१३.१
अथात्मनः शब्दगुणं गुणज्ञः
पदं विमानेन विगाहमानः ।
रत्नाकरं वीक्ष्य मिथः स जायां
रामाभिधानो हरिरित्युवाच ॥
पदं विमानेन विगाहमानः ।
रत्नाकरं वीक्ष्य मिथः स जायां
रामाभिधानो हरिरित्युवाच ॥
Summary
AI
Then, the knower of merits, Hari in the form of Rama, while traversing the sky—the region whose quality is sound—in the celestial car, looked upon the ocean, the mine of jewels, and spoke thus to his wife.
सारांश
AI
गुणों के ज्ञाता भगवान राम ने आकाश मार्ग से विमान में जाते हुए अपनी पत्नी सीता से नीचे दिखाई दे रहे रत्नाकर (समुद्र) को देखने के लिए कहा।
१३.२
वैदेहि पश्याऽऽमलयाद्विभक्तं
मत्सेतुना फेनिलमम्बुराशिम् ।
छायापथेनेव शरत्प्रसन्न-
माकाशमाविष्कृतचारुतारम् ॥
मत्सेतुना फेनिलमम्बुराशिम् ।
छायापथेनेव शरत्प्रसन्न-
माकाशमाविष्कृतचारुतारम् ॥
Summary
AI
"O Vaidehi, look at the foamy ocean, divided from the Malaya mountain by my bridge. It resembles the clear autumn sky with its beautiful stars revealed, appearing as if divided by the Milky Way."
सारांश
AI
हे वैदेही! मेरे द्वारा बनाए गए सेतु से दो भागों में विभक्त इस फेनिल समुद्र को देखो, जो शरतकालीन स्वच्छ आकाश में मंदाकिनी (आकाशगंगा) जैसा प्रतीत हो रहा है।
१३.३
गुरोर्यियक्षोः कपिलेन मेध्ये
रसातलं संक्रमिते तुरंगे ।
तदर्थमुर्वीमवदारयद्भिः
पूर्वैः किलायं परिवर्धितो नः ॥
रसातलं संक्रमिते तुरंगे ।
तदर्थमुर्वीमवदारयद्भिः
पूर्वैः किलायं परिवर्धितो नः ॥
Summary
AI
"When the sacrificial horse of our ancestor Sagara, who wished to perform a sacrifice, was led to the netherworld by sage Kapila, this very ocean was enlarged by our ancestors, who dug up the earth in search of it."
सारांश
AI
यज्ञ का घोड़ा खोजने के लिए पृथ्वी को खोदने वाले हमारे पूर्वज सगर-पुत्रों द्वारा ही इस समुद्र का विस्तार किया गया था।
१३.४
गर्भं दधत्यर्कमरीचयोऽस्मा-
द्विवृद्धिमत्राश्नुवते वसूनि ।
अबिन्धनं वह्निमसौ बिभर्ति
प्रह्लादनं ज्योतिरजन्यनेन ॥
द्विवृद्धिमत्राश्नुवते वसूनि ।
अबिन्धनं वह्निमसौ बिभर्ति
प्रह्लादनं ज्योतिरजन्यनेन ॥
Summary
AI
"From this ocean, the sun's rays draw up water for clouds. Here, gems attain growth. It holds the submarine fire that burns without fuel, and from it, the delightful moon was born."
सारांश
AI
सूर्य की किरणें यहीं से जल रूपी गर्भ धारण करती हैं, यहीं रत्नों की वृद्धि होती है, यह बड़वानल को थामे हुए है और इसी से आनंददायी चंद्रमा उत्पन्न हुआ है।
१३.५
तां तामवस्थां प्रतिपद्यमानं
स्थितं दश व्याप्य दिशो महिम्ना ।
विष्णोरिवास्यानवधारणीय-
मीदृक्तया रूपमियत्तया वा ॥
स्थितं दश व्याप्य दिशो महिम्ना ।
विष्णोरिवास्यानवधारणीय-
मीदृक्तया रूपमियत्तया वा ॥
Summary
AI
"Assuming various states and pervading the ten directions with its greatness, its form, like that of Vishnu, is incomprehensible either in terms of its essential nature or its vast extent."
सारांश
AI
विभिन्न अवस्थाओं को प्राप्त और दसों दिशाओं में व्याप्त इस समुद्र का स्वरूप और विस्तार भगवान विष्णु की भाँति ही तर्क और बुद्धि से परे है।
१३.६
नाभिप्ररूढाम्बुरुहासनेन
संस्तूयमानः प्रथमेन धात्रा ।
अमुं युगान्तोचितयोगनिद्रः
संहृत्य लोकान्पुरुषोऽधिशेते ॥
संस्तूयमानः प्रथमेन धात्रा ।
अमुं युगान्तोचितयोगनिद्रः
संहृत्य लोकान्पुरुषोऽधिशेते ॥
Summary
AI
"The Supreme Being, Vishnu, in his yogic sleep at the end of an eon, having withdrawn all the worlds into himself, lies upon this very ocean, praised by the first creator, Brahma, who is seated on the lotus that sprouts from His navel."
सारांश
AI
प्रलय काल में लोकों का संहार कर आदि पुरुष विष्णु इसी समुद्र में योगनिद्रा में लीन होते हैं, जहाँ ब्रह्मा उनकी नाभि-कमल पर बैठकर स्तुति करते हैं।
१३.७
पक्षच्छिदा गोत्रभिदात्तगन्धाः
शरण्यमेनं शतशो महीध्राः ।
नृपा इवोपप्लविनः परेभ्यो
धर्मोत्तरं मध्यममाश्रयन्ते ॥
शरण्यमेनं शतशो महीध्राः ।
नृपा इवोपप्लविनः परेभ्यो
धर्मोत्तरं मध्यममाश्रयन्ते ॥
Summary
AI
"Hundreds of mountains, their pride humbled by Indra who cut their wings, take refuge in this ocean. They are like kings oppressed by enemies, seeking shelter with a powerful, righteous, and neutral sovereign who can offer protection."
