इमामहं वेद न तावकीं धियं
विचित्ररूपाः खलु चित्तवृत्तयः ।
विचिन्तयन्त्या भवदापदं परां
रुजन्ति चेतः प्रसभं ममाधयः ॥
इमामहं वेद न तावकीं धियं
विचित्ररूपाः खलु चित्तवृत्तयः ।
विचिन्तयन्त्या भवदापदं परां
रुजन्ति चेतः प्रसभं ममाधयः ॥
विचित्ररूपाः खलु चित्तवृत्तयः ।
विचिन्तयन्त्या भवदापदं परां
रुजन्ति चेतः प्रसभं ममाधयः ॥
सारांश
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मैं आपकी इस शांत बुद्धि को समझ पाने में असमर्थ हूँ; वास्तव में चित्तवृत्तियाँ अत्यंत विचित्र होती हैं। आपकी विपत्तियों के विचार मात्र से मेरा हृदय अत्यंत व्यथित हो रहा है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
इमामिति ॥ इमां वर्तमानाम् । तवेमां तावकीं त्वदीयाम् ।
तस्येदम् (अष्टाध्यायी ४.३.१२० ) इत्यण्प्रत्यय:। तवकममकावेकवचने (अष्टाध्यायी ४.३.३ ) इति तावकादेशः धियं त्वदापद्विषयां चित्तवृत्तिमहं न वेद कीदृशी वा न वेद्मि । परबुद्धेरप्रत्यक्षत्वादिति भावः ।विदो लटो वा (अष्टाध्यायी ३.४.८३ ) 'इति लटो णलादेशः । न चात्मदृष्टान्तेनापन्नत्वाद्दुःखित्वमनुमातुं शक्यते । धीरादिष्वनैकान्तिकत्वादित्याशयेनाह—चित्तवृत्तयो विचित्ररूपा धीराधीराद्यनेकप्रकाराः खलु । किंतु परामुत्कृष्टां भवदापदं विचिन्तयन्त्या भावयन्त्या मम चेतश्चित्तम् । आधयो मनोव्यथाः । उपसर्गे घोः किः (अष्टाध्यायी ३.३.९२ ) इति किप्रत्ययः । प्रसभं प्रसह्य रुजन्ति भजन्ति।'रुजो भङ्गे' इति धातोर्लट्। पश्यतामपि दुःसहा दुःखजननी त्वद्विपत्तिरनुभवितारं त्वां न विकरोतीति महच्चित्रमित्यर्थः । चेत इति रुजार्थानां भाववचनानामज्वरेः (अष्टाध्यायी २.३.५४ ) इति षष्ठी न भवति । तत्र शेषाधिकाराच्छेषत्वस्य विवक्षितत्वादिति ॥ तदापदमेव श्लोकत्रयेणाह
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | मा | म | हं | वे | द | न | ता | व | कीं | धि | यं |
| वि | चि | त्र | रू | पाः | ख | लु | चि | त्त | वृ | त्त | यः |
| वि | चि | न्त | य | न्त्या | भ | व | दा | प | दं | प | रां |
| रु | ज | न्ति | चे | तः | प्र | स | भं | म | मा | ध | यः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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