जगत्प्रसूतिर्जगदेकपावनी
व्रजोपकण्ठं तनयैरुपेयुषी ।
द्युतिं समग्रां समितिर्गवामसा-
वुपैति मन्त्रैरिव संहिताहुतिः ॥
जगत्प्रसूतिर्जगदेकपावनी
व्रजोपकण्ठं तनयैरुपेयुषी ।
द्युतिं समग्रां समितिर्गवामसा-
वुपैति मन्त्रैरिव संहिताहुतिः ॥
व्रजोपकण्ठं तनयैरुपेयुषी ।
द्युतिं समग्रां समितिर्गवामसा-
वुपैति मन्त्रैरिव संहिताहुतिः ॥
अन्वयः
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जगत्प्रसूतिः, जगदेकपावनी, तनयैः व्रजोपकण्ठम् उपेयुषी असौ गवां समितिः, मन्त्रैः संहिता आहुतिः इव, समग्राम् द्युतिम् उपैति।
English Summary
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This herd of cows—the source of the world's sustenance and its sole purifier—having approached the vicinity of the cow-pen with its calves, attains a complete splendor, just as a collective sacrificial offering, accompanied by mantras, does.
सारांश
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संसार को पवित्र करने वाली और बछड़ों के साथ लौटती हुई गायों का समूह मंत्रों के साथ दी गई आहुतियों के समान दीप्तिमान हो रहा है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
जगदिति ॥ जगत्प्रसूतिर्जगत्कारणम् ।आज्यादिहविर्द्वारेणेति भावः । जगतामेकपावनी मुख्यशोधनी व्रजोपकण्ठं गोष्ठान्तिकम् ।
दूरान्तिकार्थेभ्यो द्वितीया च (अष्टाध्यायी २.३.३५ ) इति द्वितीया । उपकण्ठान्तिकाभ्यर्णाभ्यग्रा: इत्यमरः (अमरकोशः ३.१.६६ ) । तनयैर्वत्सैरुपेयुषी संगता ।उपेयिवाननाश्वाननूचानश्च (अष्टाध्यायी ३.२.१०९ ) इति क्वसुप्रत्ययान्तो निपातः । उगितश्च (अष्टाध्यायी ४.१.६ ) इति ङीप् । असौ गवां समितिः संहतिः। मन्त्रैर्ऋग्यजुषादिभिः । मन्त्रो ऋगादिगुह्योक्ति- इति वैजयन्ती । संहिता योजिताहुतिरिव । समग्रां द्युतिमुपैति । आहुतिरपि जगत्प्रसूतिर्जगदेकपावनी च । अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते । आदित्याज्जायते दृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः॥ इति स्मरणादिति भावः ॥
पदच्छेदः
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| जगत्प्रसूतिः | जगत्–प्रसूति (१.१) | the source of the world's sustenance |
| जगदेकपावनी | जगत्–एक–पावनी (१.१) | the world's sole purifier |
| व्रजोपकण्ठम् | व्रज–उपकण्ठ (२.१) | the vicinity of the cow-pen |
| तनयैः | तनय (३.३) | with its calves |
| उपेयुषी | उपेयुषी (उप√इ+क्वसु, १.१) | having approached |
| द्युतिम् | द्युति (२.१) | splendor |
| समग्राम् | समग्र (२.१) | a complete |
| समितिः | समिति (१.१) | herd |
| गवाम् | गो (६.३) | of cows |
| असौ | अदस् (१.१) | This |
| उपैति | उपैति (उप√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attains |
| मन्त्रैः | मन्त्र (३.३) | with mantras |
| इव | इव | as |
| संहिताहुतिः | संहित–आहुति (१.१) | a collective sacrificial offering |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | ग | त्प्र | सू | ति | र्ज | ग | दे | क | पा | व | नी |
| व्र | जो | प | क | ण्ठं | त | न | यै | रु | पे | यु | षी |
| द्यु | तिं | स | म | ग्रां | स | मि | ति | र्ग | वा | म | सा |
| वु | पै | ति | म | न्त्रै | रि | व | सं | हि | ता | हु | तिः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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