सारांश
AI
इंद्र द्वारा पंख काटे जाने पर भयभीत पर्वत इस समुद्र की शरण लेते हैं, जैसे शत्रु से पीड़ित राजा किसी शक्तिशाली और धर्मपरायण मध्यस्थ राजा का आश्रय लेते हैं।
१३.८
रसातलादादिभवेन पुंसा
भुवः प्रयुक्तोद्वहनक्रियायाः ।
अस्याच्छमम्मः प्रलयप्रवृद्धं
मुहूर्तवक्राभरणं बभूव ॥
भुवः प्रयुक्तोद्वहनक्रियायाः ।
अस्याच्छमम्मः प्रलयप्रवृद्धं
मुहूर्तवक्राभरणं बभूव ॥
Summary
AI
"When the primeval Purusha, in his first incarnation as the Boar, lifted the Earth from the netherworld, the clear water of this vast ocean, swollen as if at the time of dissolution, served for a moment as an ornament on his snout."
सारांश
AI
आदि पुरुष वराह द्वारा पृथ्वी के उद्धार के समय समुद्र का निर्मल जल क्षण भर के लिए पृथ्वी के मुख का मोतियों वाला सुंदर आभूषण बन गया था।
१३.९
मुखार्पणेषु प्रकृतिप्रगल्भाः
स्वयं तरंगाधरदानदक्षः ।
अनन्यसामान्यकलत्रवृत्तिः
पिबत्यसौ पाययते च सिन्धूः ॥
स्वयं तरंगाधरदानदक्षः ।
अनन्यसामान्यकलत्रवृत्तिः
पिबत्यसौ पाययते च सिन्धूः ॥
Summary
AI
"This ocean, an expert in offering his wave-lips, drinks from the rivers (his wives), who are naturally bold in offering their mouths (estuaries), and makes them drink in return. His relationship with his wives is thus unique and unequalled."
सारांश
AI
यह समुद्र तरंग रूपी अधरों से अपनी पत्नियों (नदियों) का जल स्वयं पीता है और उन्हें भी पिलाता है। इसकी यह रसिकता अनुपम है।
१३.१०
ससत्त्वमादाय नदीमुखाम्भः
संमीलयन्तो विवृताननत्वात् ।
अमी शिरोभिस्तिमयः सरन्ध्रै-
रूर्ध्वं वितन्वन्ति जलप्रवाहान् ॥
संमीलयन्तो विवृताननत्वात् ।
अमी शिरोभिस्तिमयः सरन्ध्रै-
रूर्ध्वं वितन्वन्ति जलप्रवाहान् ॥
Summary
AI
"These whales, having drawn in water from the river estuaries along with the creatures within, close their wide-open mouths and then shoot streams of water upwards through the spouts on their heads."
सारांश
AI
ये विशाल तिमि मछलियाँ मुख खोलकर जलचरों सहित जल को पीती हैं और फिर अपने सिर के छिद्रों से जल की फुहारें ऊपर की ओर छोड़ती हैं।
१३.११
मातंगनक्रैः सहसोत्पत-
द्भिन्नान्द्विधा पश्य समुद्रफेनान् ।
कपोलसंसर्पितया य एषां
व्रजन्ति कर्णक्षणचामरत्वम् ॥
द्भिन्नान्द्विधा पश्य समुद्रफेनान् ।
कपोलसंसर्पितया य एषां
व्रजन्ति कर्णक्षणचामरत्वम् ॥
Summary
AI
"Look at the ocean foam, split in two by elephant-like crocodiles suddenly leaping up. This foam, as it glides over their temples, serves for a moment as decorative chowries for their ears."
सारांश
AI
उछलते हुए जल-हाथियों और मगरमच्छों द्वारा दो भागों में बँटा समुद्र का झाग उनके कपोलों और कानों के पास चँवर जैसी शोभा पा रहा है।
१३.१२
वेलानिलाय प्रसृता भुजंगा
महोर्मिविस्फूर्जथुनिर्विशेषाः ।
सूर्यांशुसंपर्कसमृद्धरागै-
र्व्यज्यन्त एते मणिभिः फणस्थैः ॥
महोर्मिविस्फूर्जथुनिर्विशेषाः ।
सूर्यांशुसंपर्कसमृद्धरागै-
र्व्यज्यन्त एते मणिभिः फणस्थैः ॥
Summary
AI
"These serpents, stretched out to enjoy the sea-breeze and indistinguishable from the great waves, are revealed only by the gems on their hoods, whose brilliant colors are enhanced by the sun's rays."
सारांश
AI
तट की वायु के लिए आए हुए सर्प लहरों जैसे ही लग रहे हैं, किंतु उनके फणों पर स्थित मणियों की चमक उन्हें लहरों से अलग पहचान दे रही है।
१३.१३
तवाधरस्पर्धिषु विद्रुमेषु
पर्यस्तमेतत्सहसोर्मिवेगात् ।
ऊर्ध्वाङ्कुरप्रोतमुखं कथंचि-
त्क्लेशादपक्रामति शङ्खयूथम् ॥
पर्यस्तमेतत्सहसोर्मिवेगात् ।
ऊर्ध्वाङ्कुरप्रोतमुखं कथंचि-
त्क्लेशादपक्रामति शङ्खयूथम् ॥
Summary
AI
"A group of conches, cast by a wave's force onto corals that rival your lips, struggles to move away. Its opening is pierced by an upward-pointing coral sprout, causing it great difficulty."
