श्रीभगवानुवाच ।
४.१
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
Summary
AI
The Lord said: I taught this imperishable yoga to Vivasvan (the sun-god). Vivasvan taught it to Manu, and Manu told it to Ikshvaku.
सारांश
AI
मैंने इस अविनाशी योग का उपदेश सूर्यदेव विवस्वान को दिया था, विवस्वान ने इसे मनु से कहा और मनु ने इसे राजा इक्ष्वाकु को बताया।
४.२
एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥
स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥
Summary
AI
O Parantapa (Arjuna), this yoga, received thus through a continuous tradition, was known by the royal sages. But over a long time, that yoga was lost in this world.
सारांश
AI
परंपरा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किंतु लंबे समय के प्रभाव से वह योग इस पृथ्वी पर लुप्तप्राय हो गया।
४.३
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥
Summary
AI
That very same ancient yoga is today being declared by Me to you, because you are My devotee and friend. Indeed, this is the supreme secret.
सारांश
AI
तुम मेरे भक्त और प्रिय मित्र हो, इसलिए वही पुरातन और अत्यंत रहस्यमयी योग आज मैंने तुम्हें पुनः प्रदान किया है।
अर्जुन उवाच ।
४.४
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥
Summary
AI
Arjuna said: Your birth was recent, and the birth of Vivasvan was long ago. How am I to understand that you taught this in the beginning?
सारांश
AI
अर्जुन ने पूछा कि आपका जन्म तो आधुनिक है जबकि विवस्वान का जन्म अत्यंत प्राचीन, तो मैं यह कैसे मानूँ कि सृष्टि के आरंभ में आपने ही उन्हें यह उपदेश दिया था?
श्रीभगवानुवाच ।
४.५
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥
Summary
AI
The Lord replied: O Arjuna, many births of Mine have passed, and yours also. O Parantapa, I know all of them, but you do not.
सारांश
AI
श्रीकृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन, मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म हो चुके हैं; मैं उन सबको जानता हूँ, परंतु तुम्हें उनका स्मरण नहीं है।
४.६
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥
Summary
AI
Although I am unborn and My transcendental body never deteriorates, and although I am the Lord of all living beings, I still appear in every millennium in My original form by controlling My own nature (Prakriti) through My divine energy (Atma-maya).
सारांश
AI
अजन्मा, अविनाशी और समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी, मैं अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।
४.७
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
Summary
AI
O descendant of Bharata, whenever and wherever there is a decline in righteousness and a predominant rise of irreligion—at that time I manifest Myself.
सारांश
AI
हे भारत, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं को साकार रूप में सृजित करता हूँ।
४.८
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥
Summary
AI
To protect the righteous, to annihilate the wicked, and to reestablish the principles of dharma, I appear millennium after millennium.
सारांश
AI
सज्जनों के कल्याण, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए मैं युग-युग में अवतार लेता हूँ।
४.९
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥
Summary
AI
O Arjuna, one who knows the transcendental nature of My appearance and activities in this way, upon leaving the body, does not take birth again but comes to Me.
सारांश
AI
हे अर्जुन, जो मेरे दिव्य जन्म और कर्मों के तत्व को वास्तविक रूप में जान लेता है, वह देह त्यागने के बाद पुनर्जन्म को प्राप्त न होकर मुझमें ही लीन हो जाता है।
४.१०
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥
Summary
AI
Freed from attachment, fear, and anger, being fully absorbed in Me and taking refuge in Me, many people, purified by the austerity of knowledge, have attained My state of being.
सारांश
AI
राग, भय और क्रोध से मुक्त, मुझमें तन्मय और मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त ज्ञान रूपी तप से पवित्र होकर मेरे सायुज्य को प्राप्त कर चुके हैं।
४.११
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
Summary
AI
O Partha, in whatever way people surrender unto Me, I reward them accordingly. Everyone follows My path in all respects.
सारांश
AI
जो भक्त जिस भाव से मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी रूप में फल देता हूँ; सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
४.१२
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥
Summary
AI
In this world, those desiring success in their actions worship the demigods, because success born of action is obtained quickly in the human world.
