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॥ अथ चतुर्थः सर्गः ॥
४.१
ततः स कूजत्कलहंसमेखलां
सपाकसस्याहितपाण्डुतागुणाम् ।
उपाससादोपजनं जनप्रियः
प्रियामिवासादितयौवनां भुवम् ॥
सारांश AI जनप्रिय अर्जुन ने चहकते हंसों और पकी फसलों से सुशोभित पृथ्वी के पास वैसे ही प्रवेश किया जैसे कोई प्रेमी अपनी युवती प्रिया के समीप जाता है।
४.२
विनम्रशालिप्रसवौघशालिनी-
रपेतपङ्काः ससरोरुहाम्भसः ।
ननन्द पश्यन्नुपसीम स स्थली-
रुपायनीभूतशरद्गुणश्रियः ॥
सारांश AI झुकी धान की बालियों, निर्मल जल और कमलों से युक्त शरद कालीन प्राकृतिक सुंदरता वाली सीमाओं को देखकर अर्जुन अत्यंत हर्षित हुए।
४.३
निरीक्ष्यमाणा इव विस्मयाकुलैः
पयोभिरुन्मीलितपद्मलोचनैः ।
हृतप्रियादृष्टिविलासविभ्रमा
मनोऽस्य जह्रुः शफरीविवृत्तयः ॥
सारांश AI खिले कमलों जैसे नेत्रों वाले जल और विस्मयकारी चंचल मछलियों की थिरकन ने अर्जुन का मन मोह लिया, जो प्रेमिकाओं के कटाक्षों जैसी सुंदर थीं।
४.४
तुतोष पश्यन् कलमस्य सोऽधिकं
सवारिजे वारिणि रामणीयकम् ।
सुदुर्लभे नार्हति कोऽभिनन्दितुं
प्रकर्षलक्ष्मीमनुरूपसङ्गमे ॥
सारांश AI कमलों से युक्त जल में धान के प्रतिबिंब की सुंदरता देखकर अर्जुन संतुष्ट हुए; क्योंकि अनुरूप वस्तुओं का मिलन सदैव प्रशंसनीय होता है।
४.५
नुनोद तस्य स्थलपद्मिनीगतं
वितर्कमाविष्कृतफेनसंतति ।
अवाप्तकिञ्जल्कविभेदमुच्चकै-
र्विवृत्तपाठीनपराहतं पयः ॥
सारांश AI बड़ी मछलियों की उछाल से उत्पन्न फेन और केसर युक्त जल ने अर्जुन के उस भ्रम को मिटा दिया कि वे जल में खिले स्थल-कमल देख रहे हैं।
४.६
कृतोर्मिरेखं शिथिलत्वमायता
शनैः शनैः शान्तरयेण वारिणा ।
निरीक्ष्य रेमे स समुद्रयोषितां
तरङ्गितक्षौमविपाण्डु सैकतम् ॥
सारांश AI नदियों के शांत होते जल से प्रकट हुए लहरों से अंकित और श्वेत वस्त्र के समान सुंदर बालू के तटों को देखकर अर्जुन आनंदित हुए।
४.७
मनोरमं प्रापितमन्तरं भ्रुवो-
रलंकृतं केसररेणुणाणुना ।
अलक्तताम्राधरपल्लवश्रिया
समानयन्तीमिव बन्धुजीवकम् ॥
सारांश AI भौंहों के बीच केसर का तिलक लगाए और बन्धुजीवक पुष्प के समान लाल होंठों वाली खेत की रखवाली करती गोपी को अर्जुन ने देखा।
४.८
नवातपालोहितमाहितं मुहु-
र्महानिवेशौ परितः पयोधरौ ।
चकासयन्तीमरविन्दजं रजः
परिश्रमाम्भःपुलकेन सर्पता ॥
सारांश AI पसीने और रोमांच के कारण स्तनों पर फैले लाल कमल-पराग को बिखेरती हुई गोपी प्रातःकालीन धूप की लालिमा के समान चमक रही थी।
४.९
कपोलसंश्लेषि विलोचनत्विषा
विभूषयन्तीमवतंसकोत्पलम् ।
सुतेन पाण्डोः कलमस्य गोपिकां
निरीक्ष्य मेने शरदः कृतार्थता ॥
सारांश AI आँखों की चमक से कानों के नीलकमल की शोभा बढ़ाती धान की रखवाली करती गोपी को देखकर अर्जुन ने शरद ऋतु की सार्थकता का अनुभव किया।
४.१०
उपारताः पश्चिमरात्रिगोचरात्
अपारयन्तः पतितुं जवेन गच्छन् ।
तमुत्सुकाश्चक्रुरवेक्षणोत्सुकं
गवां गणाः प्रस्नुतपीवरौधसः ॥