सारांश
AI
तुम्हारे अधरों की समता करने वाले मूंगों में लहरों के वेग से फँसे हुए शंखों का समूह बड़ी कठिनाई से उनसे मुक्त हो पा रहा है।
१३.१४
प्रवृत्तमात्रेण पयांसि पातु-
मावर्तवेगाद्भ्रमता घनेन ।
आभाति भूयिष्ठमयं समुद्रः
प्रमध्यमानो गिरिणेव भूयः ॥
मावर्तवेगाद्भ्रमता घनेन ।
आभाति भूयिष्ठमयं समुद्रः
प्रमध्यमानो गिरिणेव भूयः ॥
Summary
AI
"As a cloud, just beginning to drink water, whirls with the force of a vortex, this ocean appears exceedingly brilliant, as if it is being churned once again by Mount Mandara."
सारांश
AI
जल पीने के लिए भँवर की गति से घूमते हुए काले बादलों के कारण ऐसा लग रहा है मानो मंदराचल पर्वत से समुद्र का पुनः मंथन किया जा रहा हो।
१३.१५
दूरादयश्चक्रनिभस्य तन्वी
तमालतालीवनराजिनीला ।
आभाति वेला लवणाम्बुराशे-
र्धारानिबद्धेव कलङ्करेखा ॥
तमालतालीवनराजिनीला ।
आभाति वेला लवणाम्बुराशे-
र्धारानिबद्धेव कलङ्करेखा ॥
Summary
AI
"From a distance, the vast ocean resembles an iron wheel. Its slender shoreline, dark with lines of Tamala and palm forests, appears like a line of rust clinging to the wheel's edge."
सारांश
AI
दूर से लोहे के पहिये जैसा दिखने वाले समुद्र के तट की तमाल और ताड़ के वनों वाली नीली पंक्ति लोहे के चक्र पर लगी जंग की रेखा जैसी लग रही है।
१३.१६
वेलानिलः केतकरेणुभिस्ते
संभावयत्याननमायताक्षि ।
मामक्षमं मण्डनकालहाने-
र्वेत्तीव बिम्बाधरबद्धतृष्णम् ॥
संभावयत्याननमायताक्षि ।
मामक्षमं मण्डनकालहाने-
र्वेत्तीव बिम्बाधरबद्धतृष्णम् ॥
Summary
AI
"O long-eyed one! The sea-breeze adorns your face with Ketaki pollen, as if it knows that I, who long for your Bimba-fruit-like lips, am impatient at this delay in your beautification."
सारांश
AI
हे आयताक्षी! तट की वायु केतकी के पराग से तुम्हारे मुख को अलंकृत कर रही है, मानो वह तुम्हारे बिम्बाधरों के चुंबन के लिए मेरी आतुरता को जानती हो।
१३.१७
एते वयं सैकतभिन्नशुक्ति-
पर्यस्तमुक्तापटलं पयोधेः ।
प्राप्ता मुहूर्तेन विमानवेगा-
त्कूलं फलावर्जितपूगमालम् ॥
पर्यस्तमुक्तापटलं पयोधेः ।
प्राप्ता मुहूर्तेन विमानवेगा-
त्कूलं फलावर्जितपूगमालम् ॥
Summary
AI
"Due to the speed of our celestial car, we have in a moment reached the ocean's shore. It is a place where pearls from broken shells are strewn on the sand, and rows of areca-nut trees are bent low with the weight of their fruit."
सारांश
AI
विमान के वेग से हम क्षण भर में समुद्र के उस तट पर पहुँच गए हैं जहाँ सीपियों से निकले मोती बिखरे हैं और सुपारी के बागों की पंक्तियाँ हैं।
१३.१८
कुरुष्व तावत्करभोरु पश्चा-
न्मार्गे मृगप्रेक्षिणि दृष्टिपातम् ।
एषा विदूरीभवतः समुद्रा-
त्सकानना निष्पततीव भूमिः ॥
न्मार्गे मृगप्रेक्षिणि दृष्टिपातम् ।
एषा विदूरीभवतः समुद्रा-
त्सकानना निष्पततीव भूमिः ॥
Summary
AI
"O you with thighs like an elephant's trunk and the gaze of a deer, cast a glance back at the path we've traveled! See how the forested land appears to be flying out from the receding ocean."
सारांश
AI
हे सुन्दरी! अब पीछे की ओर देखो। पीछे छूटते हुए समुद्र से वन के साथ बाहर निकलती हुई पृथ्वी ऐसी लग रही है मानो वह समुद्र से प्रकट हो रही हो।
१३.१९
क्वचित्पथा संचरते सुराणां
क्वचिद्धनानां पततां क्वचिञ्च ।
यथाविधो मे मनसोऽभिलाषः
प्रवर्तते पश्य तथा विमानम् ॥
क्वचिद्धनानां पततां क्वचिञ्च ।
यथाविधो मे मनसोऽभिलाषः
प्रवर्तते पश्य तथा विमानम् ॥
Summary
AI
"See, this celestial car moves as I wish: sometimes on the path of the gods, sometimes of the clouds, and sometimes of the birds. It proceeds according to whatever desire arises in my mind."