सारांश
AI
सांसारिक कर्मों की सफलता चाहने वाले लोग यहाँ देवताओं की उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों से मिलने वाली सिद्धि शीघ्र प्राप्त हो जाती है।
४.१३
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
Summary
AI
The fourfold social order was created by Me according to the divisions of qualities (gunas) and actions (karma). Although I am its creator, know Me to be the non-doer and the immutable.
सारांश
AI
गुणों और कर्मों के विभाजन के आधार पर चारों वर्णों की रचना मेरे द्वारा की गई है; इसका कर्ता होने पर भी मुझे अविनाशी अकर्ता ही जानो।
४.१४
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥
Summary
AI
Actions do not affect Me, nor do I desire their fruits. One who truly understands this about Me is not bound by the karmic reactions of their work.
सारांश
AI
कर्म मुझे लिप्त नहीं करते और न ही मुझे कर्मों के फल की कोई लालसा है; जो मुझे इस सत्य के साथ जान लेता है, वह कर्मों के बंधन में नहीं फँसता।
४.१५
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥
Summary
AI
Knowing this, even the ancient seekers of liberation performed action. Therefore, you should also perform your duty, following the path of the ancients.
सारांश
AI
पूर्व काल के मुमुक्षुओं ने भी इसी सत्य को जानकर कर्म किए थे, अतः तुम भी अपने पूर्वजों द्वारा प्राचीन काल से किए गए कर्मों का ही पालन करो।
४.१६
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
Summary
AI
Even the wise are confused about what constitutes action and inaction. I shall explain that principle of action to you, knowing which you will be liberated from all that is inauspicious.
सारांश
AI
कर्म क्या है और अकर्म क्या है—इस विषय में बुद्धिमान भी भ्रमित रहते हैं; मैं तुम्हें वह कर्म समझाऊँगा जिसे जानकर तुम संसार के अशुभ से मुक्त हो जाने में सक्षम होगे।
४.१७
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥
Summary
AI
One must understand the nature of proper action (karma), forbidden action (vikarma), and inaction (akarma). The intricacies of action are indeed profound and difficult to grasp.
सारांश
AI
कर्म के स्वरूप को समझना चाहिए, साथ ही निषिद्ध कर्म और अकर्म को भी जानना आवश्यक है, क्योंकि कर्म की गति अत्यंत गहन है।
४.१८
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥
Summary
AI
One who sees inaction in action and action in inaction is truly intelligent among humans. Such a person is a true yogi and has accomplished all actions.
सारांश
AI
जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और समस्त कार्यों को करते हुए भी योगी है।
४.१९
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥
Summary
AI
The wise call him a sage whose every undertaking is free from the motivation of desire and whose actions have been consumed by the fire of knowledge.
सारांश
AI
जिसके समस्त कर्म संकल्प और कामनाओं से रहित हैं और जिसके कर्म ज्ञान की अग्नि में भस्म हो गए हैं, उसे ज्ञानी जन पंडित कहते हैं।
४.२०
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ॥
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ॥
Summary
AI
Having given up attachment to the fruits of action, being ever-content and not dependent on anyone, such a person, though fully engaged in activity, in reality does nothing at all.
सारांश
AI
कर्मफल की आसक्ति को त्यागकर, जो नित्य तृप्त और आश्रयहीन है, वह कर्मों में पूरी तरह संलग्न रहने पर भी वास्तव में कुछ नहीं करता।
४.२१
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
Summary
AI
Free from expectations, with mind and self under control, and having relinquished all sense of ownership, one who performs action merely for the body's maintenance does not incur sin.
सारांश
AI
जिसने आशाओं को त्याग दिया है, मन और शरीर को जीत लिया है और समस्त संग्रह का त्याग कर दिया है, वह केवल शरीर से कर्म करते हुए भी पाप को प्राप्त नहीं होता।
४.२२
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥
Summary
AI
Content with whatever comes by chance, beyond the dualities of pleasure and pain, free from envy, and steady in both success and failure, such a person is not bound by their actions, even while performing them.
