अर्जुन उवाच ।
३.१
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥
Summary
AI
Arjuna said: O Janardana, O Keshava, if you consider intelligence to be superior to action, then why do you engage me in this terrible action?
सारांश
AI
हे जनार्दन, यदि आप ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो हे केशव, मुझे इस घोर युद्ध रूपी कर्म में क्यों नियोजित कर रहे हैं?
३.२
व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥
Summary
AI
With these seemingly confusing words, you are bewildering my intellect. Therefore, tell me decisively the one path by which I may attain the highest good.
सारांश
AI
आप मिले-जुले वचनों से मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हैं। कृपा कर निश्चित रूप से वह एक मार्ग बताइए जिससे मैं परम कल्याण प्राप्त कर सकूँ।
श्रीभगवानुवाच ।
३.३
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥
Summary
AI
The Blessed Lord said: O sinless one, in this world, a twofold path was previously declared by Me—the path of knowledge for the contemplative (Sankhyas) and the path of action for the active (Yogis).
सारांश
AI
हे निष्पाप अर्जुन, इस संसार में दो प्रकार की निष्ठाएँ मेरे द्वारा पहले कही गई हैं—सांख्यवादियों के लिए ज्ञानयोग और योगियों के लिए कर्मयोग।
३.४
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥
Summary
AI
A person does not attain freedom from the bondage of action (naishkarmya) by merely abstaining from work, nor does one reach perfection by renunciation alone.
सारांश
AI
मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किए बिना निष्कर्मता को प्राप्त होता है और न ही केवल कर्मों के त्याग से सिद्धि प्राप्त कर सकता है।
३.५
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
Summary
AI
For no one can remain without performing action even for a moment. Indeed, everyone is helplessly driven to act by the qualities (gunas) born of material nature (Prakriti).
सारांश
AI
कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षण भर के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता, क्योंकि प्रकृति के गुणों द्वारा सभी विवश होकर कर्म करते हैं।
३.६
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥
Summary
AI
One who restrains the organs of action but whose mind continues to dwell on sense objects is a deluded soul and is called a hypocrite.
सारांश
AI
जो अज्ञानी कर्मेन्द्रियों को तो रोक लेता है किन्तु मन से इन्द्रिय विषयों का स्मरण करता रहता है, वह ढोंगी और मिथ्याचारी कहलाता है।
३.७
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥
Summary
AI
O Arjuna, one who, controlling the senses with the mind, begins the path of action (Karma Yoga) with the organs of action, without attachment, is superior.
सारांश
AI
हे अर्जुन, जो मन से इन्द्रियों को वश में कर आसक्ति रहित होकर कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का अभ्यास करता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है।
३.८
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ॥
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ॥
Summary
AI
You must perform your prescribed duty, for action is superior to inaction. Indeed, even the maintenance of your body would not be possible without action.
सारांश
AI
तुम अपने शास्त्रसम्मत नियत कर्म करो क्योंकि कर्म न करने से श्रेष्ठ कर्म करना है। कर्म किए बिना तुम्हारा शरीर-निर्वाह भी संभव नहीं होगा।
३.९
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥
Summary
AI
Work done other than for the sake of sacrifice (Yajna) binds this world. Therefore, O son of Kunti, perform your actions for that purpose, free from all attachment.
सारांश
AI
यज्ञ के अतिरिक्त अन्य कर्मों में लगा यह संसार कर्मों के बन्धन में बँधता है। अतः हे कुन्तीपुत्र, आसक्ति त्यागकर केवल यज्ञ के निमित्त ही कर्म करो।
३.१०
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥
Summary
AI
In the beginning, having created mankind along with sacrifices, Prajapati (the creator) said, 'By this shall you prosper; let this be the yielder of your desired wishes.'
सारांश
AI
सृष्टि के आदि में प्रजापति ने यज्ञ सहित प्रजा रचकर कहा कि इस यज्ञ द्वारा तुम्हारी वृद्धि हो और यह तुम्हारी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाला बने।
३.११
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
Summary
AI
Nourish the gods with this sacrifice, and may those gods nourish you. Thus nourishing one another, you shall attain the highest good.
