विहाय शान्तिं नृप धाम तत्पुनः
प्रसीद संधेहि वधाय विद्विषाम् ।
व्रजन्ति शत्रूनवधूय निःस्पृहाः
शमेन सिद्धिं मुनयो न भूभृतः ॥
विहाय शान्तिं नृप धाम तत्पुनः
प्रसीद संधेहि वधाय विद्विषाम् ।
व्रजन्ति शत्रूनवधूय निःस्पृहाः
शमेन सिद्धिं मुनयो न भूभृतः ॥
प्रसीद संधेहि वधाय विद्विषाम् ।
व्रजन्ति शत्रूनवधूय निःस्पृहाः
शमेन सिद्धिं मुनयो न भूभृतः ॥
सारांश
AI
हे राजन! शांति को त्यागकर शत्रुओं के नाश के लिए पुनः तेज धारण करें। शांति से सिद्धि मुनि प्राप्त करते हैं, राजा नहीं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विहायेति ॥ हे नृप, शान्तिं विहाय तत्प्रसिद्धं धाम तेजो विद्विषां वधाय पुनः संधेह्यङ्गीकुरु प्रसीद । प्रार्थनायां लोट्। ननु शमेन कार्यसिद्धौ किं क्रोधेनेत्यत्राहव्रजन्तीति । निःस्पृहा मुनयः शत्रूनवधूय निर्जित्य शमेन क्रोधवर्जनेन सिद्धिं व्रजन्ति । भूभृतस्तु न । कैवल्यकार्यवद्राजकार्यं न शान्तिसाध्यमित्यर्थः ॥ ।
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | हा | य | शा | न्तिं | नृ | प | धा | म | त | त्पु | नः |
| प्र | सी | द | सं | धे | हि | व | धा | य | वि | द्वि | षाम् |
| व्र | ज | न्ति | श | त्रू | न | व | धू | य | निः | स्पृ | हाः |
| श | मे | न | सि | द्धिं | मु | न | यो | न | भू | भृ | तः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.