निशम्य सिद्धिं द्विषतामपाकृती-
स्ततस्ततस्त्या विनियन्तुमक्षमा ।
नृपस्य मन्युव्यवसायदीपिनी-
रुदाजहार द्रुपदात्मजा गिरः ॥
निशम्य सिद्धिं द्विषतामपाकृती-
स्ततस्ततस्त्या विनियन्तुमक्षमा ।
नृपस्य मन्युव्यवसायदीपिनी-
रुदाजहार द्रुपदात्मजा गिरः ॥
स्ततस्ततस्त्या विनियन्तुमक्षमा ।
नृपस्य मन्युव्यवसायदीपिनी-
रुदाजहार द्रुपदात्मजा गिरः ॥
सारांश
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शत्रुओं की सफलता और अपनी दुर्दशा का वृत्तांत सुनकर द्रौपदी अत्यंत दुखी हुई और राजा युधिष्ठिर के क्रोध एवं उत्साह को जाग्रत करने के लिए ओजपूर्ण वचन कहने लगी।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
निशम्येति ॥ अथ द्रुपदात्मजा द्रौपदी द्विषतां सिद्धिं वृद्धिरूपां निशम्य ततस्तदनन्तरम् । ततो द्विषद्भ्य आगतास्ततस्त्याः ।
अव्ययात्त्यप् (अष्टाध्यायी ४.२.१०४ ) इति त्यप् । अपाकृतीर्षि-, कारान्चिनियन्तुं निरोद्भुमक्षमा सती नृपस्य युधिष्ठिरस्य मन्युव्यवसाययोः क्रोधोद्योगयोर्दीपिनीः संवर्धिनीर्गिरो वाक्यान्युदाजहार। जगादेत्यर्थः ॥
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | श | म्य | सि | द्धिं | द्वि | ष | ता | म | पा | कृ | ती |
| स्त | त | स्त | त | स्त्या | वि | नि | य | न्तु | म | क्ष | मा |
| नृ | प | स्य | म | न्यु | व्य | व | सा | य | दी | पि | नी |
| रु | दा | ज | हा | र | द्रु | प | दा | त्म | जा | गि | रः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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