विपाण्डुभिर्ग्लानतया पयोधरै-
श्च्युताचिराभागुणहेमदामभिः ।
इयं कदम्बानिलभर्तुरत्यये
न दिग्वधूनां कृशता न राजते ॥
विपाण्डुभिर्ग्लानतया पयोधरै-
श्च्युताचिराभागुणहेमदामभिः ।
इयं कदम्बानिलभर्तुरत्यये
न दिग्वधूनां कृशता न राजते ॥
श्च्युताचिराभागुणहेमदामभिः ।
इयं कदम्बानिलभर्तुरत्यये
न दिग्वधूनां कृशता न राजते ॥
अन्वयः
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कदम्बानिलभर्तुः (घनागमस्य) अत्यये, ग्लानतया विपाण्डुभिः, च्युताचिराभागुणहेमदामभिः पयोधरैः (युक्तायाः) दिग्वधूनाम् इयं कृशता न (अशोभना), (अपितु) राजते।
English Summary
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At the passing of the rainy season (the husband of the Kadamba-scented wind), the 'slenderness' of the sky-damsels, with their cloud-breasts pale from exhaustion and shed of their lightning-string-gold-garlands, is not uncomely; rather, it shines.
सारांश
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बिजली रूपी सुवर्ण-मेखला से रहित और श्वेत बादलों के कारण, वर्षा के अंत में दिशा-रूपी वधुओं की यह कृशता (दुबलापन) भी शोभा दे रही है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विपाण्डुभिरिति ॥ कदम्बानिलशब्देन वर्षर्तुरुपलक्ष्यते । स एव भर्ता तस्यात्यये विरहे म्लानतया निर्जलतया दुर्बलतया च विपाण्डुभिश्च्युतानि रहितान्यचिराभागुणा विद्युल्लता एव हेमदामानि सुवर्णसूत्राभरणानि येभ्यस्तैः पयोधरैरम्भोदैः । अन्यत्र स्तनैः। उपलक्षितानाम् ।
स्तनाम्भोदौ पयोधरौ इति वैजयन्ती । दिश एव वध्वस्तासामियं कृशता न राजत इति न । किंतु राजत एव वियुक्तत्वात् । आर्तार्ते मुदिते हृष्टा प्रोषिते मलिना कृशा इति स्मरणादिति भावः। सामान्यतः प्रसक्तमराजनं कार्श्यास्यैकेन नञा संभाव्यं द्वितीयेन निषेधति।यथाह वामनः—संभाव्यनिषेधनिवर्तने द्वौ प्रतिषेधौ इति । अत्र रूपकालंकारः स्फुट एव ।
पदच्छेदः
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| विपाण्डुभिः | विपाण्डु (३.३) | pale |
| ग्लानतया | ग्लानता (३.१) | from exhaustion |
| पयोधरैः | पयोधर (३.३) | with cloud-breasts |
| च्युताचिराभागुणहेमदामभिः | च्युत–अचिराभा–गुण–हेमदामन् (३.३) | shed of their lightning-string-gold-garlands |
| इयम् | इदम् (१.१) | this |
| कदम्बानिलभर्तुः | कदम्ब–अनिल–भर्तृ (६.१) | of the husband of the Kadamba-scented wind (rainy season) |
| अत्यये | अत्यय (७.१) | At the passing |
| न | न | not |
| दिग्वधूनाम् | दिक्–वधू (६.३) | of the sky-damsels |
| कृशता | कृशता (१.१) | slenderness |
| न | न | (is) not (uncomely) |
| राजते | राजते (√राज् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | it shines |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | पा | ण्डु | भि | र्ग्ला | न | त | या | प | यो | ध | रै |
| श्च्यु | ता | चि | रा | भा | गु | ण | हे | म | दा | म | भिः |
| इ | यं | क | द | म्बा | नि | ल | भ | र्तु | र | त्य | ये |
| न | दि | ग्व | धू | नां | कृ | श | ता | न | रा | ज | ते |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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