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स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥

अन्वयः AI हृषीकेश, स्थाने (यत्) तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यति अनुरज्यते च, भीतानि रक्षांसि दिशः द्रवन्ति, सर्वे सिद्धसंघाः च नमस्यन्ति ।
Summary AI Arjuna said: O Hrishikesha, it is fitting that the world rejoices and is filled with love by glorifying You. The frightened demons flee in all directions, and all the hosts of perfected beings bow down to You.
सारांश AI हे हृषीकेश! यह उचित ही है कि आपके कीर्तन से जगत हर्षित और अनुराग को प्राप्त हो रहा है। राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भाग रहे हैं और समस्त सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं।
पदच्छेदः AI
स्थानेस्थाने it is fitting
हृषीकेशहृषीकेश (८.१) O Hrishikesha
तवयुष्मद् (६.१) Your
प्रकीर्त्याप्रकीर्ति (३.१) by the glorification
जगत्जगत् (१.१) the world
प्रहृष्यतिप्रहृष्यति (प्र√हृष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) rejoices
अनुरज्यतेअनुरज्यते (अनु√रञ्ज् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) is filled with love
and
रक्षांसिरक्षस् (१.३) the demons
भीतानिभीत (√भी+क्त, १.३) frightened
दिशःदिश् (२.३) to the directions
द्रवन्तिद्रवन्ति (√द्रु कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) flee
सर्वेसर्व (१.३) all
नमस्यन्तिनमस्यन्ति (√नमस्य कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) bow down
and
सिद्धसंघाःसिद्धसंघ (१.३) the hosts of perfected beings
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
स्था ने हृ षी के प्र की र्त्या
त्प्र हृ ष्य त्य नु ज्य ते
क्षां सि भी ता नि दि शो द्र न्ति
र्वे स्य न्ति सि द्ध सं घाः
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