श्रीभगवानुवाच ।
६.१
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥
Summary
AI
The Supreme Lord said: One who performs their obligatory duty without being attached to the fruits of action is a true renunciant and a yogi, not one who lights no sacred fire or performs no work.
सारांश
AI
जो कर्मफल का आश्रय न लेकर कर्तव्य कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है; केवल अग्नि या क्रियाओं का त्याग करने वाला नहीं।
६.२
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥
Summary
AI
O son of Pandu, know that what is called renunciation is the same as Yoga, for no one can become a yogi without renouncing selfish desires.
सारांश
AI
जिसे संन्यास कहते हैं, उसे ही योग जानो; क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी योगी नहीं हो सकता।
६.३
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥
Summary
AI
For the sage who is aspiring to attain Yoga, action is said to be the means. For that same person who has already attained Yoga, tranquility is said to be the means.
सारांश
AI
योग में आरूढ़ होने की इच्छा रखने वाले मुनि के लिए कर्म साधन है, और योगारूढ़ हो जाने पर शांति ही साधन कही जाती है।
६.४
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥
Summary
AI
When a person is not attached to sense objects or to actions, having renounced all selfish desires, they are then said to be established in Yoga.
सारांश
AI
जब मनुष्य न तो इंद्रियों के विषयों में और न ही कर्मों में आसक्त होता है, तथा समस्त संकल्पों का त्यागी हो जाता है, तब वह योगारूढ़ कहलाता है।
६.५
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
Summary
AI
One must elevate the self by the self; one must not degrade the self. For the self alone is the friend of the self, and the self alone is the enemy of the self.
सारांश
AI
मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, स्वयं को अधोगति में नहीं डालना चाहिए; क्योंकि आत्मा ही अपना मित्र है और आत्मा ही अपना शत्रु है।
६.६
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥
Summary
AI
For one who has conquered the self by the self, the self is a friend. But for one who has not conquered the self, their own self acts in enmity, like an enemy.
सारांश
AI
जिसने स्वयं के द्वारा स्वयं को जीत लिया है, उसके लिए उसका मन मित्र है; परंतु जिसने मन को नहीं जीता, उसके लिए मन ही शत्रु के समान व्यवहार करता है।
६.७
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानावमानयोः ॥
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानावमानयोः ॥
Summary
AI
For one who has conquered the self and is tranquil, the Supreme Self is steadfastly established. Such a person is equipoised in cold and heat, happiness and sorrow, as well as in honor and dishonor.
सारांश
AI
जिसने स्वयं को जीत लिया है और जो शांत है, उसका परमात्मा सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में पूर्णतः स्थित रहता है।
६.८
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥
Summary
AI
A yogi whose self is satisfied with knowledge and realization, who is unchanging and has conquered the senses, is said to be steadfast. Such a person views a clod of earth, a stone, and gold with equal vision.
सारांश
AI
ज्ञान-विज्ञान से तृप्त, अडिग, इंद्रियजित और मिट्टी, पत्थर व स्वर्ण को समान समझने वाला योगी 'युक्त' कहलाता है।
६.९
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥
Summary
AI
A person is considered superior who has an impartial intellect towards benefactors, friends, foes, the indifferent, mediators, the hateful, relatives, the righteous, and the sinful.
सारांश
AI
सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेषी, बंधु, साधु और पापियों में समान बुद्धि रखने वाला व्यक्ति विशेष श्रेष्ठ माना जाता है।
६.१०
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥
Summary
AI
A yogi should constantly concentrate the self, remaining in a secluded place, alone, with mind and self controlled, free from desires and possessions.
सारांश
AI
योगी को एकांत में रहकर, अकेले ही, मन और शरीर को वश में करते हुए, कामना और संग्रह से रहित होकर निरंतर आत्मा को योग में लगाना चाहिए।
६.११
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥
Summary
AI
Having established for oneself in a clean place a firm seat, neither too high nor too low, covered with kusha grass, a deerskin, and a cloth, one over the other... (This verse continues into the next).
सारांश
AI
शुद्ध स्थान पर कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछाकर अपना स्थिर आसन लगाना चाहिए, जो न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा।
६.१२
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥
Summary
AI
Seated there on that seat, with controlled mind, senses, and actions, one should make the mind one-pointed and practice Yoga for the purification of the self.