सारांश
AI
यज्ञ द्वारा तुम देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम्हें उन्नत करें। इस प्रकार परस्पर सहयोग से तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे।
३.१२
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥
Summary
AI
The gods, nourished by sacrifice, will bestow upon you your desired enjoyments. He who enjoys these gifts without offering them back to the gods is indeed a thief.
सारांश
AI
यज्ञ से पुष्ट होकर देवता तुम्हें इच्छित भोग देंगे। जो उनके द्वारा दिए गए भोगों को उन्हें अर्पित किए बिना ही भोगता है, वह निश्चित रूप से चोर है।
३.१३
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
Summary
AI
The righteous, who eat the remnants of sacrifice, are freed from all sins. But the sinful, who cook food only for their own sake, verily eat sin.
सारांश
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यज्ञ से बचे अन्न को ग्रहण करने वाले श्रेष्ठ जन सब पापों से मुक्त हो जाते हैं, परन्तु जो केवल स्वयं के लिए अन्न पकाते हैं, वे पाप का ही भक्षण करते हैं।
३.१४
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥
Summary
AI
All living beings subsist on food, which is produced from rain. Rain is produced by the performance of sacrifice (yajna), and sacrifice is born of prescribed duties.
सारांश
AI
प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से होता है, वर्षा यज्ञ से उत्पन्न होती है और यज्ञ का मूल विहित कर्म है।
३.१५
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥
Summary
AI
Know that action arises from the Vedas, and the Vedas from the Imperishable Supreme Being. Therefore, the all-pervading Brahman is eternally established in sacrifice.
सारांश
AI
कर्मों को वेदों से और वेदों को अविनाशी ब्रह्म से उत्पन्न जानो। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में ही प्रतिष्ठित रहता है।
३.१६
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥
Summary
AI
O Partha, one who does not follow this cycle thus set in motion, living a life of sin and delighting in the senses, lives in vain.
सारांश
AI
हे पार्थ, जो मनुष्य इस लोक में इस प्रकार चक्रित सृष्टि-क्रम के अनुरूप आचरण नहीं करता, वह इन्द्रियाराम और पापी मनुष्य व्यर्थ ही जीता है।
३.१७
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
Summary
AI
But for that person who rejoices only in the Self, who is satisfied in the Self, and is content in the Self alone, there is no duty to be performed.
सारांश
AI
किन्तु जो मनुष्य केवल आत्मा में ही आनन्द लेता है, आत्मा में ही तृप्त है और आत्मा में ही सन्तुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं है।
३.१८
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥
Summary
AI
For such a person, there is no purpose to be gained by action, nor any by inaction in this world. Nor does this person have any need to depend on any being for any purpose.
सारांश
AI
ऐसे महापुरुष का इस संसार में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन है और न ही कर्म न करने से। उसे किसी भी प्राणी पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है।
३.१९
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥
Summary
AI
Therefore, without attachment, constantly perform the action that is your duty. For by performing action without attachment, a person attains the Supreme.
सारांश
AI
इसलिए तुम सदैव आसक्ति से रहित होकर कर्तव्य कर्म करो, क्योंकि अनासक्त भाव से कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
३.२०
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥
Summary
AI
Indeed, through action alone, Janaka and others attained perfection. Also, considering the welfare of the world, you should perform your duty.
सारांश
AI
जनक जैसे महापुरुषों ने भी कर्म द्वारा ही परम सिद्धि प्राप्त की थी। अतः लोक-संग्रह को ध्यान में रखते हुए भी तुम्हें कर्म करना ही चाहिए।
३.२१
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
Summary
AI
Whatever a great person does, other people follow. Whatever standard they set by their example, the world follows that.
सारांश
AI
श्रेष्ठ पुरुष जो आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो आदर्श प्रस्तुत करता है, समस्त संसार उसका अनुसरण करता है।
३.२२
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥
Summary
AI
O Partha, for Me, there is no duty to be performed in the three worlds, nor is there anything unattained that I must attain. Yet, I am still engaged in action.
