विधाय रक्षान्परितः परेतरा-
नशङ्किताकारमुपैति शङ्कितः ।
क्रियापवर्गेष्वनुजीविसात्कृताः
कृतज्ञतामस्य वदन्ति सम्पदः ॥
विधाय रक्षान्परितः परेतरा-
नशङ्किताकारमुपैति शङ्कितः ।
क्रियापवर्गेष्वनुजीविसात्कृताः
कृतज्ञतामस्य वदन्ति सम्पदः ॥
नशङ्किताकारमुपैति शङ्कितः ।
क्रियापवर्गेष्वनुजीविसात्कृताः
कृतज्ञतामस्य वदन्ति सम्पदः ॥
अन्वयः
AI
'कस्मैचित् अपि वर्त्म न प्रदीयताम्' इति व्रतम् महर्षिणा मे विहितम् । अस्मान् जिघांसुः मृगः मया निहतः । हि सताम् व्रत-अभिरक्षा अलंक्रिया (भवति) ।
English Summary
AI
"A great sage has prescribed a vow for me: 'Let no path be yielded to anyone.' Desiring to kill us, the boar was struck down by me. Indeed, the protection of one's vow is the ornament of the virtuous."
सारांश
AI
'वह सर्वत्र रक्षक नियुक्त कर स्वयं को निडर दिखाता है। कार्यों की सफलता पर सेवकों को प्रदान की गई प्रचुर धन-संपत्ति उसकी कृतज्ञता को स्वयं प्रकट करती है।'
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विधायेति ॥ शङ्का संजातास्य शङ्कितोऽविश्वस्तः सन्परितः सर्वत्र स्वपरमण्डले परेतरानात्मीयान् । अवञ्चकानिति यावत् । यद्वा परानितरयन्ति भेदेनात्मसात्कुर्वन्तीति परेतरान् । तत्करोतीति ण्यन्तात्कर्मण्यण्प्रत्ययः । रक्षन्तीति रक्षान् रक्षकान् । मन्त्रगुप्तिसमर्थानित्यर्थः ।
नन्दिग्रहि (अष्टाध्यायी ३.१.१३४ ) इत्यादिना पचाद्यच् । विधाय कृत्वा । नियुज्येत्यर्थः । अशङ्किताकारमुपैति । स्वयमविश्वस्तोऽपि विश्वस्तवदेव व्यवहरन्परमुखेनैव परान्भिनत्तीत्यर्थः । न च तान् रक्षानुपेक्षते येन तेऽपि विकुर्वीरन्नित्याहक्रियेति । क्रियापवर्गेषु कर्मसमाप्तिष्वनुजीवितात्कृता भृत्याधीनाः कृताः । अपरावर्तितया दत्ता इत्यर्थः ।देये त्रा च (अष्टाध्यायी ५.४.५५ ) इति सातिप्रत्ययः । संपदोऽस्य राज्ञः कृतज्ञतामुपकारित्वं वदन्ति । प्रीतिदानैरेवास्य कृतज्ञत्वं प्रकाश्यते, न तु वाङ्मात्रेणेत्यर्थः । कृतज्ञे राज़न्यनुजीविनोऽनुरज्यन्तेऽनुरक्ताश्च तं रक्षन्तीति भावः ॥ अथोपायप्रयोगस्य फलवत्तां दर्शयतिः
पदच्छेदः
AI
| न | न | not |
| वर्त्म | वर्त्मन् (२.१) | path |
| कस्मैचित् | किञ्चित् (४.१) | to anyone |
| अपि | अपि | even |
| प्रदीयताम् | प्रदीयताम् (प्र√दा भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | let be yielded |
| इति | इति | thus |
| व्रतम् | व्रत (१.१) | a vow |
| मे | अस्मद् (६.१) | for me |
| विहितम् | विहित (वि√धा+क्त, १.१) | has been prescribed |
| महर्षिणा | महाऋषि (३.१) | by a great sage |
| जिघांसुः | जिघांसु (√हन्+सन्+उ, १.१) | desiring to kill |
| अस्मान् | अस्मद् (२.३) | us |
| निहतः | निहत (नि√हन्+क्त, १.१) | was struck down |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| मृगः | मृग (१.१) | the boar |
| व्रताभिरक्षा | व्रत–अभिरक्षा (१.१) | the protection of one's vow |
| हि | हि | indeed |
| सताम् | सत् (√अस्+शतृ, ६.३) | of the virtuous |
| अलंक्रिया | अलंक्रिया (१.१) | is the ornament |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | धा | य | र | क्षा | न्प | रि | तः | प | रे | त | रा |
| न | श | ङ्कि | ता | का | र | मु | पै | ति | श | ङ्कि | तः |
| क्रि | या | प | व | र्गे | ष्व | नु | जी | वि | सा | त्कृ | ताः |
| कृ | त | ज्ञ | ता | म | स्य | व | द | न्ति | स | म्प | दः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.