उपारताः पश्चिमरात्रिगोचरात्
अपारयन्तः पतितुं जवेन गच्छन् ।
तमुत्सुकाश्चक्रुरवेक्षणोत्सुकं
गवां गणाः प्रस्नुतपीवरौधसः ॥
उपारताः पश्चिमरात्रिगोचरात्
अपारयन्तः पतितुं जवेन गच्छन् ।
तमुत्सुकाश्चक्रुरवेक्षणोत्सुकं
गवां गणाः प्रस्नुतपीवरौधसः ॥
अपारयन्तः पतितुं जवेन गच्छन् ।
तमुत्सुकाश्चक्रुरवेक्षणोत्सुकं
गवां गणाः प्रस्नुतपीवरौधसः ॥
अन्वयः
AI
पश्चिम-रात्रि-गोचरात् उपारताः, जवेन पतितुम् अपारयन्तः, प्रस्नुत-पीवर-ऊधसः गवाम् गणाः गच्छन्तः, उत्सुकाः (सन्तः) अवेक्षण-उत्सुकम् तम् चक्रुः ।
English Summary
AI
The herds of cows, their full udders flowing with milk, having ceased their grazing from the last part of the night and now unable to run with speed, made him, who was already eager to see, even more eager as they went along.
सारांश
AI
रात भर चरने के बाद दूध से भरे भारी थनों वाली और बछड़ों के पास जाने को उत्सुक गायों ने अर्जुन को अपनी ओर देखने पर विवश किया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
उपारता इति ॥ पश्चिमा चासौ रात्रिश्चेति विशेषणसमासः । अपररात्र इत्यर्थः।
पूर्वा दिक्पश्चिमं नभ: इत्यादिवदेकदेशिशब्दस्यैकदेशशब्दसामानाधिकरण्यादेकदेशे पर्यवसानम्, न तु पश्चिमं रात्रेरित्येकदेशिसमासः। तद्विधायके पूर्वापरादिसूत्रे पश्चिमशब्दाग्रहणादतएव अहःसर्वैकदेश-इत्यादिना न समासान्तोऽपि तस्यापि पूर्वापरादिसूत्रोक्तसमासविषयत्वादिति । प्रकाशवर्षस्तु-एकदेशिसमासमेवाश्रित्य समासान्तमाह, तन्मृग्यम् । गावश्चरन्त्यत्रेति गोचरो गवां जग्धिस्थानं वनम् । पश्चिमरात्रौ यो गोचरस्तस्मादुपारताः संनिवृत्ता जवेन गां भुवं पतितुं धावितुमपारयन्तोऽशक्नुवन्तः प्रस्नुतपीवरौधसो वत्सस्मरणात्स्रवत्पीनापीनाः । ऊधस्तु क्लीबमापीनम् इत्यमरः (अमरकोशः २.९.७४ ) । ऊधसोऽनङ् (अष्टाध्यायी ५.४.१३१ ) इति स्त्रीग्रहणं कर्तव्यमिति नियमान्नानङादेशः । उत्सुका वत्सेषूत्कण्ठिता गवां गणास्तमर्जुनमवेक्षणोत्सुकं दर्शनलालसं चक्रुः। स्वर्गेषुपशुवाग्वज्रादिङ्गेत्रघृणिभूजले। लक्ष्यदृष्ट्या स्त्रियां पुंसि गौः इत्युभयत्राप्यमरः । अत्र स्वभावोक्तिरलंकार:स्वभावोक्तिरलंकारो यथावद्वस्तुवर्णनम् इति लक्षणात् ॥ परीतर्मुक्षावजये जयश्रिया नदन्तमुच्चैःक्षतसिन्धुरोधसम् । ददर्श षुष्टिं दधतं स शारदीं सविग्रहं दर्पमिवाधिपं गवाम्
पदच्छेदः
AI
| उपारताः | उपारत (उप+आ√रम्+क्त, १.३) | having ceased from |
| पश्चिमरात्रिगोचरात् | पश्चिम–रात्रि–गोचर (५.१) | from grazing in the last part of the night |
| अपारयन्तः | अपारयत् (√पॄ+णिच्+शतृ, १.३) | unable |
| पतितुम् | पतितुम् (√पत्+तुमुन्) | to run |
| जवेन | जव (३.१) | with speed |
| गच्छन्तः | गच्छत् (√गम्+शतृ, १.३) | going |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| उत्सुकाः | उत्सुक (१.३) | eager |
| चक्रुः | चक्रुः (√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | made |
| अवेक्षणोत्सुकम् | अवेक्षण–उत्सुक (२.१) | eager to see |
| गवाम् | गो (६.३) | of the cows |
| गणाः | गण (१.३) | the herds |
| प्रस्नुतपीवरौधसः | प्रस्नुत–पीवर–ऊधस् (१.३) | whose full udders were flowing with milk |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | पा | र | ताः | प | श्चि | म | रा | त्रि | गो | च | रा | |
| त | पा | र | य | न्तः | प | ति | तुं | ज | वे | न | ग | च्छन् |
| त | मु | त्सु | का | श्च | क्रु | र | वे | क्ष | णो | त्सु | कं | |
| ग | वां | ग | णाः | प्र | स्नु | त | पी | व | रौ | ध | सः | |
| ज | त | ज | र | |||||||||
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.