अन्वयः
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पुरुषः कर्मणाम् अनारम्भात् नैष्कर्म्यम् न अश्नुते । च संन्यसनात् एव सिद्धिम् न समधिगच्छति ।
Summary
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A person does not attain freedom from the bondage of action (naishkarmya) by merely abstaining from work, nor does one reach perfection by renunciation alone.
सारांश
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मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किए बिना निष्कर्मता को प्राप्त होता है और न ही केवल कर्मों के त्याग से सिद्धि प्राप्त कर सकता है।
पदच्छेदः
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| न | न | not |
| कर्मणाम् | कर्मन् (६.३) | of actions |
| अनारम्भात् | नञ्–आरम्भ (५.१) | from non-commencement |
| नैष्कर्म्यम् | नैष्कर्म्य (२.१) | freedom from action |
| पुरुषः | पुरुष (१.१) | a person |
| अश्नुते | अश्नुते (√अश् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | attains |
| न | न | nor |
| च | च | and |
| संन्यसनात् | संन्यसन (५.१) | by renunciation |
| एव | एव | merely |
| सिद्धिम् | सिद्धि (२.१) | perfection |
| समधिगच्छति | समधिगच्छति (सम्+अधि√गम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attains |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | क | र्म | णा | म | ना | र | म्भा |
| न्नै | ष्क | र्म्यं | पु | रु | षो | ऽश्नु | ते |
| न | च | सं | न्य | स | ना | दे | व |
| सि | द्धिं | स | म | धि | ग | च्छ | ति |
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