सारांश
AI
देखो, यह पुष्पक विमान मेरी इच्छानुसार कभी देवताओं के मार्ग में, कभी बादलों में और कभी पक्षियों के मार्ग में विचरण कर रहा है।
१३.२०
असौ महेन्द्रद्विपदानगन्धि-
स्त्रिमार्गगावीचिविमर्दशीतः ।
आकाशवायुर्दिनयौवनोत्था-
नाचामति स्वेदलवान्मुखे ते ॥
स्त्रिमार्गगावीचिविमर्दशीतः ।
आकाशवायुर्दिनयौवनोत्था-
नाचामति स्वेदलवान्मुखे ते ॥
Summary
AI
Rama tells Sita that this celestial wind, fragrant like the ichor of Indra's elephant Airavata and cooled by the waves of the Ganga, is sipping away the drops of perspiration from her face, caused by the midday heat.
सारांश
AI
गंगा की लहरों के स्पर्श से शीतल और ऐरावत के मद की गंध वाला यह आकाश का पवन दोपहर की गर्मी से हुए तुम्हारे मुख के पसीने को सुखा रहा है।
१३.२१
करेण वातायनलम्बितेन
स्पृष्टस्त्वया चण्डि कुतूहलिन्या ।
आमुञअचतीवाभरणं द्वितीय-
मुद्भिन्नविद्युद्वलयो घनस्ते ॥
स्पृष्टस्त्वया चण्डि कुतूहलिन्या ।
आमुञअचतीवाभरणं द्वितीय-
मुद्भिन्नविद्युद्वलयो घनस्ते ॥
Summary
AI
Rama says to Sita, "O passionate one! Touched by your curious hand dangling from the window, this cloud, with its flashing bracelets of lightning, seems to be putting on a second ornament for you."
सारांश
AI
हे कोपनशीले! कुतूहलवश खिड़की से बाहर निकले तुम्हारे हाथ के स्पर्श से बिजली रूपी कंगन वाला यह बादल मानो तुम्हें दूसरा आभूषण पहना रहा है।
१३.२२
अमी जनस्थानमपोढविघ्नं
मत्वा समारब्धनवोटजानि ।
अध्यासते चीरभृतो यथास्वं
चिरोज्झितान्याश्रममण्डलानि ॥
मत्वा समारब्धनवोटजानि ।
अध्यासते चीरभृतो यथास्वं
चिरोज्झितान्याश्रममण्डलानि ॥
Summary
AI
Rama points out that ascetics, considering Janasthana now free from obstacles, are returning to their respective, long-abandoned hermitage grounds and have begun constructing new huts.
सारांश
AI
जनस्थान को अब बाधाओं से मुक्त मानकर वल्कलधारी मुनि अपने उन आश्रमों में लौट आए हैं जिन्हें उन्होंने पहले छोड़ दिया था, और अब वे वहां नई पर्णकुटियां बना रहे हैं।
१३.२३
सैषा स्थली यत्र विचिन्वता त्वां
भ्रष्टां मया नूपुरमेकमुर्व्याम् ।
अदृश्यत त्वञ्चरणारविन्द-
विश्लेषदुःखादिव बद्धमौनम् ॥
भ्रष्टां मया नूपुरमेकमुर्व्याम् ।
अदृश्यत त्वञ्चरणारविन्द-
विश्लेषदुःखादिव बद्धमौनम् ॥
Summary
AI
Rama shows Sita the spot where, while searching for her after she was lost, he saw a single anklet on the ground. It seemed to be silent, as if grieving from the pain of separation from her lotus-like foot.
सारांश
AI
यह वही स्थान है जहाँ तुम्हें खोजते समय मुझे पृथ्वी पर गिरा तुम्हारा एक नूपुर मिला था, जो तुम्हारे चरण-कमलों से बिछड़ने के दुःख के कारण मानो मौन हो गया था।
१३.२४
त्वं रक्षसा भीरु यतोऽपनीता
तं मार्गमेताः कृपया लता मे ।
अदर्शयन्वक्तुमशक्नुवत्यः
शाखाभिरावर्जितपल्लवाभिः ॥
तं मार्गमेताः कृपया लता मे ।
अदर्शयन्वक्तुमशक्नुवत्यः
शाखाभिरावर्जितपल्लवाभिः ॥
Summary
AI
"O timid one!" says Rama, "These creepers, unable to speak, kindly showed me the path by which the Rakshasa carried you away, by pointing with their branches, which had drooping tender leaves."
सारांश
AI
हे भीरु! जब राक्षस तुम्हें हर ले गया, तब बोलने में असमर्थ इन लताओं ने दयावश अपनी झुकी हुई पल्लवों वाली शाखाओं के माध्यम से मुझे तुम्हारा मार्ग दिखाया था।
१३.२५
मृग्यश्च दर्भाङ्कुरनिर्व्यपेक्षा-
स्तवागतिज्ञं समबोधयन्माम् ।
व्यापारयन्त्यो दिशि दक्षिणस्या-
मुत्पक्ष्मराजीनि विलोचनानि ॥
स्तवागतिज्ञं समबोधयन्माम् ।
व्यापारयन्त्यो दिशि दक्षिणस्या-
मुत्पक्ष्मराजीनि विलोचनानि ॥
Summary
AI
Rama continues, "And the doe-deer, indifferent to the sprouts of grass, informed me—who was ignorant of your path—by directing their eyes, with upturned lashes, towards the southern direction."
सारांश
AI
दर्भांकुरों को चरना छोड़कर इन हिरणियों ने अपनी ऊँची पलकों वाली आँखों को दक्षिण दिशा की ओर उठाकर मुझे तुम्हारे ले जाए जाने के मार्ग का संकेत दिया था।
१३.२६
एतद्गिरेर्माल्यवतः पुरस्ता-
दाविर्भवत्यम्बरलेखि श्रृङ्गम् ।
नवं पयो यत्र घनैर्मया च
त्वद्विप्रयोगाश्रु समं विसृष्टम् ॥
दाविर्भवत्यम्बरलेखि श्रृङ्गम् ।
नवं पयो यत्र घनैर्मया च
त्वद्विप्रयोगाश्रु समं विसृष्टम् ॥
Summary
AI
Rama points ahead, "Look, the sky-scraping peak of Mount Malyavat appears before us. It was there that the clouds shed fresh rain and I shed tears from the pain of separation from you, both at the same time."