सारांश
AI
उस आसन पर बैठकर मन को एकाग्र कर और इंद्रियों व चित्त की क्रियाओं को वश में रखते हुए, आत्मशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करना चाहिए।
६.१३
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥
Summary
AI
Holding the body, head, and neck erect, still, and steady; gazing intently at the tip of one's own nose, and not looking around in any direction... (This verse continues into the next).
सारांश
AI
शरीर, सिर और गर्दन को सीधा व स्थिर रखकर, अन्य दिशाओं को न देखते हुए अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि टिकाकर बैठना चाहिए।
६.१४
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥
Summary
AI
With a serene and fearless mind, established in the vow of celibacy, and having controlled the mind, one should sit absorbed, with the mind fixed on Me, considering Me the supreme goal.
सारांश
AI
शांत चित्त, भयरहित और ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित होकर, मन को वश में कर, मुझमें मन लगाकर और मेरे परायण होकर बैठना चाहिए।
६.१५
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥
Summary
AI
Thus, constantly engaging the self with a disciplined mind, the yogi attains the supreme peace of liberation, which abides in Me.
सारांश
AI
इस प्रकार निरंतर योग में लगा हुआ संयमित मन वाला योगी मुझमें स्थित रहने वाली परम निर्वाण रूप शांति को प्राप्त करता है।
६.१६
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥
Summary
AI
O Arjuna, Yoga is not for one who eats too much or eats too little, nor for one who sleeps too much or stays awake too much.
सारांश
AI
यह योग न तो बहुत खाने वाले के लिए है, न बिल्कुल न खाने वाले के लिए, न बहुत सोने वाले के लिए और न सदा जागने वाले के लिए।
६.१७
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥
Summary
AI
For one who is moderate in eating and recreation, moderate in effort in actions, and moderate in sleep and wakefulness, Yoga becomes the destroyer of all sorrows.
सारांश
AI
जिसका आहार-विहार संतुलित है, कर्मों में चेष्टा नियमित है और सोना-जागना व्यवस्थित है, उसी का योग दुखों का नाश करने वाला होता है।
६.१८
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥
Summary
AI
When the well-controlled mind rests steady in the Self alone, free from longing for all desires, then one is said to be 'yukta' or united in yoga.
सारांश
AI
जब विशेष रूप से वश में किया गया चित्त केवल आत्मा में ही स्थित हो जाता है और समस्त कामनाओं से रहित हो जाता है, तब वह 'युक्त' कहलाता है।
६.१९
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥
Summary
AI
Just as a lamp in a windless place does not flicker, this is the analogy used for a yogi with a controlled mind who is practicing the yoga of the Self.
सारांश
AI
जिस प्रकार वायु रहित स्थान में रखा दीपक हिलता नहीं है, वही उपमा आत्म-चिंतन में लगे हुए संयमित चित्त वाले योगी की दी गई है।
६.२०
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥
Summary
AI
The state in which the mind, restrained by the practice of yoga, attains quietude, and in which, seeing the Self by the purified mind, the yogi rejoices in the Self.
सारांश
AI
जहाँ योग के अभ्यास से चित्त शांत हो जाता है और जहाँ मनुष्य स्वयं के द्वारा स्वयं को देखता हुआ अपने आप में ही संतुष्ट रहता है।
६.२१
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥
Summary
AI
In that state, the yogi experiences that infinite happiness which is beyond the senses and graspable only by the intellect. Established in this state, one never swerves from the ultimate truth.
सारांश
AI
जिस अवस्था में बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य इन्द्रियातीत अनन्त सुख का अनुभव होता है और जहाँ स्थित होने पर योगी तत्व से कभी विचलित नहीं होता।
६.२२
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥
Summary
AI
Having obtained which, one considers no other gain to be greater than it. Established in which, one is not shaken even by the greatest sorrow.
सारांश
AI
जिसे प्राप्त कर वह उससे बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं मानता और जिसमें स्थित होने पर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता।
६.२३
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥
Summary
AI
One should know that state, which is the disunion from the union with pain, to be Yoga. This Yoga must be practiced with determination and an undismayed heart.
