अर्जुन उवाच ।
११.१
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥
Summary
AI
Arjuna said: Out of compassion for me, you have spoken the supreme secret known as the science of the Self. By these words, this delusion of mine has been completely dispelled.
सारांश
AI
अर्जुन कहते हैं कि मुझ पर कृपा करने के लिए आपने जो परम गोपनीय आध्यात्मिक उपदेश दिए, उससे मेरा अज्ञान और मोह पूरी तरह दूर हो गया है।
११.२
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥
Summary
AI
O lotus-eyed one, I have heard from you in detail about the origin and dissolution of all beings, and also about your imperishable glory.
सारांश
AI
हे कमलनेत्र! मैंने आपसे जीवों की उत्पत्ति और प्रलय के विषय में विस्तार से सुना है और आपकी अविनाशी महिमा का भी प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया है।
११.३
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥
Summary
AI
O Supreme Lord, O Supreme Person, what you have spoken about yourself is exactly so. I wish to see your divine, sovereign form.
सारांश
AI
हे परमेश्वर! आपने अपने विषय में जो कहा है वह पूर्णतः सत्य है, परंतु हे पुरुषोत्तम! अब मैं आपके उस ऐश्वर्यशाली दिव्य रूप को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।
११.४
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥
Summary
AI
O Lord, O Master of Yoga, if you think it is possible for me to see it, then please show me your imperishable Self.
सारांश
AI
हे प्रभु! यदि आप मानते हैं कि मैं आपके उस रूप को देखने में समर्थ हूँ, तो हे योगेश्वर! आप मुझे अपने उस अविनाशी स्वरूप के दर्शन कराइए।
श्रीभगवानुवाच ।
११.५
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥
Summary
AI
The Blessed Lord said: Behold, O Partha, My forms, by the hundreds and thousands—of various kinds, divine, and of various colors and shapes.
सारांश
AI
श्री भगवान ने कहा—हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों नाना प्रकार के दिव्य, अलौकिक तथा अनेक वर्णों और आकृतियों वाले रूपों को देख।
११.६
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥
Summary
AI
Behold, O Bharata, the Adityas, the Vasus, the Rudras, the two Ashvins, and the Maruts. Behold many wonders never seen before.
सारांश
AI
हे भारत! तू मुझमें आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, अश्विनीकुमारों, मरुद्गणों और पहले कभी न देखे गए अनेक अत्यंत आश्चर्यजनक रूपों को देख।
११.७
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥
Summary
AI
O Gudakesha, see now the entire universe, with all that moves and does not move, centered here in My body. And whatever else you wish to see, see it also.
सारांश
AI
हे अर्जुन! आज तू मेरे इस शरीर के एक अंश में स्थित चराचर सहित संपूर्ण जगत को और अन्य जो कुछ भी देखना चाहता है, उसे एक साथ देख ले।
११.८
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥
Summary
AI
But you cannot see Me with these eyes of yours. Therefore, I give you a divine eye. Behold My supreme yogic power.
सारांश
AI
परंतु तू अपनी इन प्राकृत आँखों से मुझे देखने में समर्थ नहीं है, इसलिए मैं तुझे दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूँ; अब तू मेरी अलौकिक योग-शक्ति को देख।
संजय उवाच ।
११.९
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥
Summary
AI
Sanjaya said: O King, having spoken thus, Hari, the great Lord of Yoga, then revealed to Partha His supreme and divine form.
सारांश
AI
संजय बोले—हे राजन्! ऐसा कहकर महायोगेश्वर श्रीहरि ने अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्य विश्वरूप दिखाया।
११.१०
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥
Summary
AI
(Sanjaya continued describing the form) With many mouths and eyes, presenting many wondrous sights, adorned with many divine ornaments, and holding many divine, upraised weapons.
