स मन्थरावल्गितपीवरस्तनीः
परिश्रमक्लान्तविलोचनोत्पलाः ।
निरीक्षितुं नोपरराम बल्लवी-
रभिप्रनृत्ता इव वारयोषितः ॥
स मन्थरावल्गितपीवरस्तनीः
परिश्रमक्लान्तविलोचनोत्पलाः ।
निरीक्षितुं नोपरराम बल्लवी-
रभिप्रनृत्ता इव वारयोषितः ॥
परिश्रमक्लान्तविलोचनोत्पलाः ।
निरीक्षितुं नोपरराम बल्लवी-
रभिप्रनृत्ता इव वारयोषितः ॥
अन्वयः
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सः मन्थरावल्गितपीवरस्तनीः, परिश्रमक्लान्तविलोचनोत्पलाः, अभिप्रनृत्ताः वारयोषितः इव बल्लवीः निरीक्षितुम् न उपरराम।
English Summary
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He (Arjuna) did not cease to gaze at the cowherd women, whose full breasts swayed gently and whose lotus-like eyes were weary from exertion, appearing like dancing courtesans.
सारांश
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मथने की क्रिया से चंचल और श्रम से थकी आँखों वाली ग्वालिनों को अर्जुन निरंतर निहारते रहे, जो नृत्य करती अप्सराओं सी लग रही थीं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
स इति ॥ मन्थरं मन्दमावल्गिताश्चञ्चला: पीवराः स्तना यासां तास्तथोक्ताः।
स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात् (अष्टाध्यायी ४.१.५४ ) इति ङीप् । परिश्रमेण क्लान्तानि ग्लानानि विलोचनोत्पलानि यासां तास्तथोक्ता बल्लवीर्गोपीः । गोपे गोपालगोसंख्यगोधुगाभीरबल्लवा: इत्यमरः (अमरकोशः २.९.५८ ) । अभिप्रनृत्ता नृत्यन्तीः। गत्यर्थाकर्मक- (अष्टाध्यायी ३.४.७२ ) इत्यादिना कतरि क्तः। मतिबुद्धिपूजार्थेभ्यश्च (अष्टाध्यायी ३.२.१८८ ) ः' इति चकाराद्वर्तमानार्थत्वम् । वारयोषितो वेश्या इव ।वारस्त्री गणिका वेश्या इत्यमरः (अमरकोशः २.६.१९ ) । सोऽर्जुनो निरीक्षितुम् । ईक्षतेस्तुमुन् । नोपरंराम न विरमति स्म । उपाच्च (अष्टाध्यायी १.३.८४ ) । 'विभाषाकर्मकात्' इति परस्पैपदम् । अत्र चतुःश्लोक्यामुपमास्वभावोक्योः संसृष्टिः ॥ पपात पूर्वां जहतो विजिह्मतां वृषोपभुक्तान्तिकसस्यसंपदः । रथाङ्गसीमन्तितसान्द्रकर्दमान्प्रसक्तसंपातपृथक्कृतान्पथः
पदच्छेदः
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| सः | तद् (१.१) | He |
| मन्थरावल्गितपीवरस्तनीः | मन्थर–आवल्गित–पीवर–स्तनी (२.३) | whose full breasts swayed gently |
| परिश्रमक्लान्तविलोचनोत्पलाः | परिश्रम–क्लान्त–विलोचन–उत्पल (२.३) | whose lotus-like eyes were weary from exertion |
| निरीक्षितुम् | निरीक्षितुम् (निर्√ईक्ष्+तुमुन्) | to gaze at |
| न | न | not |
| उपरराम | उपरराम (उप√रम् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | did cease |
| बल्लवीः | बल्लवी (२.३) | the cowherd women |
| अभिप्रनृत्ताः | अभिप्रनृत्त (अभि+प्र√नृत्+क्त, १.३) | dancing |
| इव | इव | like |
| वारयोषितः | वार–योषित् (१.३) | courtesans |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | म | न्थ | रा | व | ल्गि | त | पी | व | र | स्त | नीः |
| प | रि | श्र | म | क्ला | न्त | वि | लो | च | नो | त्प | लाः |
| नि | री | क्षि | तुं | नो | प | र | रा | म | ब | ल्ल | वी |
| र | भि | प्र | नृ | त्ता | इ | व | वा | र | यो | षि | तः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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