मृणालिनीनामनुरञ्जितं त्विषा
विभिन्नमम्भोजपलाशशोभया ।
पयः स्फुरच्छालिशिखापिशङ्गितं
द्रुतं धनुष्खण्डमिवाहिविद्विषः ॥
मृणालिनीनामनुरञ्जितं त्विषा
विभिन्नमम्भोजपलाशशोभया ।
पयः स्फुरच्छालिशिखापिशङ्गितं
द्रुतं धनुष्खण्डमिवाहिविद्विषः ॥
विभिन्नमम्भोजपलाशशोभया ।
पयः स्फुरच्छालिशिखापिशङ्गितं
द्रुतं धनुष्खण्डमिवाहिविद्विषः ॥
अन्वयः
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मृणालिनीनां त्विषा अनुरञ्जितम्, अम्भोजपलाशशोभया विभिन्नम्, स्फुरच्छालिशिखापिशङ्गितं पयः, अहिविद्विषः द्रुतं धनुष्खण्डम् इव भाति।
English Summary
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The water, colored by the luster of the lotuses, variegated by the beauty of the lotus petals, and tinged yellow by the tips of the gleaming rice stalks, looks like a molten piece of the bow of Indra (the rainbow).
सारांश
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कमलों की कांति से रंजित और धान की बालियों की आभा से पीला पड़ा हुआ जल, इन्द्र के टूटे हुए धनुष के टुकड़े के समान प्रतीत हो रहा है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
मृणालिनीनामिति ॥ मृणालिनीनां पद्मिनीनां त्विषा हरिवर्णेनानुरक्षितम् । तद्वर्णतामापादितमित्यर्थः । तथाम्भोजपलाशशोभया पद्मदलकान्त्या । आरुण्येनेत्यर्थः । विभिन्नं मिश्रितम् । तथा स्फुरच्छालिशिखापिशङ्गितं स्फुरद्भिः कलमात्रैः पिङ्गलीकृतमित्थं नानावर्णत्वाद्द्रुतं विलायितमहिविद्विषो वृत्रशत्रोरिन्द्रस्य ।
सर्पे वृत्रासुरेऽप्यहिः इति वैजयन्ती। धनुष्खण्डमिव स्थितम् । नित्यं समासेऽनुत्तरपदस्थस्य (अष्टाध्यायी ८.३.४५ ) इति विसर्जनीयस्य षत्वम् । पयो वप्राम्भोऽपदिश्य व्याजीकृत्य धावतामित्यागामिना संबन्धः। अत्र धनुष्खण्डस्य द्रुतस्य लोकेऽप्रसिद्धत्वादुत्प्रेक्षेयं नोपमा ॥
पदच्छेदः
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| मृणालिनीनाम् | मृणालिनी (६.३) | of the lotuses |
| अनुरञ्जितम् | अनुरञ्जित (अनु√रञ्ज्+क्त, १.१) | colored |
| त्विषा | त्विष् (३.१) | by the luster |
| विभिन्नम् | विभिन्न (वि√भिद्+क्त, १.१) | variegated |
| अम्भोजपलाशशोभया | अम्भोज–पलाश–शोभा (३.१) | by the beauty of the lotus petals |
| पयः | पयस् (१.१) | The water |
| स्फुरच्छालिशिखापिशङ्गितम् | स्फुरत्–शालि–शिखा–पिशङ्गित (१.१) | tinged yellow by the tips of the gleaming rice stalks |
| द्रुतम् | द्रुत (√द्रु+क्त, १.१) | molten |
| धनुष्खण्डम् | धनुस्–खण्ड (१.१) | a piece of the bow |
| इव | इव | like |
| अहिविद्विषः | अहिविद्विष् (६.१) | of the enemy of the serpent (Indra) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मृ | णा | लि | नी | ना | म | नु | र | ञ्जि | तं | त्वि | षा |
| वि | भि | न्न | म | म्भो | ज | प | ला | श | शो | भ | या |
| प | यः | स्फु | र | च्छा | लि | शि | खा | पि | श | ङ्गि | तं |
| द्रु | तं | ध | नु | ष्ख | ण्ड | मि | वा | हि | वि | द्वि | षः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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