पुरःसरा धामवतां यशोधनाः
सुदुःसहं प्राप्य निकारमीदृशम् ।
भवादृशाश्चेदधिकुर्वते परा-
न्निराश्रया हन्त हता मनस्विता ॥
पुरःसरा धामवतां यशोधनाः
सुदुःसहं प्राप्य निकारमीदृशम् ।
भवादृशाश्चेदधिकुर्वते परा-
न्निराश्रया हन्त हता मनस्विता ॥
सुदुःसहं प्राप्य निकारमीदृशम् ।
भवादृशाश्चेदधिकुर्वते परा-
न्निराश्रया हन्त हता मनस्विता ॥
सारांश
AI
यदि यश को धन मानने वाले आप जैसे तेजस्वी पुरुष भी ऐसे घोर अपमान को सह लेंगे, तो स्वाभिमान सदा के लिए निराश्रय होकर नष्ट हो जाएगा।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
पुर इति । किं च धामवतां तेजस्विनाम् । परनिकारासहिष्णूनामित्यर्थः । पुरः सरन्तीति पुरःसरा अग्रेसराः ।
पुरोऽग्रतोऽग्रेषु सर्ते: इति टप्रत्ययः । यशोधना भवादृशाः सुदुःसहमतिदुःसहमीदृशमुक्तप्रकारं निकारं पराभवं प्राप्य रतिं संतोषमधिकुर्वते स्वीकुर्वते चेत्तर्हि । हन्त इति खेदे । मनस्विताभिमानिता निराश्रया सती हता। तेजस्विजनैकशरणत्वान्मनस्विताया इत्यर्थः । अतः पराक्रमितव्यमिति भावः । यद्यप्यत्र प्रसहनस्यासङतेरधिपूर्वात्करोतेः अधेः प्रसहने (अष्टाध्यायी १.३.३३ ) इत्यात्मनेपदं न भवति । प्रसहनं परिभवः इति काशिका । तथाप्यस्याः कर्त्रभिप्रायविवक्षायामेव प्रयोजकत्वात्कर्त्रभिप्राये स्वरितञित:-इत्यात्मनेपदं प्रसिद्धम् ॥ अथ क्षमामेव निरस्तविक्रमश्चिराय पर्येषि सुखस्य साधनम् । विहाय लक्ष्मीपतिलक्ष्म कार्मुकं जटाधरः सञ्जुहुधीह पावकम्
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पु | रः | स | रा | धा | म | व | तां | य | शो | ध | नाः |
| सु | दुः | स | हं | प्रा | प्य | नि | का | र | मी | दृ | शम् |
| भ | वा | दृ | शा | श्चे | द | धि | कु | र्व | ते | प | रा |
| न्नि | रा | श्र | या | ह | न्त | ह | ता | म | न | स्वि | ता |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.