अन्वयः
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यदा हि (योगी) इन्द्रिय-अर्थेषु न अनुषज्जते, कर्मसु न (अनुषज्जते), (तदा सः) सर्व-संकल्प-संन्यासी (भूत्वा) योग-आरूढः उच्यते ।
Summary
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When a person is not attached to sense objects or to actions, having renounced all selfish desires, they are then said to be established in Yoga.
सारांश
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जब मनुष्य न तो इंद्रियों के विषयों में और न ही कर्मों में आसक्त होता है, तथा समस्त संकल्पों का त्यागी हो जाता है, तब वह योगारूढ़ कहलाता है।
पदच्छेदः
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| यदा | यदा | When |
| हि | हि | indeed |
| न | न | not |
| इन्द्रियार्थेषु | इन्द्रिय–अर्थ (७.३) | in the objects of the senses |
| न | न | not |
| कर्मसु | कर्मन् (७.३) | in actions |
| अनुषज्जते | अनुषज्जते (अनु√सञ्ज् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is attached |
| सर्वसंकल्पसंन्यासी | सर्व–संकल्प–संन्यासिन् (१.१) | one who has renounced all selfish desires |
| योगारूढः | योग–आरूढ (आ√रुह्+क्त, १.१) | is said to be established in Yoga |
| तदा | तदा | then |
| उच्यते | उच्यते (√वच् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is said to be |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | दा | हि | ने | न्द्रि | या | र्थे | षु |
| न | क | र्म | स्व | नु | ष | ज्ज | ते |
| स | र्व | सं | क | ल्प | सं | न्या | सी |
| यो | गा | रू | ढ | स्त | दो | च्य | ते |
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