व्रजाजिरेष्वम्बुदनादशङ्किनीः
शिखण्डिनामुन्मदयत्सु योषितः ।
मुहुः प्रणुन्नेषु मथां विवर्तनै-
र्नदत्सु कुम्भेषु मृदङ्गमन्थरम् ॥
व्रजाजिरेष्वम्बुदनादशङ्किनीः
शिखण्डिनामुन्मदयत्सु योषितः ।
मुहुः प्रणुन्नेषु मथां विवर्तनै-
र्नदत्सु कुम्भेषु मृदङ्गमन्थरम् ॥
शिखण्डिनामुन्मदयत्सु योषितः ।
मुहुः प्रणुन्नेषु मथां विवर्तनै-
र्नदत्सु कुम्भेषु मृदङ्गमन्थरम् ॥
अन्वयः
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व्रजाजिरेषु मथां विवर्तनैः मुहुः प्रणुन्नेषु मृदङ्गमन्थरं नदत्सु कुम्भेषु, अम्बुदनादशङ्किनीः शिखण्डिनां योषितः उन्मदयत्सु (सत्सु, सः बल्लवीः ददर्श)।
English Summary
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(Continuing the description) ...while in the courtyards of the cow-pens, the pots, repeatedly struck by the turning of the churning sticks, rumbled deep like a mṛdaṅga drum, exciting the peahens who mistook the sound for the thunder of clouds.
सारांश
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घड़ों के मथने की गंभीर ध्वनि से बादलों का भ्रम होने पर मयूर नाचने लगे, जिससे ब्रज के आंगनों में उत्सव का माहौल बन गया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
व्रजेति ॥ व्रजाजिरेषु गोष्ठप्राङ्गणेषु । अधिकरणे सप्तमी ।
व्रजो गोष्ठाध्ववृन्देषु इति विश्वः । अम्बुदनादशङ्किनीर्गर्जितभ्रमवतीरिति भ्रान्तिमदलंकारः। शिखण्डिनां योषितो मयूरीः । योषिद्ग्रहणं मौग्ध्यातिशयार्थम् । उन्मदयत्सून्मदाः कुर्वत्सु । तत्करोति इति ण्यन्ताच्छतृप्रत्ययः । मथां मन्थनदण्डानाम् । वैशाखमन्थमन्थानमन्थानो मन्थदण्डके इत्यमरः (अमरकोशः २.९.७५ ) । विवर्तनैः परिभ्रमणैर्मुहुः प्रणुन्नेषु कम्पितेष्विति स्वभावोक्तिः । कुम्भेषु कलशेषु मृदङ्गवन्मन्थरं मन्दं नदत्सु स्वनत्सु सत्स्विति वाद्यसा म्योक्तिः । भावलक्षणे सप्तमीयम् ॥
पदच्छेदः
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| व्रजाजिरेषु | व्रज–अजिर (७.३) | in the courtyards of the cow-pens |
| अम्बुदनादशङ्किनीः | अम्बुद–नाद–शङ्किन् (२.३) | mistaking for the sound of clouds |
| शिखण्डिनाम् | शिखण्डिन् (६.३) | of peacocks |
| उन्मदयत्सु | उन्मदयत् (उद्√मद्+णिच्+शतृ, ७.३) | while exciting |
| योषितः | योषित् (२.३) | the females (peahens) |
| मुहुः | मुहुस् | repeatedly |
| प्रणुन्नेषु | प्रणुन्न (प्र√नुद्+क्त, ७.३) | on being struck |
| मथाम् | मथ् (६.३) | of the churning sticks |
| विवर्तनैः | विवर्तन (३.३) | by the turnings |
| नदत्सु | नदत् (√नद्+शतृ, ७.३) | while rumbling |
| कुम्भेषु | कुम्भ (७.३) | the pots |
| मृदङ्गमन्थरम् | मृदङ्ग–मन्थरम् | deep like a mṛdaṅga drum |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्र | जा | जि | रे | ष्व | म्बु | द | ना | द | श | ङ्कि | नीः |
| शि | ख | ण्डि | ना | मु | न्म | द | य | त्सु | यो | षि | तः |
| मु | हुः | प्र | णु | न्ने | षु | म | थां | वि | व | र्त | नै |
| र्न | द | त्सु | कु | म्भे | षु | मृ | द | ङ्ग | म | न्थ | रम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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