सारांश
AI
उस विश्वरूप में अनेक मुख, नेत्र और अद्भुत दृश्य थे। भगवान ने अनेक दिव्य आभूषण धारण किए थे और हाथों में अनेक दिव्य शस्त्र उठा रखे थे।
११.११
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥
Summary
AI
Wearing divine garlands and garments, anointed with divine fragrances, all-wonderful, resplendent, endless, and facing in every direction.
सारांश
AI
वे दिव्य मालाओं और वस्त्रों से सुसज्जित थे, दिव्य गंधों से अनुलिप्त थे और सब ओर मुख वाले, अनंत एवं समस्त आश्चर्यों से युक्त प्रकाशमान देव थे।
११.१२
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥
Summary
AI
If the splendor of a thousand suns were to blaze forth simultaneously in the sky, it might be similar to the splendor of that great-souled one (the universal form).
सारांश
AI
आकाश में एक साथ उदित हुए हजार सूर्यों का प्रकाश भी उस महापुरुष के विश्वरूप के प्रकाश की शायद ही बराबरी कर पाए।
११.१३
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥
Summary
AI
Then, Arjuna, the son of Pandu, saw the entire universe, divided in many ways, all situated in one place within the body of the God of gods.
सारांश
AI
उस समय अर्जुन ने देवों के देव श्रीहरि के शरीर में एक ही स्थान पर स्थित, अनेक भागों में विभक्त संपूर्ण ब्रह्मांड को देखा।
११.१४
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥
Summary
AI
Then, Dhananjaya (Arjuna), filled with wonder, his hair standing on end, bowed down his head to the Lord and, with folded hands, spoke.
सारांश
AI
तब आश्चर्यचकित और रोमांचित हुए अर्जुन ने मस्तक झुकाकर भगवान को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनसे यह वचन कहे।
अर्जुन उवाच ।
११.१५
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥
सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥
Summary
AI
Arjuna said: O Lord, in Your body I see all the gods and hosts of various beings, Lord Brahma seated on his lotus throne, Lord Shiva, all the sages, and the divine serpents.
सारांश
AI
अर्जुन बोले—हे देव! मैं आपके शरीर में समस्त देवताओं, प्राणियों के विभिन्न समूहों, कमल पर स्थित ब्रह्मा, महादेव, समस्त ऋषियों और दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ।
११.१६
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वा सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥
पश्यामि त्वा सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥
Summary
AI
O Lord of the universe, O universal form, I see You with countless arms, bellies, mouths, and eyes, an infinite form on all sides. I see no end, no middle, and no beginning of You.
सारांश
AI
हे विश्वेश्वर! मैं आपको सब ओर अनंत भुजाओं, उदरों, मुखों और नेत्रों वाला देख रहा हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपका न आदि, न मध्य और न अंत देख पा रहा हूँ।
११.१७
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता
द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता
द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥
Summary
AI
I see You wearing a crown, holding a mace and a discus, a mass of splendor blazing everywhere. You are difficult to behold, radiant as a blazing fire and the sun on all sides, and immeasurable.
सारांश
AI
मैं आपको मुकुट, गदा और चक्र धारण किए हुए, चारों ओर दीप्तिमान तेजपुंज के रूप में देख रहा हूँ। प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान आपका तेज अपार और देखने में अत्यंत कठिन है।
११.१८
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥
Summary
AI
You are the imperishable, the supreme reality to be known. You are the ultimate refuge of this universe. You are the immutable protector of the eternal dharma. You are, in my opinion, the eternal Primal Being.
सारांश
AI
आप ही जानने योग्य परम अक्षर, इस जगत के परम आधार और सनातन धर्म के रक्षक अविनाशी पुरुष हैं; ऐसा मेरा अटूट मत है।
११.१९
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥
मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥
Summary
AI
I see You without beginning, middle, or end, of infinite prowess, with infinite arms, the sun and moon as Your eyes, and a mouth like a blazing fire, scorching this entire universe with Your radiance.
