेतनाजिरम् | आस्थान–निकेतन–अजिर–आस्थाननिकेतनाजिर (२.१) | palace courtyard |
| नयति | नयति (√नी कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | makes |
| अयुग्मच्छदगन्धिः | अयुग्मच्छद–गन्धिन्–अयुग्मच्छदगन्धिन् (१.१) | smelling like the Saptaparna flower |
| आर्द्रताम् | आर्द्रता (२.१) | wet |
| भृशम् | भृशम् | thoroughly |
| नृपोपायनदन्तिनाम् | नृप–उपायन–दन्तिन्–नृपोपायनदन्तिन् (६.३) | of the elephants presented as tribute by kings |
| मदः | मद (१.१) | the ichor |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ने | क | रा | ज | न्य | र | था | श्व | सं | कु | लं |
| त | दी | य | मा | स्था | न | नि | के | त | ना | जि | रम् |
| न | य | त्य | यु | ग्म | च्छ | द | ग | न्धि | रा | र्द्र | तां |
| भृ | शं | नृ | पो | पा | य | न | द | न्ति | नां | म | दः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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