सारांश
AI
सामने आकाश को छूने वाला यह माल्यवान पर्वत दिखाई दे रहा है, जहाँ बादलों से बरसते नए जल के साथ मैंने तुम्हारे विरह में आँसू बहाए थे।
१३.२७
गन्धश्च धाराहतपल्वलानां
कादम्बमर्धोद्गतकेसरं च ।
स्निग्धाशअच केकाः शिखिनां बभूवु-
र्यस्मिन्नसह्यानि विनात्वया मे ॥
कादम्बमर्धोद्गतकेसरं च ।
स्निग्धाशअच केकाः शिखिनां बभूवु-
र्यस्मिन्नसह्यानि विनात्वया मे ॥
Summary
AI
On that mountain, the fragrance of rain-swept pools, the Kadamba flower with its half-emerged filaments, and the lovely cries of peacocks—all these became unbearable for me without you.
सारांश
AI
वर्षा की बूंदों से भीगी मिट्टी की गंध, आधे खिले केसर वाले कदम्ब के फूल और मोरों की मधुर कूक—ये सब तुम्हारे बिना मेरे लिए असहनीय हो गए थे।
१३.२८
पूर्वानुभूतं स्मरता च यत्र
कम्पोत्तरं भीरु तवोपगूढम् ।
गुहाविसारीण्यतिवाहितानि
मया कथंचिद्धनगर्जितानि ॥
कम्पोत्तरं भीरु तवोपगूढम् ।
गुहाविसारीण्यतिवाहितानि
मया कथंचिद्धनगर्जितानि ॥
Summary
AI
"O timid one!" Rama says, "There, remembering your trembling embrace from before, I somehow managed to endure the thunder of the clouds as it reverberated through the caves."
सारांश
AI
हे भीरु! तुम्हारे पिछले कंपकंपी युक्त आलिंगन को याद करते हुए, मैंने गुफाओं में गूँजने वाली बादलों की गर्जनाओं को वहाँ जैसे-तैसे सहन किया था।
१३.२९
आसारसिक्तक्षितिबाष्पयोगा-
न्मामक्षिणोद्यत्र विभिन्नकोशैः ।
विडम्ब्यमाना नवकन्दलैस्ते
विवाहधूमारुणलोचनश्रीः ॥
न्मामक्षिणोद्यत्र विभिन्नकोशैः ।
विडम्ब्यमाना नवकन्दलैस्ते
विवाहधूमारुणलोचनश्रीः ॥
Summary
AI
There, the beauty of your eyes, reddened by the smoke of our wedding fire—a beauty now imitated by the fresh Kandala shoots with their burst-open sheaths—tormented me through its association with the vapor rising from the earth drenched by rain showers.
सारांश
AI
वर्षा के कारण पृथ्वी से निकलती भाप के बीच खिले हुए नवीन कन्दल के फूल, जो विवाह के धुएँ से लाल हुई तुम्हारी आँखों की शोभा के समान थे, मुझे अत्यंत पीड़ित करते थे।
१३.३०
उपान्तवानीरवनोपगूढा-
न्यालक्ष्यपारिप्लवसारसानि ।
दूरावतीर्णा पिबतीव खेदा-
दमूनि पम्पासलिलानि दृष्टिः ॥
न्यालक्ष्यपारिप्लवसारसानि ।
दूरावतीर्णा पिबतीव खेदा-
दमूनि पम्पासलिलानि दृष्टिः ॥
Summary
AI
Rama says, "My gaze, descending from afar, seems to drink, out of weariness, these waters of the Pampa lake, which are enclosed by cane-groves on their banks and in which restless Sarasa birds are faintly visible."
सारांश
AI
बेत के जंगलों से घिरे और चंचल सारसों वाले इस पम्पा सरोवर के जल को, दूर से उतरती हुई मेरी दृष्टि थकान के कारण मानो प्यास बुझाने के लिए पी रही है।
१३.३१
अत्रावियुक्तानि रथाङ्गनाम्ना-
मन्योन्यदत्तोत्पलकेसराणि ।
द्वन्द्वानि दूरान्तरवर्तिना ते
मया प्रिये सस्पृहमीक्षितानि ॥
मन्योन्यदत्तोत्पलकेसराणि ।
द्वन्द्वानि दूरान्तरवर्तिना ते
मया प्रिये सस्पृहमीक्षितानि ॥
Summary
AI
"O beloved!" Rama says, "Here, I, being far separated from you, watched with longing the unseparated pairs of Chakravaka birds as they fed each other lotus-filaments."
सारांश
AI
हे प्रिये! एक-दूसरे को कमल का केसर भेंट करते हुए चक्रवाक पक्षियों के इन जोड़ों को, तुमसे दूर होने के कारण मैंने अत्यंत लालसा के साथ देखा था।
१३.३२
इमां तटाशोकलतां च त्वीं
स्तनाभिरामस्तबकाभिनम्राम् ।
त्वत्प्राप्तिबुद्ध्या परिरब्धुकामः
सौमित्रिणा साश्रुरहं निषिद्धः ॥
स्तनाभिरामस्तबकाभिनम्राम् ।
त्वत्प्राप्तिबुद्ध्या परिरब्धुकामः
सौमित्रिणा साश्रुरहं निषिद्धः ॥
Summary
AI
Mistaking this slender Ashoka creeper on the bank, which was bowed down with clusters of flowers lovely like breasts, for you, I was about to embrace it. Desirous and in tears, I was restrained by Lakshmana.