सारांश
AI
दुःख के संयोग से वियोग की उस स्थिति को 'योग' नाम से जानना चाहिए। इस योग का अभ्यास बिना ऊब के और दृढ़ निश्चय के साथ करना चाहिए।
६.२४
संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥
Summary
AI
Having completely abandoned all desires born of worldly resolve, and having fully restrained the multitude of senses from all sides by the mind alone... (This verse is a precursor to the next).
सारांश
AI
संकल्पों से उत्पन्न होने वाली समस्त कामनाओं को पूरी तरह त्याग कर और मन के माध्यम से ही इन्द्रिय समूह को सभी ओर से वश में करके।
६.२५
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥
Summary
AI
One should gradually withdraw, with the intellect held in firmness. Having established the mind in the Self, one should not think of anything at all.
सारांश
AI
धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे विश्राम पाए तथा मन को परमात्मा में स्थित करके अन्य कुछ भी चिन्तन न करे।
६.२६
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥
Summary
AI
From whatever cause the restless and unsteady mind wanders away, one should restrain it from that and bring it back under the control of the Self alone.
सारांश
AI
यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटके, वहाँ-वहाँ से इसे रोककर बार-बार आत्मा के ही वश में लाना चाहिए।
६.२७
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥
Summary
AI
Indeed, supreme happiness comes to that yogi whose mind is perfectly serene, whose passion is quieted, who is sinless, and who has become one with Brahman.
सारांश
AI
जिसका मन शान्त है, जिसकी रजोगुणी वृत्तियाँ मिट गई हैं, जो निष्पाप है और ब्रह्मस्वरूप हो गया है, ऐसे योगी को उत्तम सुख प्राप्त होता है।
६.२८
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥
Summary
AI
Thus, constantly engaging the self in yoga, the yogi, freed from all impurities, easily enjoys the infinite bliss of contact with Brahman.
सारांश
AI
इस प्रकार स्वयं को निरंतर योग में लगाते हुए निष्पाप योगी सुगमता से परब्रह्म के स्पर्श रूपी अनन्त सुख का अनुभव करता है।
६.२९
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥
Summary
AI
One whose self is harmonized by yoga, who sees the same everywhere, beholds the Self abiding in all beings and all beings in the Self.
सारांश
AI
योगयुक्त आत्मा वाला व्यक्ति, जो सर्वत्र समभाव से देखता है, वह अपने आत्मा को समस्त भूतों में और समस्त भूतों को अपने आत्मा में देखता है।
६.३०
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
Summary
AI
For one who sees Me everywhere and sees everything in Me, I am never lost to them, nor are they ever lost to Me.
सारांश
AI
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता।
६.३१
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥
Summary
AI
The yogi who, established in oneness, worships Me abiding in all beings, abides in Me, no matter how they may be acting.
सारांश
AI
जो एकता में स्थित होकर समस्त भूतों में स्थित मेरा भजन करता है, वह योगी सब प्रकार से व्यवहार करते हुए भी मुझमें ही निवास करता है।
६.३२
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥
Summary
AI
O Arjuna, one who sees with equality everywhere, by the analogy of their own self, whether it be happiness or sorrow, that yogi is considered the highest.
सारांश
AI
हे अर्जुन! जो अपनी तुलना से सर्वत्र सुख और दुःख को समान देखता है, वह श्रेष्ठ योगी माना जाता है।
अर्जुन उवाच ।
६.३३
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥
Summary
AI
Arjuna said: O Madhusudana, this yoga of equanimity which has been declared by You, I do not see its steady endurance, due to the restlessness of the mind.
सारांश
AI
अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन! आपने जो यह समभाव रूपी योग कहा है, मन की चंचलता के कारण मैं इसकी स्थायी स्थिति नहीं देख पा रहा हूँ।
६.३४
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥
Summary
AI
For the mind, O Krishna, is restless, turbulent, strong, and obstinate. I consider its control to be as difficult as that of the wind.
सारांश
AI
हे कृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, मन्थन करने वाला, बलवान और हठी है। इसे वश में करना मैं वायु को रोकने के समान अत्यन्त कठिन मानता हूँ।
श्रीभगवानुवाच ।
६.३५
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
Summary
AI
The Lord said: O mighty-armed one, undoubtedly the mind is restless and difficult to control. But, O son of Kunti, it can be restrained by practice and by dispassion.