सारांश
AI
आप आदि, मध्य और अंत से रहित, अनंत सामर्थ्यवान, असंख्य भुजाओं वाले तथा सूर्य-चंद्रमा रूपी नेत्रों वाले हैं। जलती अग्नि के समान मुख वाले आप अपने तेज से विश्व को तपा रहे हैं।
११.२०
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमिदं तवोग्रं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमिदं तवोग्रं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥
Summary
AI
O great-souled one, the space between heaven and earth and all directions are pervaded by You alone. Seeing this wondrous and terrible form of Yours, the three worlds are greatly distressed.
सारांश
AI
हे महात्मन्! स्वर्ग, पृथ्वी और सभी दिशाएं केवल आपसे ही व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत और उग्र रूप को देखकर तीनों लोक अत्यंत भयभीत और व्याकुल हो रहे हैं।
११.२१
अमी हि त्वा सुरसंघा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥
Summary
AI
Indeed, these hosts of gods enter into You. Some, in fear, praise You with folded hands. Hosts of great sages and perfected beings, saying "Hail!", praise You with magnificent hymns.
सारांश
AI
देवतागण आपमें प्रवेश कर रहे हैं; कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपकी स्तुति कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धों के समूह 'कल्याण हो' कहकर उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी प्रशंसा कर रहे हैं।
११.२२
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा
वीक्षन्ते त्वा विस्मिताश्चैव सर्वे ॥
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा
वीक्षन्ते त्वा विस्मिताश्चैव सर्वे ॥
Summary
AI
The Rudras, Adityas, Vasus, Sadhyas, Vishvedevas, the two Ashvins, the Maruts, the ancestors, and the hosts of Gandharvas, Yakshas, Asuras, and Siddhas—all gaze upon You in amazement.
सारांश
AI
रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, पितर, गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्धों के समुदाय—ये सभी विस्मित होकर आपको देख रहे हैं।
११.२३
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥
महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥
Summary
AI
O mighty-armed one, seeing Your great form with its many mouths, eyes, arms, thighs, feet, bellies, and its fearsomeness from many tusks, the worlds are terrified, and so am I.
सारांश
AI
हे महाबाहो! आपके अनेक मुख, नेत्र, भुजाओं, जंघाओं, चरणों, उदरों और भयानक दाढ़ों वाले इस विशाल रूप को देखकर समस्त लोक और मैं भी अत्यंत व्याकुल हो रहे हैं।
११.२४
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥
Summary
AI
O Vishnu, seeing You touching the sky, blazing with many colors, with gaping mouths and large, fiery eyes, my inmost self is terrified. I find neither steadfastness nor peace.
सारांश
AI
हे विष्णु! आकाश को स्पर्श करने वाले, देदीप्यमान, अनेक वर्णों वाले, खुले मुख और चमकते हुए विशाल नेत्रों वाले आपके रूप को देखकर मेरा अन्तःकरण भयभीत है; मुझे न धीरज मिल रहा है और न शान्ति।
११.२५
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्वैव कालानलसंनिभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
दृष्ट्वैव कालानलसंनिभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
Summary
AI
O Lord of gods, O refuge of the universe, just seeing Your faces, fearsome with tusks and resembling the fire of cosmic dissolution, I lose my sense of direction and find no refuge. Be gracious!
सारांश
AI
प्रलयकाल की अग्नि के समान भयानक दाढ़ों वाले आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जान पा रहा हूँ और न मुझे सुख मिल रहा है। हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों।
११.२६
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥
सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥
Summary
AI
All these sons of Dhritarashtra, along with the hosts of kings, as well as Bhishma, Drona, and Karna, and also the chief warriors from our side... (The sentence continues in the next verse).
सारांश
AI
धृतराष्ट्र के सभी पुत्र, राजाओं के समूह सहित भीष्म, द्रोण और वह सूतपुत्र कर्ण भी हमारे पक्ष के मुख्य योद्धाओं के साथ आपके भीतर प्रवेश कर रहे हैं।
११.२७
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥
Summary
AI
...are rushing into Your terrifying mouths, fearsome with tusks. Some are seen stuck between Your teeth, their heads crushed to powder.