सारांश
AI
तट पर स्थित स्तनों के समान सुंदर गुच्छों से झुकी इस अशोक लता को तुम्हें प्राप्त करने की बुद्धि से जब मैं गले लगाना चाहता था, तब लक्ष्मण ने आँसुओं के साथ मुझे रोका था।
१३.३३
अमूर्विमानान्तरलम्बिनीनां
श्रुत्वा स्वनं काञ्चनकिङ्किणीनाम् ।
प्रत्युद्द्रजन्तीव खमुत्पतन्त्यो
गोदावरीसारसपङ्क्तयस्त्वाम् ॥
श्रुत्वा स्वनं काञ्चनकिङ्किणीनाम् ।
प्रत्युद्द्रजन्तीव खमुत्पतन्त्यो
गोदावरीसारसपङ्क्तयस्त्वाम् ॥
Summary
AI
Look, these rows of Sarasa birds from the Godavari river, hearing the sound of the golden bells hanging inside our celestial car, are flying up into the sky as if to come forth and greet you.
सारांश
AI
इस विमान में लगी स्वर्ण घंटियों की आवाज सुनकर गोदावरी के तट पर रहने वाले सारसों की ये पंक्तियाँ आकाश में उड़कर मानो तुम्हारा स्वागत करने आ रही हैं।
१३.३४
एषा त्वया पेशलमध्ययापि
घटाम्बुसंवर्धितबालचूता ।
आनन्दयत्युन्मुखकृष्णसारा
दृष्टा चिरात्पञ्चवटी मनो मे ॥
घटाम्बुसंवर्धितबालचूता ।
आनन्दयत्युन्मुखकृष्णसारा
दृष्टा चिरात्पञ्चवटी मनो मे ॥
Summary
AI
This is Panchavati, where you, with your slender waist, nurtured a young mango tree with water from a pot, and where black antelopes now look up. Seeing it again after so long delights my heart.
सारांश
AI
हे सुकुमारी! तुम्हारे द्वारा घड़ों के जल से सींचे गए छोटे आम के वृक्षों वाली यह पंचवटी, ऊपर की ओर देखते हुए काले मृगों के साथ आज चिरकाल बाद मेरे मन को आनंदित कर रही है।
१३.३५
अत्रानुगोदं मृगयानिवृत्त-
स्तरंगवातेन विनीतखेदः ।
रहस्त्वदुत्सङ्गनिषण्णमूर्धा
स्मरामि वानीरगृहेषु सुप्तः ॥
स्तरंगवातेन विनीतखेदः ।
रहस्त्वदुत्सङ्गनिषण्णमूर्धा
स्मरामि वानीरगृहेषु सुप्तः ॥
Summary
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I remember how here, along the Godavari, after returning from a hunt, my fatigue soothed by the breeze from the waves, I would sleep in the cane-bowers in private, with my head resting on your lap.
सारांश
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मुझे वह समय याद है जब गोदावरी के किनारे शिकार से लौटकर मैं बेत के कुंजों में तुम्हारी गोद में सिर रखकर सोता था और तरंगों की शीतल वायु मेरी थकान दूर करती थी।
१३.३६
भ्रूमेदमात्रेण पदान्मघोनः
प्रभ्रंशयां यो नहुषं चकार ।
तस्याविलाम्भः परिशुद्धिहेतो-
र्भौमो मुनेः स्थआनपरिग्रहोऽयम् ॥
प्रभ्रंशयां यो नहुषं चकार ।
तस्याविलाम्भः परिशुद्धिहेतो-
र्भौमो मुनेः स्थआनपरिग्रहोऽयम् ॥
Summary
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This is the earthly abode of that sage (Agastya) who, with a mere knitting of his brows, caused King Nahusha to fall from the position of Indra, and who is the cause for the purification of turbid waters.
सारांश
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यह उन महर्षि अगस्त्य का आश्रम है जिन्होंने केवल भौंहों के तिरछेपन से नहुष को इंद्र के पद से गिरा दिया था और जो मैला जल स्वच्छ करने के कारण प्रसिद्ध हैं।
१३.३७
त्रेताग्निधूमाग्रमनिन्द्यकीर्ते-
स्तस्येदमाक्रान्तविमानमार्गम् ।
घ्रात्वा हविर्गन्धि रजोविमुक्तः
समश्नुते मेलघिमानमात्मा ॥
स्तस्येदमाक्रान्तविमानमार्गम् ।
घ्रात्वा हविर्गन्धि रजोविमुक्तः
समश्नुते मेलघिमानमात्मा ॥
Summary
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Having smelled this smoke from the three sacred fires of that sage of irreproachable fame—smoke which is fragrant with oblations and has pervaded our path—my soul, freed from the quality of passion (Rajas), attains a state of lightness.
सारांश
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निष्पाप कीर्ति वाले उन महर्षि के यज्ञ की अग्नि के आहुति-गंध युक्त इस धुएँ को सूंघकर, जो विमान के मार्ग तक पहुँच रहा है, मेरी आत्मा पापमुक्त होकर हल्कापन अनुभव कर रही है।
१३.३८
एतन्मुनेर्मानिनि शातकर्णेः
पञ्चाप्सरो नाम विहारवारि ।
आभाति पर्यन्तवनं विदूरा-
न्मेघान्तरालक्ष्यमिवेन्दुबिम्बम् ॥
पञ्चाप्सरो नाम विहारवारि ।
आभाति पर्यन्तवनं विदूरा-
न्मेघान्तरालक्ष्यमिवेन्दुबिम्बम् ॥
Summary
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"O proud lady," says Rama, "this is the pleasure-lake of the sage Shatakarni, named Panchapsaras. Surrounded by forests on its borders, it shines from a distance like the disc of the moon faintly visible between clouds."
