अन्वयः
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सङ्कल्पप्रभवान् सर्वान् कामान् अशेषतः त्यक्त्वा, मनसा एव इन्द्रियग्रामं समन्ततः विनियम्य (उपरमेत्) ।
Summary
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Having completely abandoned all desires born of worldly resolve, and having fully restrained the multitude of senses from all sides by the mind alone... (This verse is a precursor to the next).
सारांश
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संकल्पों से उत्पन्न होने वाली समस्त कामनाओं को पूरी तरह त्याग कर और मन के माध्यम से ही इन्द्रिय समूह को सभी ओर से वश में करके।
पदच्छेदः
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| सङ्कल्पप्रभवान् | सङ्कल्प–प्रभव (२.३) | born of worldly resolve |
| कामान् | काम (२.३) | desires |
| त्यक्त्वा | त्यक्त्वा (√त्यज्+क्त्वा) | having abandoned |
| सर्वान् | सर्व (२.३) | all |
| अशेषतः | अशेषतस् | completely |
| मनसा | मनस् (३.१) | by the mind |
| एव | एव | alone |
| इन्द्रियग्रामम् | इन्द्रिय–ग्राम (२.१) | the multitude of senses |
| विनियम्य | विनियम्य (वि+नि√यम्+ल्यप्) | having restrained |
| समन्ततः | समन्ततस् | from all sides |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | क | ल्प | प्र | भ | वा | न्का | मां |
| स्त्य | क्त्वा | स | र्वा | न | शे | ष | तः |
| म | न | सै | वे | न्द्रि | य | ग्रा | मं |
| वि | नि | य | म्य | स | म | न्त | तः |
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