वनान्तशय्याकठिनीकृताकृती
कचाचितौ विष्वगिवागजौ गजौ ।
कथं त्वमेतौ धृतिसंयमौ यमौ
विलोकयन्नुत्सहसे न बाधितुम् ॥
वनान्तशय्याकठिनीकृताकृती
कचाचितौ विष्वगिवागजौ गजौ ।
कथं त्वमेतौ धृतिसंयमौ यमौ
विलोकयन्नुत्सहसे न बाधितुम् ॥
कचाचितौ विष्वगिवागजौ गजौ ।
कथं त्वमेतौ धृतिसंयमौ यमौ
विलोकयन्नुत्सहसे न बाधितुम् ॥
सारांश
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वन की कठोर भूमि पर सोने के कारण जिनका शरीर सख्त हो गया है और बाल बिखर गए हैं, उन नकुल और सहदेव की दुर्दशा देखकर भी आप अपना धैर्य कैसे नहीं छोड़ते?
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
वनान्तेति ॥ वनान्तो वनभूमिरेव शय्या तथा कठिनीकृताकृती कठिनीकृतदेहौ ।
आकारो देह आकृतिः इति वैजयन्ती । विष्वक्समन्तात् । समन्ततस्तु परितः सर्वतो विष्वगित्यपि इत्यमरः (अमरकोशः ३.४.१३ ) । कचाचितौ कचव्याप्तौ । विशीर्णकेशावित्यर्थः । अतएवागजौ गिरिसंभवौ गजाविव स्थितावेतौ यमौ युग्मजातौ । माद्रीपुत्रावित्यर्थः । यमो दण्डधरे ध्वाङ्क्षे संयमे यमजेऽपि च इति विश्वः । विलोकयंस्त्वं कथं धृतिसंयमौ संतोषनियमौ । धृतिर्योगान्तरे धैर्ये धारणाध्वरतुष्टिषुः इति विश्वः ।बाधितुं नोत्सहसे न प्रवर्तसे। शकधृष- (अष्टाध्यायी ३.४.६५ ) इत्यादिना तुमुन् । अहो ते महद्वैर्यमिति भावः ॥ अथ राज्ञो दुर्दशां दर्शयितुमुपोद्घातमाह । प्रकृतार्थं वर्णयितुमर्थान्तरवर्णनमुपोद्धातः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | ना | न्त | श | य्या | क | ठि | नी | कृ | ता | कृ | ती |
| क | चा | चि | तौ | वि | ष्व | गि | वा | ग | जौ | ग | जौ |
| क | थं | त्व | मे | तौ | धृ | ति | सं | य | मौ | य | मौ |
| वि | लो | क | य | न्नु | त्स | ह | से | न | बा | धि | तुम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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