सारांश
AI
वे सब आपके भयानक दाढ़ों वाले डरावने मुखों में बड़े वेग से प्रवेश कर रहे हैं। उनमें से कई आपके दांतों के बीच फँसे हुए और कुचले हुए सिरों के साथ दिखाई दे रहे हैं।
११.२८
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥
Summary
AI
As the many currents of rivers rush towards the ocean, so do these heroes of the mortal world enter Your blazing mouths.
सारांश
AI
जैसे नदियों के अनेक जल-प्रवाह स्वाभाविक रूप से समुद्र की ओर ही दौड़ते हैं, वैसे ही मनुष्य लोक के ये शूरवीर योद्धा आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
११.२९
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥
Summary
AI
As moths with increased speed rush into a blazing fire for their destruction, so too do these people, with increased speed, enter Your mouths for their destruction.
सारांश
AI
जैसे पतंगे अपने विनाश के लिए तीव्र वेग से जलती हुई अग्नि में प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने विनाश के लिए आपके मुखों में बड़े वेग से समा रहे हैं।
११.३०
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता
ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥
ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥
Summary
AI
O Vishnu, You are devouring all the worlds from every side with Your flaming mouths, licking them up. Your fierce rays, filling the entire universe with their splendor, are scorching it.
सारांश
AI
हे विष्णु! आप अपने प्रज्वलित मुखों से समस्त लोकों को निगलते हुए सब ओर से चाट रहे हैं। आपका उग्र प्रकाश अपनी किरणों से सम्पूर्ण जगत को आपूरित करके तपा रहा है।
११.३१
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥
Summary
AI
Tell me, who are You of such a fierce form? Salutations to You, O best of gods; be gracious. I wish to know You, the primal one, for I do not understand Your purpose.
सारांश
AI
हे देववर! इस उग्र रूप वाले आप कौन हैं, मुझे बताइये। आपको नमस्कार हो, आप प्रसन्न हों। मैं आप आदिपुरुष को विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं समझ पा रहा हूँ।
श्रीभगवानुवाच ।
११.३२
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
Summary
AI
The Lord said: I am mighty Time, the destroyer of worlds, and I am here engaged in destroying these people. Even without you, none of the warriors arrayed in the opposing armies will survive.
सारांश
AI
मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ और इस समय लोकों का संहार करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। विपक्षी सेनाओं में स्थित ये योद्धा तुम्हारे युद्ध न करने पर भी जीवित नहीं बचेंगे।
११.३३
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥
जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥
Summary
AI
Therefore, arise, O Savyasachin, and gain fame. Conquering your enemies, enjoy a prosperous kingdom. By Me, they have already been slain. You, be merely an instrument.
सारांश
AI
अतः तुम उठो, यश प्राप्त करो और शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का उपभोग करो। ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं; हे सव्यसाची! तुम तो केवल निमित्त मात्र बन जाओ।
११.३४
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥
कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा
युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥
Summary
AI
Slay Drona, Bhishma, Jayadratha, Karna, and also the other warrior heroes who have already been slain by Me. Do not be distressed. Fight! You will conquer your rivals in battle.
सारांश
AI
द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और अन्य वीर योद्धा मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं, अतः तुम उन्हें मारो और भयभीत न हो। युद्ध करो, तुम रण में शत्रुओं को जीतोगे।
संजय उवाच ।
११.३५
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥
कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥
Summary
AI
Sanjaya said: Having heard this word of Keshava, the crowned Arjuna, trembling and with folded hands, bowed down again. Overwhelmed with fear and bowing, he spoke to Krishna with a faltering voice.
