ततः स सम्प्रेक्ष्य शरद्गुणश्रियं
शरद्गुणालोकनलोलचक्षुषम् ।
उवाच यक्षस्तमचोदितोऽपि गां
न हीङ्गितज्ञोऽवसरेऽवसीदति ॥
ततः स सम्प्रेक्ष्य शरद्गुणश्रियं
शरद्गुणालोकनलोलचक्षुषम् ।
उवाच यक्षस्तमचोदितोऽपि गां
न हीङ्गितज्ञोऽवसरेऽवसीदति ॥
शरद्गुणालोकनलोलचक्षुषम् ।
उवाच यक्षस्तमचोदितोऽपि गां
न हीङ्गितज्ञोऽवसरेऽवसीदति ॥
अन्वयः
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ततः शरद्गुणश्रियं सम्प्रेक्ष्य, शरद्गुणालोकनलोलचक्षुषं तम् (अर्जुनम्), अचोदितः अपि सः यक्षः गाम् उवाच। हि इङ्गितज्ञः अवसरे न अवसीदति।
English Summary
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Then, observing the splendor of autumn's qualities, that Yaksha, though unprompted, spoke these words to Arjuna, whose eyes were eager to see autumn's virtues. For one who understands hints does not fail to act at the right moment.
सारांश
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शरद ऋतु की शोभा और उसे निहारते अर्जुन को देखकर चतुर यक्ष बिना पूछे ही उनसे वार्ता करने लगा, क्योंकि बुद्धिमान अवसर नहीं चूकते।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
तत इति ॥ ततः स पूर्वोक्तो यक्षः शरद्गुणश्रियं संप्रेक्ष्य । दर्शनीयां वर्णनीयां च विचार्येत्यर्थः । शरद्गुणालोकने लोलचक्षुषं सतृष्णदृष्टिम् ।
लोलश्चलसतृष्णयोः इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.२१४ ) । तमर्जुनमचोदितोऽप्यपृष्टोऽपि गां वाचमुवाच । तथाहि । इङ्गितज्ञो भावज्ञ: । इङ्गितं हृद्गतो भावः इति विश्वः । अवसर उक्तियोग्ये काले नावसीदति न वाचं यच्छति । नापृष्टः कस्यचिद्ब्रूयात् इति निषेधस्त्वनाकाङ्क्षितोक्तिविषय इति भावः । सामान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः ॥
पदच्छेदः
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| ततः | ततस् | Then |
| सः | तद् (१.१) | that |
| सम्प्रेक्ष्य | सम्प्रेक्ष्य (सम्+प्र√ईक्ष्+ल्यप्) | observing |
| शरद्गुणश्रियम् | शरद्–गुण–श्री (२.१) | the splendor of autumn's qualities |
| शरद्गुणालोकनलोलचक्षुषम् | शरद्–गुण–आलोकन–लोल–चक्षुस् (२.१) | whose eyes were eager to see autumn's virtues |
| उवाच | उवाच (√वच् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spoke |
| यक्षः | यक्ष (१.१) | Yaksha |
| तम् | तद् (२.१) | to him (Arjuna) |
| अचोदितः | अचोदित (√चुद्+क्त, १.१) | unprompted |
| अपि | अपि | though |
| गाम् | गो (२.१) | words |
| न | न | not |
| हि | हि | For |
| इङ्गितज्ञः | इङ्गितज्ञ (१.१) | one who understands hints |
| अवसरे | अवसर (७.१) | at the right moment |
| अवसीदति | अवसीदति (अव√सद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | does fail to act |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तः | स | स | म्प्रे | क्ष्य | श | र | द्गु | ण | श्रि | यं |
| श | र | द्गु | णा | लो | क | न | लो | ल | च | क्षु | षम् |
| उ | वा | च | य | क्ष | स्त | म | चो | दि | तो | ऽपि | गां |
| न | ही | ङ्गि | त | ज्ञो | ऽव | स | रे | ऽव | सी | द | ति |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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