सारांश
AI
श्री भगवान ने कहा: हे महाबाहो! निःसन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, किन्तु हे कुन्तीपुत्र! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जाता है।
६.३६
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥
Summary
AI
Yoga is difficult to attain for one of uncontrolled self, this is My opinion. But by the self-controlled who strives, it is possible to attain through the right means.
सारांश
AI
जिसका मन वश में नहीं है, उसके द्वारा योग प्राप्त करना कठिन है, परन्तु मन को वश में करने वाले प्रयत्नशील व्यक्ति के लिए उपाय द्वारा इसे प्राप्त करना सम्भव है।
अर्जुन उवाच ।
६.३७
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥
Summary
AI
Arjuna said: O Krishna, what is the fate of one who, though endowed with faith, is of uncontrolled mind, and whose mind has strayed from yoga, failing to attain its perfection?
सारांश
AI
अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! जो श्रद्धावान तो है किन्तु प्रयत्नशील नहीं है और जिसका मन योग से विचलित हो गया है, वह योग-सिद्धि न पाकर किस गति को प्राप्त होता है?
६.३८
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥
Summary
AI
O mighty-armed Krishna, having fallen from both paths (of action and meditation), without any support and bewildered on the path to Brahman, does he not perish like a scattered cloud?
सारांश
AI
हे महाबाहो! क्या वह ब्रह्म-प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रयहीन होकर छिन्न-भिन्न बादल की तरह दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?
६.३९
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥
Summary
AI
O Krishna, you should dispel this doubt of mine completely. For no one other than You can be found to destroy this doubt.
सारांश
AI
हे कृष्ण! मेरे इस संशय को आप पूर्णतः दूर करने के योग्य हैं, क्योंकि आपके अतिरिक्त इस संशय का निवारण करने वाला दूसरा कोई मिलना सम्भव नहीं है।
श्रीभगवानुवाच ।
६.४०
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥
Summary
AI
The Lord said: O Partha, there is no destruction for him either in this world or in the next. For, O dear one, anyone who does good never comes to a sad end.
सारांश
AI
श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! उस पुरुष का न इस लोक में और न परलोक में ही विनाश होता है; क्योंकि हे प्यारे मित्र! कल्याणकारी कार्य करने वाला कोई भी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
६.४१
प्राप्य पुण्यकृताल्लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥
Summary
AI
The one who has fallen from yoga, after attaining the worlds of the righteous and dwelling there for countless years, is born in the house of the pure and prosperous.
सारांश
AI
योग से विचलित व्यक्ति पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त कर और वहाँ लम्बे समय तक निवास कर, पवित्र और समृद्ध मनुष्यों के घर में जन्म लेता है।
६.४२
अथ वा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥
Summary
AI
Or, he is born into a family of wise yogis. Indeed, such a birth is very difficult to obtain in this world.
सारांश
AI
अथवा वह बुद्धिमान योगियों के कुल में जन्म लेता है। संसार में इस प्रकार का जन्म निश्चित रूप से अत्यंत दुर्लभ है।
६.४३
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥
Summary
AI
O son of Kuru, on taking birth again, he regains the divine consciousness of his previous life, and he again strives from there for complete success.
सारांश
AI
वहाँ वह अपने पूर्व जन्म के संस्कारों और बुद्धि-संयोग को पुनः प्राप्त करता है, और हे कुरुनंदन, वह सिद्धि के लिए पुनः और अधिक प्रयत्न करता है।
६.४४
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥
Summary
AI
By virtue of his previous practice, he is irresistibly carried towards yoga, even against his will. Such an inquisitive transcendentalist surpasses the ritualistic principles of the scriptures.
सारांश
AI
अपने पूर्व जन्म के अभ्यास के कारण वह न चाहते हुए भी योग की ओर आकर्षित होता है। योग का केवल जिज्ञासु भी वेदों के कर्मकांडीय विधानों का अतिक्रमण कर जाता है।
६.४५
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥
Summary
AI
And when the yogi engages with sincere endeavor, cleansed of all contaminations, and perfected over many, many births, he finally attains the supreme destination.
सारांश
AI
प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी, जिसके पाप नष्ट हो गए हैं, अनेक जन्मों की साधना से सिद्ध होकर परम गति को प्राप्त करता है।
॥ इति षष्ठोऽध्यायः (आत्मसंयमयोगः) ॥
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.