सारांश AI रात भर चरने के बाद दूध से भरे भारी थनों वाली और बछड़ों के पास जाने को उत्सुक गायों ने अर्जुन को अपनी ओर देखने पर विवश किया।
४.११
परीतमुक्षावजये जयश्रिया
नदन्तमुच्चैः क्षतसिन्धुरोधसम् ।
ददर्श पुष्टिं दधतं स शारदीं
सविग्रहं दर्पमिवाधिपं गवाम् ॥
सारांश AI अन्य साँड़ों को जीतकर विजयश्री से युक्त और डकारते हुए पुष्ट शरीर वाले श्रेष्ठ साँड़ को अर्जुन ने साक्षात अहंकार के रूप में देखा।
४.१२
विमुच्यमानैरपि तस्य मन्थरं
गवां हिमानीविशदैः कदम्बकैः ।
शरन्नदीनां पुलिनैः कुतूहलं
गलद्दुकूलैर्जघनैरिवादधे ॥
सारांश AI बर्फ जैसी श्वेत गायों के धीरे-धीरे चलते झुंडों ने शरद कालीन नदियों के किनारों को खिसकते रेशमी वस्त्रों वाले जघनों के समान आकर्षक बना दिया।
४.१३
गतान्पशूनां सहजन्मबन्धुतां
गृहाश्रयं प्रेम वनेषु बिभ्रतः ।
ददर्श गोपानुपधेनु पाण्डवः
कृतानुकारानिव गोभिरार्जवे ॥
सारांश AI गायों के प्रति सहज प्रेम रखने वाले और स्वभाव से उन्हीं के समान सरल ग्वालों को अर्जुन ने उनके निवास स्थान के पास देखा।
४.१४
परिभ्रमन्मूर्धजषट्पदाकुलैः
स्मितोदयादर्शितदन्तकेसरैः ।
मुखैश्चलत्कुण्डलरश्मिरञ्जितै-
र्नवातपामृष्टसरोजचारुभिः ॥
सारांश AI भौरों जैसे काले बालों, मुस्कान से चमकते दाँतों और कुण्डलों की आभा से युक्त ग्वालिनों के मुख धूप में खिले कमलों के समान सुंदर थे।
४.१५
निबद्धनिःश्वासविकम्पिताधरा
लता इव प्रस्फुरितैकपल्लवाः ।
व्यपोढपार्श्वैरपवर्तितत्रिका
विकर्षणैः पाणिविहारहारिभिः ॥
सारांश AI दही मथने के श्रम से कांपते होंठों वाली और शरीर को मथनी के वेग के साथ मोड़ती ग्वालिनें वायु से हिलती लताओं जैसी प्रतीत हुईं।
४.१६
व्रजाजिरेष्वम्बुदनादशङ्किनीः
शिखण्डिनामुन्मदयत्सु योषितः ।
मुहुः प्रणुन्नेषु मथां विवर्तनै-
र्नदत्सु कुम्भेषु मृदङ्गमन्थरम् ॥
सारांश AI घड़ों के मथने की गंभीर ध्वनि से बादलों का भ्रम होने पर मयूर नाचने लगे, जिससे ब्रज के आंगनों में उत्सव का माहौल बन गया।
४.१७
स मन्थरावल्गितपीवरस्तनीः
परिश्रमक्लान्तविलोचनोत्पलाः ।
निरीक्षितुं नोपरराम बल्लवी-
रभिप्रनृत्ता इव वारयोषितः ॥
सारांश AI मथने की क्रिया से चंचल और श्रम से थकी आँखों वाली ग्वालिनों को अर्जुन निरंतर निहारते रहे, जो नृत्य करती अप्सराओं सी लग रही थीं।
४.१८
पपात पूर्वां जहतो विजिह्मतां
वृषोपभुक्तान्तिकसस्यसम्पदः ।
रथाङ्गसीमन्तितसान्द्रकर्दमा-
न्प्रसक्तसम्पातपृथक्कृतान्पथः ॥
सारांश AI पहियों से कटी कीचड़, पशुओं द्वारा चरी गई घास और अब सीधे व सुगम हो चुके रास्तों को अर्जुन ने ध्यान से देखा।
४.१९
जनैरुपग्राममनिन्द्यकर्मभि-
र्विविक्तभावेङ्गितभूषणैर्वृताः ।
भृशं ददर्शाश्रममण्डपोपमाः
सपुष्पहासाः स निवेशवीरुधः ॥
सारांश AI गाँव के पास लताओं और फूलों से घिरे हुए श्रेष्ठ पुरुषों के सुंदर घर अर्जुन को शांतिपूर्ण आश्रम के मंडप के समान प्रतीत हुए।
४.२०
ततः स सम्प्रेक्ष्य शरद्गुणश्रियं
शरद्गुणालोकनलोलचक्षुषम् ।
उवाच यक्षस्तमचोदितोऽपि गां
