अन्वयः
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यत्र (योगी) अतीन्द्रियं बुद्धिग्राह्यम् यत् आत्यन्तिकं सुखम् अस्ति तत् वेत्ति, (यत्र च) स्थितः अयं तत्त्वतः न एव चलति ।
Summary
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In that state, the yogi experiences that infinite happiness which is beyond the senses and graspable only by the intellect. Established in this state, one never swerves from the ultimate truth.
सारांश
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जिस अवस्था में बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य इन्द्रियातीत अनन्त सुख का अनुभव होता है और जहाँ स्थित होने पर योगी तत्व से कभी विचलित नहीं होता।
पदच्छेदः
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| सुखम् | सुख (२.१) | happiness |
| आत्यन्तिकम् | आत्यन्तिक (२.१) | absolute |
| यत् | यद् (२.१) | which |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| बुद्धिग्राह्यम् | बुद्धि–ग्राह्य (२.१) | graspable by the intellect |
| अतीन्द्रियम् | अति–इन्द्रिय (२.१) | beyond the senses |
| वेत्ति | वेत्ति (√विद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | knows |
| यत्र | यत्र | wherein |
| न | न | not |
| च | च | and |
| एव | एव | even |
| अयम् | इदम् (१.१) | this one |
| स्थितः | स्थित (√स्था+क्त, १.१) | established |
| चलति | चलति (√चल् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | swerves |
| तत्त्वतः | तत्त्वतस् | from the truth |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सु | ख | मा | त्य | न्ति | कं | य | त्त |
| द्बु | द्धि | ग्रा | ह्य | म | ती | न्द्रि | यम् |
| वे | त्ति | य | त्र | न | चै | वा | यं |
| स्थि | त | श्च | ल | ति | त | त्त्व | तः |
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