सारांश
AI
हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरे लिए न तो कुछ कर्तव्य शेष है और न ही कोई अप्राप्य वस्तु है, फिर भी मैं निरंतर कर्म में लगा रहता हूँ।
३.२३
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
Summary
AI
For if I, unwearied, were not to engage in action at all, O Partha, people would in every way follow my path.
सारांश
AI
हे पार्थ! यदि मैं कभी सावधानीपूर्वक कर्म न करूँ, तो सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करने लगेंगे।
३.२४
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥
Summary
AI
If I did not perform action, these worlds would perish. I would be the cause of social confusion and would destroy all these beings.
सारांश
AI
यदि मैं कर्म करना छोड़ दूँ तो ये समस्त लोक नष्ट हो जाएँगे, मैं वर्णसंकरता का कारण बनूँगा और इन प्रजाओं का विनाशक कहलाऊँगा।
३.२५
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥
Summary
AI
O Bharata, just as the ignorant act with attachment to their work, so should the wise act without attachment, desiring to promote the welfare of the world.
सारांश
AI
हे भारत! कर्म में आसक्त अज्ञानी जिस प्रकार कार्य करते हैं, लोक-कल्याण की इच्छा रखने वाले विद्वान को अनासक्त होकर उसी प्रकार कार्य करना चाहिए।
३.२६
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥
Summary
AI
A wise person should not unsettle the minds of the ignorant who are attached to action. Instead, by performing all actions with devotion, the wise should encourage them to do the same.
सारांश
AI
विद्वान को चाहिए कि वह कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम पैदा न करे, बल्कि स्वयं श्रेष्ठ रीति से कर्म करते हुए उनसे भी कर्म कराए।
३.२७
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
Summary
AI
All actions are performed in all cases by the qualities (gunas) of nature. The one whose mind is deluded by egoism thinks, 'I am the doer.'
सारांश
AI
वास्तव में समस्त कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, परंतु अहंकार से मोहित बुद्धि वाला मनुष्य स्वयं को कर्ता मान बैठता है।
३.२८
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
Summary
AI
But, O mighty-armed one, the knower of the truth about the divisions of qualities and actions, understanding that 'qualities act upon qualities,' does not become attached.
सारांश
AI
हे महाबाहो! गुण और कर्म के विभाग के रहस्य को जानने वाला ज्ञानी 'गुण ही गुणों में बरत रहे हैं' यह समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
३.२९
प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥
Summary
AI
Those deluded by the qualities of nature become attached to the actions of those qualities. The one who knows the whole truth should not unsettle these dull-witted people of partial knowledge.
सारांश
AI
प्रकृति के गुणों से मोहित अज्ञानी गुण और कर्मों में आसक्त रहते हैं। उन अल्पज्ञानी मंदबुद्धि लोगों को पूर्ण ज्ञानी को विचलित नहीं करना चाहिए।
३.३०
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥
Summary
AI
Renouncing all actions in Me, with your mind focused on the Self, free from hope and selfishness, and free from mental anguish, fight.
सारांश
AI
अपने समस्त कर्मों को मुझमें अर्पित कर, अध्यात्म चेतना से युक्त होकर, आशा, ममता और संताप का त्याग कर युद्ध करो।
३.३१
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥
Summary
AI
Those people who, full of faith and free from envy, constantly follow this teaching of Mine, are also liberated from the bondage of actions.
सारांश
AI
जो मनुष्य दोषरहित और श्रद्धावान होकर मेरे इस मत का निरंतर पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
३.३२
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥
Summary
AI
Krishna states that those who, out of envy, disregard and do not follow His teaching are deluded in all knowledge. He tells Arjuna to consider them devoid of discrimination and utterly lost.
सारांश
AI
किंतु जो लोग दोष निकालते हुए मेरे इस मत का अनुसरण नहीं करते, उन विवेकहीनों को समस्त ज्ञान में मोहित और नष्ट हुआ समझो।
३.३३
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥
Summary
AI
Even a person of knowledge acts according to their own inherent nature. All beings follow their nature; what can restraint accomplish? This verse emphasizes the powerful influence of one's innate disposition (prakriti).
सारांश
AI
सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार कार्य करते हैं, यहाँ तक कि ज्ञानी भी स्वभाव के वश होता है; ऐसी स्थिति में हठ क्या कर पाएगा?
