विनम्रशालिप्रसवौघशालिनी-
रपेतपङ्काः ससरोरुहाम्भसः ।
ननन्द पश्यन्नुपसीम स स्थली-
रुपायनीभूतशरद्गुणश्रियः ॥
विनम्रशालिप्रसवौघशालिनी-
रपेतपङ्काः ससरोरुहाम्भसः ।
ननन्द पश्यन्नुपसीम स स्थली-
रुपायनीभूतशरद्गुणश्रियः ॥
रपेतपङ्काः ससरोरुहाम्भसः ।
ननन्द पश्यन्नुपसीम स स्थली-
रुपायनीभूतशरद्गुणश्रियः ॥
अन्वयः
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सः विनम्र-शालि-प्रसव-ओघ-शालिनीः, अपेत-पङ्काः, स-सरोरुह-अम्भसः, उपायनीभूत-शरद्-गुण-श्रियः उपसीम स्थलीः पश्यन् ननन्द ।
English Summary
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He rejoiced, seeing the borderlands, which were adorned with an abundance of bowed-down rice ears, free from mud, with waters full of lotuses, and where the beauty of autumn's qualities had become a gift.
सारांश
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झुकी धान की बालियों, निर्मल जल और कमलों से युक्त शरद कालीन प्राकृतिक सुंदरता वाली सीमाओं को देखकर अर्जुन अत्यंत हर्षित हुए।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विनम्रेति ॥ सोऽर्जुनो विनम्रशालिप्रसवौघशालिनीरवनतशालिफलस्तोमशोभिनीरपेतपङ्का निष्पङ्काः ससरोरुहाण्यम्भांसि यासु तास्तथोक्ताः । उपायनीभूता अर्जुनं प्रत्युपहारीभूताः शरद्गुणश्रियः पूर्वोक्ताः शरद्धर्मसंपदो यासु ताः । उपसीम ग्रामसीमासु । विभक्त्यथैऽव्ययीभावः । समासान्तविधेरनित्यत्वात्
अनश्च (अष्टाध्यायी ५.४.१०८ ) इति समासान्तो न भवति । केचित्तु-अप्यन्येषां कठिनवपुषां दुर्गमे ग्रामसीम्नि इत्यादौ नपुँसकप्रयोगदर्शनात् नपुंसकादन्यतरस्याम् (अष्टाध्यायी ५.४.१०९ ) इति विकल्पात्साधुः" इत्याहुः । स्थलीरकृत्रिमा भुवः ।जानपद- (अष्टाध्यायी ४.१.४२ ) इत्यादिना अकृत्रिमार्थे ङीप् । पश्यन्ननन्द जहर्ष । अत्र शरद्गुणेषु तादात्म्येनारोप्यमाणत्योपायनस्य प्रकृते नन्दनक्रियोपयोगित्वात्परिणामालंकारः॥
पदच्छेदः
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| विनम्रशालिप्रसवौघशालिनीः | विनम्र–शालि–प्रसव–ओघ–शालिन् (२.३) | adorned with an abundance of bowed-down rice ears |
| अपेतपङ्काः | अपेत (अप√इ+क्त)–पङ्क (२.३) | free from mud |
| ससरोरुहाम्भसः | ससरोरुह–अम्भस् (२.३) | with waters full of lotuses |
| ननन्द | ननन्द (√नन्द् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | rejoiced |
| पश्यन् | पश्यत् (√दृश्+शतृ, १.१) | seeing |
| उपसीम | उपसीम (२.३) | borderlands |
| सः | तद् (१.१) | he |
| स्थलीः | स्थली (२.३) | lands |
| उपायनीभूतशरद्गुणश्रियः | उपायनीभूत–शरद्–गुण–श्री (२.३) | where the beauty of autumn's qualities had become a gift |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | न | म्र | शा | लि | प्र | स | वौ | घ | शा | लि | नी |
| र | पे | त | प | ङ्काः | स | स | रो | रु | हा | म्भ | सः |
| न | न | न्द | प | श्य | न्नु | प | सी | म | स | स्थ | ली |
| रु | पा | य | नी | भू | त | श | र | द्गु | ण | श्रि | यः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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