न हीङ्गितज्ञोऽवसरेऽवसीदति ॥
सारांश AI शरद ऋतु की शोभा और उसे निहारते अर्जुन को देखकर चतुर यक्ष बिना पूछे ही उनसे वार्ता करने लगा, क्योंकि बुद्धिमान अवसर नहीं चूकते।
४.२१
इयं शिवाया नियतेरिवायतिः
कृतार्थयन्ती जगतः फलैः क्रियाः ।
जयश्रियं पार्थ पृथूकरोतु ते
शरत्प्रसन्नाम्बुरनम्बुवारिदा ॥
सारांश AI जैसे अनुकूल प्रारब्ध संसार के कार्यों को सफल बनाता है, वैसे ही निर्मल जल और मेघों से रहित यह शरद ऋतु, हे अर्जुन, आपकी विजय-श्री को विस्तृत करे।
४.२२
उपैति सस्यं परिणामरम्यता
नदीरनौद्धत्यमपङ्कता महीम् ।
नवैर्गुणैः सम्प्रति संस्तवस्थिरं
तिरोहितं प्रेम घनागमश्रियः ॥
सारांश AI फसलों का पकना, नदियों की स्थिरता और पृथ्वी की निर्मलता—इन नए गुणों के कारण वर्षा ऋतु के प्रति पुराना प्रेम अब शरद ऋतु की शोभा में छिप गया है।
४.२३
पतन्ति नास्मिन्विशदाः पतत्त्रिणो
धृतेन्द्रचापा न पयोदपङ्क्तयः ।
तथापि पुष्णाति नभः श्रियं परां
न रम्यमाहार्यमपेक्षते गुणम् ॥
सारांश AI आकाश में न इन्द्रधनुष है और न बादलों की पंक्तियाँ, फिर भी वह परम शोभा पा रहा है; क्योंकि स्वाभाविक सुन्दरता बाहरी अलंकारों की अपेक्षा नहीं करती।
४.२४
विपाण्डुभिर्ग्लानतया पयोधरै-
श्च्युताचिराभागुणहेमदामभिः ।
इयं कदम्बानिलभर्तुरत्यये
न दिग्वधूनां कृशता न राजते ॥
सारांश AI बिजली रूपी सुवर्ण-मेखला से रहित और श्वेत बादलों के कारण, वर्षा के अंत में दिशा-रूपी वधुओं की यह कृशता (दुबलापन) भी शोभा दे रही है।
४.२५
विहाय वाञ्छामुदिते मदात्यया-
दरक्तकण्ठस्य रुते शिखण्डिनः ।
श्रुतिः श्रयत्युन्मदहंसनिःस्वनं
गुणाः प्रियत्वेऽधिकृता न संस्तवः ॥
सारांश AI मद समाप्त होने से अब मोरों के स्वर में रुचि नहीं रही, लोग हंसों की मधुर ध्वनि सुन रहे हैं; प्रेम गुणों पर आधारित होता है, केवल पुराने परिचय पर नहीं।
४.२६
अमी पृथुस्तम्बभृतः पिशङ्गतां
गता विपाकेन फलस्य शालयः ।
विकासि वप्राम्भसि गन्धसूचितं
नमन्ति निघ्रातुमिवासितोत्पलम् ॥
सारांश AI पकने के कारण पीले पड़े धान के पौधे, जल में खिले नीलकमलों की सुगंध को मानो सूँघने के लिए नीचे की ओर झुक रहे हैं।
४.२७
मृणालिनीनामनुरञ्जितं त्विषा
विभिन्नमम्भोजपलाशशोभया ।
पयः स्फुरच्छालिशिखापिशङ्गितं
द्रुतं धनुष्खण्डमिवाहिविद्विषः ॥
सारांश AI कमलों की कांति से रंजित और धान की बालियों की आभा से पीला पड़ा हुआ जल, इन्द्र के टूटे हुए धनुष के टुकड़े के समान प्रतीत हो रहा है।
४.२८
विपाण्डु संव्यानमिवानिलोद्धतं
निरुन्धतीः सप्तपलाशजं रजः ।
अनाविलोन्मीलितबाणचक्षुषः
सपुष्पहासा वनराजियोषितः ॥
सारांश AI सप्तपर्ण के पराग रूपी श्वेत वस्त्र को ओढ़े, बाण के फूलों जैसे नेत्रों वाली वन-पंक्तियाँ खिले हुए फूलों की मुस्कान बिखेर रही हैं।
४.२९
अदीपितं वैद्युतजातवेदसा
सिताम्बुदच्छेदतिरोहितातपम् ।
ततान्तरं सान्तरवारिशीकरैः
शिवं नभोवर्त्म सरोजवायुभिः ॥