सारांश
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हे मानिनी! महर्षि शातकर्णी का यह 'पंचाप्सरस' नामक सरोवर है, जो चारों ओर वनों से घिरा होने के कारण दूर से बादलों के बीच दिखाई देने वाले चंद्रमा के समान लग रहा है।
१३.३९
पुरा स दर्भाङ्कुरमात्रवृत्ति-
श्चरन्मृगैः सार्धमृषिर्मघोनाः ।
समाधिभीतेन किलोपनीतः
पञ्चाप्सरोयौवनकूटबन्धम् ॥
श्चरन्मृगैः सार्धमृषिर्मघोनाः ।
समाधिभीतेन किलोपनीतः
पञ्चाप्सरोयौवनकूटबन्धम् ॥
Summary
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It is said that formerly, this sage, who subsisted only on grass sprouts and wandered with the deer, was led into the ensnaring trap of the youth of five Apsaras by Indra, who was afraid of the power of his deep meditation.
सारांश
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प्राचीन काल में केवल दर्भांकुर खाकर मृगों के साथ रहने वाले उन ऋषि की तपस्या से डरकर इंद्र ने उन्हें लुभाने के लिए पाँच अप्सराओं को उनके पास भेजा था।
१३.४०
तस्यायमन्तर्हितसौधभाजः
प्रसक्तसंगीतमृदङ्गघोषः ।
वियद्गतः पुष्पकचन्द्रशालाः
क्षणं प्रतिश्रुन्मुखराः करोति ॥
प्रसक्तसंगीतमृदङ्गघोषः ।
वियद्गतः पुष्पकचन्द्रशालाः
क्षणं प्रतिश्रुन्मुखराः करोति ॥
Summary
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This sound of continuous music and drums, rising to the sky from that city whose mansions are hidden from view, makes the upper chambers of the Pushpaka chariot resonant with echoes for a moment.
सारांश
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जल के भीतर स्थित उनके अदृश्य महल से आ रही संगीत और मृदंग की यह ध्वनि आकाश में स्थित पुष्पक विमान के झरोखों को प्रतिध्वनि से मुखरित कर रही है।
१३.४१
हविर्भुजामेधवतां चतुर्णां
मध्ये ललाटंतपसप्तसप्तिः ।
असौ तपस्यत्यपरस्तपस्वी
नाम्ना सुतीक्ष्णश्चरितेन दान्तः ॥
मध्ये ललाटंतपसप्तसप्तिः ।
असौ तपस्यत्यपरस्तपस्वी
नाम्ना सुतीक्ष्णश्चरितेन दान्तः ॥
Summary
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In the midst of four blazing sacrificial fires, like the sun scorching the forehead, this other ascetic, Sutikshna by name and self-controlled by conduct, is performing penance.
सारांश
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अग्नियों के मध्य और सिर को तपाने वाले सूर्य के नीचे सुतीक्ष्ण मुनि तपस्या कर रहे हैं। वे नाम से तीक्ष्ण किंतु व्यवहार से परम शांत और जितेन्द्रिय हैं।
१३.४२
अमुं सहासप्रहितेक्षणानि
व्याजार्धसंदर्शितमेखलानि ।
नालं विकर्तुं जनितेन्द्रशङ्कं
सुराङ्गनाविभ्रमचेष्टितानि ॥
व्याजार्धसंदर्शितमेखलानि ।
नालं विकर्तुं जनितेन्द्रशङ्कं
सुराङ्गनाविभ्रमचेष्टितानि ॥
Summary
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The amorous gestures of celestial nymphs—with glances cast with a smile and girdles half-revealed on some pretext—were not able to distract this ascetic, who had aroused suspicion even in Indra.
सारांश
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इंद्र को भयभीत करने वाले इस तपस्वी को अप्सराओं के हाव-भाव, मुस्कान और मेखलाओं के प्रदर्शन जैसे विलासी प्रयास भी विचलित करने में समर्थ न हो सके।
१३.४३
एषोऽक्षमालावलयं मृगाणां
कण्डूयितारं कुशसूचिलावम् ।
सभाजने मे भुजमूर्ध्वबाहुः
सव्येतरं प्राध्वमितः प्रयुङ्क्ते ॥
कण्डूयितारं कुशसूचिलावम् ।
सभाजने मे भुजमूर्ध्वबाहुः
सव्येतरं प्राध्वमितः प्रयुङ्क्ते ॥
Summary
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This sage, with his arms raised, courteously directs his right arm—which wears a rosary as a bracelet, scratches the deer, and cuts sharp Kusha grass—from his position towards me in greeting.
सारांश
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मृगों की खुजली मिटाने वाली और कुश तोड़ने वाली अपनी दाहिनी भुजा को ऊपर उठाकर ये उर्ध्वबाहु मुनि मेरा स्वागत कर रहे हैं।
१३.४४
वाचंयमत्वात्प्रणतिं ममैष
कम्पेन किंचित्प्रतिगृह्य मूर्ध्नः ।
दृष्टिं विमानव्यवधानमुक्तां
पुनः सहस्रार्चिषि संनिधत्ते ॥
कम्पेन किंचित्प्रतिगृह्य मूर्ध्नः ।
दृष्टिं विमानव्यवधानमुक्तां
पुनः सहस्रार्चिषि संनिधत्ते ॥
Summary
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Due to his vow of silence, this sage accepts my obeisance with a slight nod of his head and then again fixes his gaze, now unobstructed by the aerial car, upon the thousand-rayed sun.