३.३४
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥
Summary
AI
Attachment (raga) and aversion (dvesha) for the objects of the senses are naturally established. One should not come under their control, for they are one's two enemies on the path.
सारांश
AI
प्रत्येक इंद्रिय के विषयों में राग और द्वेष स्थित होते हैं। मनुष्य को इनके वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये कल्याण मार्ग के बाधक शत्रु हैं।
३.३५
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
Summary
AI
It is better to perform one's own duty (svadharma), even imperfectly, than to perform another's duty perfectly. Death in the course of performing one's own duty is preferable, as another's duty is fraught with danger.
सारांश
AI
अच्छी तरह पालन किए गए परधर्म से गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मृत्यु भी श्रेयस्कर है, जबकि दूसरे का धर्म भयावह होता है।
अर्जुन उवाच ।
३.३६
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥
Summary
AI
Arjuna asks Krishna, "O Varshneya (descendant of Vrishni), by what is a person impelled to commit sin, as if forcibly engaged, even against their own will?"
सारांश
AI
हे वार्ष्णेय! मनुष्य न चाहते हुए भी किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है, मानो उसे किसी ने बलपूर्वक उस काम में लगा दिया हो?
श्रीभगवानुवाच ।
३.३७
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
Summary
AI
Krishna replies: It is desire (kama) and anger (krodha), born from the quality of Rajas (passion). Know this to be the all-devouring, greatly sinful enemy here in this world.
सारांश
AI
रजोगुण से उत्पन्न होने वाला 'काम' ही 'क्रोध' है, जो कभी न तृप्त होने वाला और महापापी है। इसे ही संसार में अपना मुख्य शत्रु समझो।
३.३८
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥
Summary
AI
Just as fire is covered by smoke, a mirror by dust, and an embryo by the womb, so is this (knowledge) covered by that (desire).
सारांश
AI
जिस प्रकार अग्नि धुएँ से, दर्पण धूल से और गर्भ झिल्ली से ढका रहता है, उसी प्रकार इस काम के द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढका हुआ है।
३.३९
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥
Summary
AI
O son of Kunti (Arjuna), knowledge is covered by this constant enemy of the wise, which is in the form of desire (kama), an insatiable fire.
सारांश
AI
हे कौन्तेय! इस काम रूपी नित्य शत्रु और कभी न तृप्त होने वाली अग्नि के द्वारा ज्ञानियों का विवेक ढका रहता है।
३.४०
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥
Summary
AI
The senses, the mind, and the intellect are said to be its seat. Through these, desire deludes the embodied soul by covering its knowledge.
सारांश
AI
इंद्रियाँ, मन और बुद्धि इस काम के निवास स्थान कहे गए हैं। यह काम इनके माध्यम से ज्ञान को ढककर जीवात्मा को भ्रमित करता है।
३.४१
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहिह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥
पाप्मानं प्रजहिह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥
Summary
AI
Therefore, O best of the Bharatas (Arjuna), first control the senses. Then, you must certainly slay this sinful thing (desire), which is the destroyer of both knowledge (jnana) and wisdom (vijnana).
सारांश
AI
इसलिए हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन, तुम सबसे पहले अपनी इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले इस पापी काम का विनाश करो।
३.४२
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥
Summary
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They say the senses are superior (to the body). Superior to the senses is the mind. Superior to the mind is the intellect. And what is superior even to the intellect, is He (the Self).
सारांश
AI
इन्द्रियों को शरीर से श्रेष्ठ कहा जाता है, इन्द्रियों से परे मन है, मन से श्रेष्ठ बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यंत परे है, वह आत्मा है।
३.४३
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥
Summary
AI
Thus, O mighty-armed Arjuna, knowing that which is superior to the intellect, and steadying the self by the self, conquer this formidable enemy in the form of desire.
सारांश
AI
इस प्रकार बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को स्थिर करके, हे महाबाहो, तुम काम रूपी इस दुर्जेय शत्रु को मार डालो।
॥ इति तृतीयोऽध्यायः (कर्मयोगः) ॥
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