सारांश
AI
केशव के इन वचनों को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन कांपते हुए हाथ जोड़कर और नमस्कार करके, अत्यंत भयभीत होकर गद्गद वाणी में श्रीकृष्ण से फिर बोले।
अर्जुन उवाच ।
११.३६
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥
Summary
AI
Arjuna said: O Hrishikesha, it is fitting that the world rejoices and is filled with love by glorifying You. The frightened demons flee in all directions, and all the hosts of perfected beings bow down to You.
सारांश
AI
हे हृषीकेश! यह उचित ही है कि आपके कीर्तन से जगत हर्षित और अनुराग को प्राप्त हो रहा है। राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भाग रहे हैं और समस्त सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं।
११.३७
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्म
न्गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥
न्गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥
Summary
AI
Arjuna asks, "O great soul, O limitless one, Lord of gods, refuge of the universe, why should they not bow to You, who are greater even than Brahma, the original creator? You are the imperishable, the manifest and the unmanifest, and that which is beyond both."
सारांश
AI
हे महात्मा! आप ब्रह्मा के भी आदि कर्ता और सर्वश्रेष्ठ हैं, तो वे आपको नमस्कार क्यों न करें? हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! आप अक्षर स्वरूप हैं, सत्, असत् और उनसे परे जो कुछ है, वह भी आप ही हैं।
११.३८
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥
Summary
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"O one of infinite forms, You are the primordial God, the ancient Person, the supreme refuge of this universe. You are the knower and the knowable, and the supreme abode. The entire universe is pervaded by You."
सारांश
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आप आदिदेव, सनातन पुरुष और इस जगत के परम आश्रय हैं। आप ही जानने वाले, जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्त रूप! आपसे ही यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है।
११.३९
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥
Summary
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"You are Vayu, Yama, Agni, Varuna, the Moon, Prajapati, and the great-grandfather. Salutations, salutations to You a thousand times, and again and again, salutations to You."
सारांश
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आप ही वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजापति और प्रपितामह हैं। आपको हजारों बार नमस्कार हो और पुनः पुनः नमस्कार हो।
११.४०
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥
Summary
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"O All, salutations to You from the front and from behind. Salutations to You from all sides indeed. O You of infinite prowess and immeasurable might, You encompass everything, and therefore, You are everything."
सारांश
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हे सर्वस्वरूप! आपको आगे से, पीछे से और सब ओर से नमस्कार हो। हे अनन्त वीर्य और अमित पराक्रम वाले! आप समस्त जगत को व्याप्त किए हुए हैं, इसलिए आप ही सब कुछ हैं।
११.४१
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥
Summary
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"Whatever I have said presumptuously, thinking of You merely as a friend and addressing You as 'O Krishna, O Yadava, O friend'—this was done by me either through carelessness or affection, not knowing this glory of Yours."
सारांश
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मैंने आपकी महिमा को न जानते हुए, प्रमाद या प्रेमवश आपको मित्र मानकर जो हठपूर्वक 'हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे' कहा है, उसके लिए क्षमा चाहता हूँ।
११.४२
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथ वाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥
विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथ वाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥
Summary
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"And for whatever disrespect I have shown You in jest, while playing, resting, sitting, or eating, whether alone or in the presence of others, O Achyuta (infallible one), for all that I beg forgiveness from You, the immeasurable one."
सारांश
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विहार, शयन, आसन या भोजन के समय, अकेले अथवा सबके सामने, परिहास में मैंने जो आपका तिरस्कार किया है, उस अपराध के लिए मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ।
११.४३
पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥
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"O one of unequalled power, You are the father of this world, of the moving and the unmoving. You are its worshipful and most venerable teacher. There is no one equal to You in the three worlds; how then could there be another greater?"
सारांश
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आप इस चराचर जगत के पिता, परम पूज्य और महान गुरु हैं। हे अतुलनीय प्रभाव वाले प्रभु, तीनों लोकों में आपके समान कोई दूसरा नहीं है, फिर आपसे अधिक तो कोई कैसे हो सकता है?
॥ इति एकादशोऽध्यायः (विश्वरूपदर्शनयोगः) ॥
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