सारांश
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मौन व्रत के कारण उन्होंने सिर हिलाकर मेरा प्रणाम स्वीकार किया और विमान के हटते ही अपनी दृष्टि पुनः सूर्य पर एकाग्र कर ली।
१३.४५
अदः शरण्यं शरभङ्गनाम्न-
स्तपोवनं पावनमाहिताग्नेः ।
चिराय संतर्प्य समिद्भिरग्निं
यो मन्त्रपूतां तनुमप्यहौषीत् ॥
स्तपोवनं पावनमाहिताग्नेः ।
चिराय संतर्प्य समिद्भिरग्निं
यो मन्त्रपूतां तनुमप्यहौषीत् ॥
Summary
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That is the holy penance grove, a refuge, belonging to the sage named Sharabhanga, who maintained the sacred fires. After gratifying the fire with fuel for a long time, he offered even his own mantra-purified body as an oblation.
सारांश
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यह शरभंग ऋषि का पवित्र आश्रम है, जिन्होंने विधिवत अग्नि सेवा के पश्चात अंत में मंत्रों से पवित्र अपने शरीर को भी अग्नि को ही समर्पित कर दिया था।
१३.४६
छायाविनीताध्वपरिश्रमेषु
भूयिष्ठसंभाव्यफलेष्वमीषु ।
तस्यातिथीनामधुना सपर्या
स्थइता सुपुत्रेष्विव पादपेषु ॥
भूयिष्ठसंभाव्यफलेष्वमीषु ।
तस्यातिथीनामधुना सपर्या
स्थइता सुपुत्रेष्विव पादपेषु ॥
Summary
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Now, the duty of extending hospitality to his guests is vested in these trees, which remove the fatigue of travelers with their shade and are expected to yield abundant fruit, just as a father's duties are vested in his good sons.
सारांश
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यहाँ अतिथियों की सेवा अब उन वृक्षों द्वारा की जा रही है जिन्हें ऋषि ने पुत्रवत पाला था। ये वृक्ष अपनी छाया से थकान हरते हैं और प्रचुर फल देते हैं।
१३.४७
धारास्वनोद्गारिदरीमुखोऽसौ
श्रृङ्गाग्रलग्नाम्बुजवप्रपङ्कः ।
बध्नाति मे बन्धुरगात्रि चक्षु-
र्दृप्तः ककुद्मानिव चित्रकूटः ॥
श्रृङ्गाग्रलग्नाम्बुजवप्रपङ्कः ।
बध्नाति मे बन्धुरगात्रि चक्षु-
र्दृप्तः ककुद्मानिव चित्रकूटः ॥
Summary
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O lovely-limbed one! This Chitrakuta mountain, with its cave-mouths roaring with the sound of waterfalls and clouds clinging to its peaks like mud on the horns of a bull, captivates my eye like a proud, humped bull.
सारांश
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हे सुंदर अंगों वाली! गुफाओं से गर्जना करने वाला और चोटियों पर बादलों की कीचड़ लपेटे हुए यह चित्रकूट पर्वत किसी मतवाले बैल के समान दिखाई दे रहा है।
१३.४८
एषा प्रसन्नस्तिमितप्रवाहा
सरिद्विदूरान्तरभावतन्वी ।
मन्दाकिनी भाति नगोपकण्ठे
मुक्तावली कण्ठगतेव भूमेः ॥
सरिद्विदूरान्तरभावतन्वी ।
मन्दाकिनी भाति नगोपकण्ठे
मुक्तावली कण्ठगतेव भूमेः ॥
Summary
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This river Mandakini, with its clear and calm flow, appearing slender due to the great distance, shines on the slope of the mountain like a pearl necklace worn around the neck of the Earth.
सारांश
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पर्वत के पास स्थित शांत और निर्मल प्रवाह वाली यह मन्दाकिनी नदी ऐसी लग रही है मानो पृथ्वी के गले में पड़ी मोतियों की सुंदर माला हो।
१३.४९
अयं सुजातोऽनुगिरं तमालः
प्रवालमादाय सुगन्धि यस्य ।
यवाङ्कुरापाण्डुकपोलशोभी
मयावतंसः परिकल्पितस्ते ॥
प्रवालमादाय सुगन्धि यस्य ।
यवाङ्कुरापाण्डुकपोलशोभी
मयावतंसः परिकल्पितस्ते ॥
Summary
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Here on the mountain is that well-grown Tamala tree, from which I took a fragrant sprout and fashioned an ear-ornament for you, which adorned your cheeks that were as pale as barley sprouts.
सारांश
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पर्वत के निकट यह वही तमाल वृक्ष है जिसके सुगंधित पत्तों से मैंने तुम्हारे पीले कपोलों के लिए कान का आभूषण बनाया था।
१३.५०
अनिग्रहत्रासविनीतसत्त्व-
मपुष्पलिङ्गात्फलबन्धिवृक्षम् ।
वनं तपःसाधनमेतदत्रे-
राविष्कृतोदग्रतरप्रभावम् ॥
मपुष्पलिङ्गात्फलबन्धिवृक्षम् ।
वनं तपःसाधनमेतदत्रे-
राविष्कृतोदग्रतरप्रभावम् ॥
Summary
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This is the forest of the sage Atri, an instrument for his penance, which has manifested its very high power. Here, the creatures are gentle, free from the fear of capture, and the trees bear fruit without first showing the sign of flowers.
सारांश
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यह महर्षि अत्रि का तपोवन है, जहाँ हिंसक पशु भी शांत हैं और वृक्ष बिना फूल के ही फल देते हैं। यहाँ ऋषि का महान प्रभाव प्रत्यक्ष दिखाई देता है।
॥ इति त्रयोदशः सर्गः (दण्डकाप्रत्यागमनम्) ॥
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