जनैरुपग्राममनिन्द्यकर्मभि-
र्विविक्तभावेङ्गितभूषणैर्वृताः ।
भृशं ददर्शाश्रममण्डपोपमाः
सपुष्पहासाः स निवेशवीरुधः ॥
जनैरुपग्राममनिन्द्यकर्मभि-
र्विविक्तभावेङ्गितभूषणैर्वृताः ।
भृशं ददर्शाश्रममण्डपोपमाः
सपुष्पहासाः स निवेशवीरुधः ॥
र्विविक्तभावेङ्गितभूषणैर्वृताः ।
भृशं ददर्शाश्रममण्डपोपमाः
सपुष्पहासाः स निवेशवीरुधः ॥
अन्वयः
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सः उपग्रामम् अनिन्द्यकर्मभिः विविक्तभावेङ्गितभूषणैः जनैः वृताः, आश्रममण्डपोपमाः, सपुष्पहासाः निवेशवीरुधः भृशं ददर्श।
English Summary
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He (Arjuna) keenly observed the settlement's creepers near the village. They were surrounded by people of blameless deeds, whose ornaments were their pure thoughts and gestures. The creepers, resembling hermitage pavilions, seemed to smile with their blossoms.
सारांश
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गाँव के पास लताओं और फूलों से घिरे हुए श्रेष्ठ पुरुषों के सुंदर घर अर्जुन को शांतिपूर्ण आश्रम के मंडप के समान प्रतीत हुए।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
जनैरिति ॥ सोऽर्जुन उपग्रामं ग्रामेषु । विभत्त्यर्थेऽव्ययीभावः । अनिन्द्यकर्मभिरनिषिद्धवृत्तिभिः । वृत्तिश्चैकत्र कृप्यादिरन्यत्र शिलोञ्छादिः । विविक्तान्येकाग्राणि भावोऽभिप्राय इङ्गितं चेष्टा भूषणमलंकारश्च येषां तैस्तथोक्तैर्जनैर्वृताः । अधिष्ठिता इत्यर्थः । अतएवाश्रमेषु मुनिस्थानेषु ये मण्डपास्तदुपमाः ।
मण्डपोऽस्त्री जनाश्रयः इत्यमरः (अमरकोशः २.२.९ ) । सपुष्पहासाः पुष्पविकाससहिताः । तेन सह-' इत्यादिना बहुव्रीहिः । निवेशवीरुधो गृहगुल्मिनीः । 'बीरुधो वल्लिगुल्मिन्यौ' इति वैजयन्ती । भृशं सादरं ददर्श । उपमालंकारः ॥ ततः स संप्रेक्ष्य शरद्गुणश्रियं शरद्गुणालोकनलोलचक्षुषम् । उवाच यक्षस्तमचोदितोऽपि गां न हीङ्गितज्ञोऽवसरेऽवसीदति
पदच्छेदः
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| जनैः | जन (३.३) | by people |
| उपग्रामम् | उपग्रामम् | near the village |
| अनिन्द्यकर्मभिः | अनिन्द्य–कर्मन् (३.३) | of blameless deeds |
| विविक्तभावेङ्गितभूषणैः | विविक्त–भाव–इङ्गित–भूषण (३.३) | whose ornaments were pure thoughts and gestures |
| वृताः | वृत (√वृ+क्त, २.३) | surrounded |
| भृशम् | भृशम् | keenly |
| ददर्श | ददर्श (√दृश् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | observed |
| आश्रममण्डपोपमाः | आश्रम–मण्डप–उपमा (२.३) | resembling hermitage pavilions |
| सपुष्पहासाः | पुष्प–हास (२.३) | with smiles of blossoms |
| सः | तद् (१.१) | He |
| निवेशवीरुधः | निवेश–वीरुध् (२.३) | the settlement's creepers |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | नै | रु | प | ग्रा | म | म | नि | न्द्य | क | र्म | भि |
| र्वि | वि | क्त | भा | वे | ङ्गि | त | भू | ष | णै | र्वृ | ताः |
| भृ | शं | द | द | र्शा | श्र | म | म | ण्ड | पो | प | माः |
| स | पु | ष्प | हा | साः | स | नि | वे | श | वी | रु | धः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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