सारांश AI बिजली की चमक से रहित, श्वेत मेघों से ढके सूर्य वाला और कमलों की सुगंधित शीतल वायु से युक्त आकाश का मार्ग अत्यंत सुखद और कल्याणकारी है।
४.३०
सितच्छदानामपदिश्य धावतां
रुतैरमीषां ग्रथिताः पतत्रिणाम् ।
प्रकुर्वते वारिदरोधनिर्गताः
परस्परालापमिवामला दिशः ॥
सारांश AI उड़ते हुए श्वेत हंसों की ध्वनियों के माध्यम से, बादलों के आवरण से मुक्त हुई ये निर्मल दिशाएं मानो परस्पर संवाद कर रही हैं।
४.३१
विहारभूमेरभिघोषमुत्सुकाः
शरीरजेभ्यश्च्युतयूथपङ्क्तयः ।
असक्तमूधांसि पयः क्षरन्त्यमू-
रुपायनानीव नयन्ति धेनवः ॥
सारांश AI चरागाहों से लौटती हुई गायें, बछड़ों के स्नेह में स्तनों से स्वतः झरते दूध के रूप में मानो उपहार लेकर अपने निवास स्थान की ओर आ रही हैं।
४.३२
जगत्प्रसूतिर्जगदेकपावनी
व्रजोपकण्ठं तनयैरुपेयुषी ।
द्युतिं समग्रां समितिर्गवामसा-
वुपैति मन्त्रैरिव संहिताहुतिः ॥
सारांश AI संसार को पवित्र करने वाली और बछड़ों के साथ लौटती हुई गायों का समूह मंत्रों के साथ दी गई आहुतियों के समान दीप्तिमान हो रहा है।
४.३३
कृतावधानं जितबर्हिणध्वनौ
सुरक्तगोपीजनगीतनिःस्वने ।
इदं जिघत्सामपहाय भूयसीं
न सस्यमभ्येति मृगीकदम्बकम् ॥
सारांश AI मोरों की ध्वनि को मात देने वाले गोपियों के मधुर गायन में मग्न मृगों का झुंड भोजन छोड़कर एकाग्रचित्त होकर संगीत सुन रहा है।
४.३४
असावनास्थापरयावधीरितः
सरोरुहिण्या शिरसा नमन्नपि ।
उपैति शुष्यन्कलमः सहाम्भसा
मनोभुवा तप्त इवाभिपाण्डुताम् ॥
सारांश AI कमलिनी द्वारा अनादर किए जाने पर, सिर झुकाए हुए सूखते हुए धान के पौधे कामदेव से संतप्त किसी विरही के समान पीले पड़ गए हैं।
४.३५
अमी समुद्धूतसरोजरेणुना
हृता हृतासारकणेन वायुना ।
उपागमे दुश्चरिता इवापदां
गतिं न निश्चेतुमलं शिलीमुखाः ॥
सारांश AI कमल-पराग और वायु के झोंकों से इधर-उधर भटकते हुए भ्रमर अपनी गति का निश्चय नहीं कर पा रहे हैं, जैसे विपत्ति काल में दुष्टों की मति भ्रमित हो जाती है।
४.३६
मुखैरसौ विद्रुमभङ्गलोहितैः
शिखाः पिशङ्गीः कलमस्य बिभ्रती ।
शुकावलिर्व्यक्तशिरीषकोमला
धनुःश्रियं गोत्रभिदोऽनुगच्छति ॥
सारांश AI अपनी लाल चोंच और धान की पीली बालियों को धारण किए हुए शिरीष के समान कोमल तोतों की पंक्ति इन्द्रधनुष की शोभा का अनुकरण कर रही है।
४.३७
इति कथयति तत्र नातिदूरा-
दथ ददृशे पिहितोष्णरश्मिबिम्बः ।
विगलितजलभारशुक्लभासां
निचय इवाम्बुमुचां नगाधिराजः ॥
सारांश AI वार्तालाप के समय उन्हें निकट ही हिमालय पर्वत दिखाई दिया, जो श्वेत बादलों के समूह की भाँति सूर्य की किरणों को ढके हुए अत्यंत विशाल था।
४.३८
तमतनुवनराजिश्यामितोपत्यकान्तं
नगमुपरि हिमानीगौरमासद्य जिष्णुः ।
व्यपगतमदरागस्यानुसस्मार लक्ष्मी-
मसितमधरवासो बिभ्रतः सीरपाणेः ॥
सारांश AI नीचे के वनों के कारण श्याम और ऊपर बर्फ के कारण श्वेत हिमालय को देखकर अर्जुन को नीले वस्त्र धारण किए हुए बलराम की छवि स्मरण हो आई।
॥ इति चतुर्थः सर्गः ॥
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