सारांश
AI
जो स्वतः प्राप्त लाभ में संतुष्ट रहता है, सुख-दुःख आदि द्वंद्वों से मुक्त है, ईर्ष्या रहित है और सफलता-असफलता में समान रहता है, वह कर्म करके भी बंधन में नहीं पड़ता।
४.२३
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥
Summary
AI
For one who is free from attachment, liberated, with a mind firmly established in knowledge, and who performs actions as a sacrifice (yajña), their entire karma dissolves completely.
सारांश
AI
जिसकी आसक्ति मिट गई है, जो मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है और जो केवल यज्ञ के लिए कर्म करता है, उसके समस्त कर्म पूर्णतः विलीन हो जाते हैं।
४.२४
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥
Summary
AI
For such a person, the act of offering is Brahman, the oblation is Brahman, offered by Brahman into the fire of Brahman. Brahman is the goal to be reached by one who sees Brahman in all actions.
सारांश
AI
अर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्म रूप कर्ता द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि में जो आहुति दी जाती है वह भी ब्रह्म है; ऐसे ब्रह्म-कर्म में स्थित व्यक्ति के लिए प्राप्तव्य गंतव्य भी ब्रह्म ही है।
४.२५
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥
Summary
AI
Some yogis perform sacrifices to worship the celestial gods, while others, the transcendentalists, offer the self as a sacrifice into the fire of the Absolute Brahman.
सारांश
AI
कुछ योगी देवताओं के पूजन रूप यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं, तो अन्य ज्ञानीजन ब्रह्म रूपी अग्नि में स्वयं को ही यज्ञ के माध्यम से अर्पित करते हैं।
४.२६
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥
Summary
AI
Some sacrifice their senses, such as hearing, into the fires of self-control. Others sacrifice the objects of the senses, such as sound, into the fires of the senses.
सारांश
AI
अन्य योगी श्रोत्र आदि इंद्रियों को संयम रूपी अग्नि में हवन करते हैं, और कुछ शब्दादि विषयों को इंद्रिय रूपी अग्नि में अर्पित करते हैं।
४.२७
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥
Summary
AI
Others offer all the activities of their senses and the functions of their life-breaths as oblations into the fire of the yoga of self-control, a fire kindled by knowledge.
सारांश
AI
दूसरे योगी इंद्रियों की समस्त क्रियाओं और प्राणों की गतिविधियों को ज्ञान से प्रकाशित आत्म-संयम रूपी योग की अग्नि में हवन करते हैं।
४.२८
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥
Summary
AI
There are others who, with strict vows, perform sacrifices of their material possessions, of their austerities, of their yoga practice, or of their scriptural study and cultivation of knowledge.
सारांश
AI
कठिन व्रत रखने वाले कई साधक द्रव्य संबंधी यज्ञ, तपस्या रूपी यज्ञ, योग रूपी यज्ञ तथा स्वाध्याय एवं ज्ञान रूपी यज्ञ करने वाले होते हैं।
४.२९
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥
Summary
AI
Others, dedicated to the practice of breath control (pranayama), restrain the flow of the outgoing and incoming breaths, offering the outgoing breath into the incoming, and the incoming breath into the outgoing.
सारांश
AI
कई योगी अपान वायु में प्राण का और प्राण में अपान का हवन करते हैं, तथा प्राण और अपान की गति रोककर प्राणायाम के परायण रहते हैं।
४.३०
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥
Summary
AI
Still others, by regulating their diet, sacrifice their life-breaths into the life-breaths. All these are knowers of sacrifice, and through these sacrifices, their sins are cleansed.
सारांश
AI
कुछ अन्य नियमित आहार करने वाले प्राणों का प्राणों में ही हवन करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले यज्ञ द्वारा अपने पापों को नष्ट कर चुके होते हैं।
४.३१
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥
Summary
AI
O best of the Kurus, those who enjoy the nectar-like remnants of sacrifice attain the eternal Brahman. For one who performs no sacrifice, this world is not for them, let alone the next.
सारांश
AI
यज्ञ से बचे हुए अमृत रूप अन्न का भोजन करने वाले शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ न करने वाले के लिए यह लोक भी सुखद नहीं है, तो परलोक कैसे होगा?
४.३२
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥
Summary
AI
In this way, many types of sacrifices are described in the Vedas. Know them all to be born of action. Understanding this, you will attain liberation.
सारांश
AI
इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको तू कर्म से उत्पन्न जान; ऐसा जानकर तू संसार-बंधन से मुक्त हो जाएगा।
४.३३
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥
Summary
AI
O chastiser of the foe, O Partha, the sacrifice performed through knowledge is far superior to any sacrifice of material possessions. Ultimately, all actions in their entirety culminate in transcendental knowledge.
सारांश
AI
हे परंतप! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यंत श्रेष्ठ है। हे पार्थ! समस्त कर्मों की पूर्ण समाप्ति ज्ञान में ही होती है।
४.३४
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
Summary
AI
Learn this truth by approaching a spiritual master. Inquire from them with reverence and render service unto them. The self-realized souls, who have seen the truth, will impart knowledge to you.
सारांश
AI
उस ज्ञान को तू गुरु को दंडवत प्रणाम करके, सेवा करके और निष्कपट प्रश्न पूछकर प्राप्त कर। वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी तुझे ज्ञान का उपदेश देंगे।
४.३५
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥
Summary
AI
O Pandava, once you have this knowledge, you will never again fall into such delusion. By this knowledge, you will see that all living beings are but a part of the Self, and that they are in Me, and are Mine.
सारांश
AI
जिसे जानकर तू फिर कभी ऐसे मोह को प्राप्त नहीं होगा और जिसके द्वारा तू समस्त भूतों को पहले अपने आप में और फिर मुझ परमात्मा में देखेगा।
४.३६
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि ॥
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि ॥
Summary
AI
Even if you are considered the most sinful of all sinners, you will be able to cross over the ocean of miseries by boarding the boat of transcendental knowledge.
सारांश
AI
यदि तू समस्त पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञान रूपी नौका द्वारा निःसंदेह संपूर्ण पाप-समुद्र को पार कर जाएगा।
४.३७
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥
Summary
AI
O Arjuna, just as a blazing fire turns firewood to ashes, the fire of knowledge burns to ashes all reactions to material activities.
सारांश
AI
हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान रूपी अग्नि समस्त कर्मों को पूरी तरह भस्म कर देती है।
४.३८
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥
Summary
AI
In this world, there is nothing as sublime and pure as transcendental knowledge. One who becomes perfected in the practice of yoga enjoys this knowledge within the self in due course of time.
सारांश
AI
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निस्संदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को योग में सिद्ध हुआ मनुष्य समय आने पर अपने आप ही आत्मा में पा लेता है।
४.३९
श्रद्धावाल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥
Summary
AI
A person of faith, who is dedicated and has controlled senses, attains knowledge. Having attained that knowledge, they quickly achieve supreme peace.
सारांश
AI
श्रद्धा रखने वाला, तत्पर और इंद्रियों को वश में रखने वाला मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान प्राप्त कर वह तत्काल परम शांति को प्राप्त हो जाता है।
४.४०
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥
Summary
AI
The ignorant, the faithless, and the person full of doubt perish. For the doubting soul, there is neither this world, nor the world beyond, nor any happiness.
सारांश
AI
विवेकहीन, श्रद्धारहित और संशयात्मा मनुष्य नष्ट हो जाता है। संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक और न ही सुख है।
४.४१
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥
Summary
AI
O Dhananjaya (Arjuna), actions do not bind the one who has renounced them through yoga, whose doubts are severed by knowledge, and who is self-possessed.
सारांश
AI
हे धनंजय! जिसने कर्मयोग द्वारा अपने कर्मों को परमात्मा को समर्पित कर दिया है, जिसके संशय ज्ञान द्वारा मिट चुके हैं और जो आत्मज्ञानी है, उसे कर्म नहीं बाँधते।
४.४२
तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥
Summary
AI
Therefore, O Bharata, with the sword of knowledge, cut this doubt in your heart which is born of ignorance. Resort to yoga and stand up.
सारांश
AI
इसलिए हे भारत! अपने हृदय में स्थित अज्ञान जनित इस संशय को ज्ञान रूपी तलवार से काटकर, तुम योग में स्थित हो जाओ और युद्ध के लिए उठ खड़े हो।
॥ इति चतुर्थोऽध्यायः (ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः) ॥
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