श्रीभगवानुवाच ।
९.१
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
Summary
AI
To you, who are free from envy, I shall now declare this most secret knowledge combined with its realization. Knowing this, you will be liberated from all misfortune.
सारांश
AI
श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे दोषरहित अर्जुन, मैं तुम्हें यह परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान कहूँगा, जिसे जानकर तुम संसार के दुखों से मुक्त हो जाओगे।
९.२
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥
Summary
AI
This knowledge is the king of sciences, the king of secrets, the supreme purifier. It is realized by direct perception, is righteous, very joyful to practice, and imperishable.
सारांश
AI
यह ज्ञान सभी विद्याओं और रहस्यों का राजा, परम पवित्र, श्रेष्ठ, प्रत्यक्ष फलदायी, धर्मयुक्त, अविनाशी और अभ्यास करने में अत्यंत सुखद है।
९.३
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥
Summary
AI
O scorcher of foes, those who have no faith in this path fail to attain Me and return to the path of mortal existence, which is fraught with death.
सारांश
AI
हे अर्जुन, इस धर्म में श्रद्धा न रखने वाले मनुष्य मुझे प्राप्त न कर मृत्यु रूपी संसार के चक्र में बार-बार भटकते रहते हैं।
९.४
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥
Summary
AI
By Me, in My unmanifest form, this entire universe is pervaded. All beings abide in Me, but I am not situated in them.
सारांश
AI
मेरे निराकार रूप से यह संपूर्ण जगत व्याप्त है। समस्त प्राणी मुझमें स्थित हैं, परंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
९.५
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥
Summary
AI
And yet, beings do not truly abide in Me. Behold My divine mystic power! My Self, which is the creator and sustainer of all beings, does not dwell within them.
सारांश
AI
मेरी योगशक्ति को देखो कि समस्त प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं। मेरा स्वरूप भूतों को उत्पन्न और धारण करने वाला है, किंतु उनमें स्थित नहीं है।
९.६
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥
Summary
AI
As the mighty wind, moving everywhere, always remains in the sky, so too understand that all beings abide in Me.
सारांश
AI
जिस प्रकार सर्वत्र विचरने वाली महान वायु सदैव आकाश में स्थित रहती है, वैसे ही समस्त प्राणी मुझमें स्थित हैं, ऐसा जानो।
९.७
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
Summary
AI
O son of Kunti, at the end of an aeon, all beings enter My material nature. At the beginning of the next aeon, I create them again.
सारांश
AI
हे कौन्तेय, कल्प के अंत में सभी प्राणी मेरी प्रकृति में विलीन हो जाते हैं और कल्प के आरंभ में मैं उन्हें पुनः उत्पन्न करता हूँ।
९.८
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥
Summary
AI
Taking control of My own material nature, I create again and again this entire multitude of beings, who are helpless under the sway of that nature.
सारांश
AI
अपनी प्रकृति को वश में करके, मैं स्वभाव के वशीभूत हुए इस संपूर्ण प्राणी समुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ।
९.९
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥
Summary
AI
O Dhananjaya, these actions do not bind Me, for I remain situated as if indifferent, completely unattached to those actions.
सारांश
AI
हे धनंजय, उन सृजन आदि कर्मों में अनासक्त और उदासीन रहने के कारण वे कर्म मुझे नहीं बाँधते।
९.१०
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
Summary
AI
O son of Kunti, under My supervision, material nature brings forth all moving and non-moving beings. For this reason, the world continues to revolve.
सारांश
AI
हे अर्जुन, मेरी अध्यक्षता में प्रकृति चराचर सहित संपूर्ण जगत की रचना करती है और इसी कारण यह संसार चक्र घूमता रहता है।
९.११
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
Summary
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Fools disregard Me when I descend in a human form. They do not know My supreme nature as the great Lord of all beings.
सारांश
AI
मूर्ख लोग मेरे परम भाव को और मुझे समस्त प्राणियों का महान ईश्वर न जानकर, मनुष्य रूप में अवतरित मेरा तिरस्कार करते हैं।
९.१२
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥
Summary
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With vain hopes, vain actions, and vain knowledge, these bewildered people resort to the deluding, demonic, and atheistic nature.
सारांश
AI
व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विवेकहीन लोग राक्षसी और आसुरी मोहनी प्रकृति का ही आश्रय लिए रहते हैं।
९.१३
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥
Summary
AI
But the great souls, O Partha, who have taken refuge in the divine nature, worship Me with a single-minded focus, knowing Me as the imperishable origin of all beings.
सारांश
AI
हे पार्थ, दैवी प्रकृति के आश्रित महापुरुष मुझे संपूर्ण भूतों का अविनाशी कारण जानकर अनन्य भाव से मेरी भक्ति करते हैं।
९.१४
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥
Summary
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Always glorifying Me, striving with firm vows, and bowing down to Me with devotion, they, ever steadfast, worship Me.
सारांश
AI
दृढ़ संकल्प वाले भक्त निरंतर मेरे नाम का कीर्तन करते हुए और श्रद्धापूर्वक नमस्कार करते हुए सदैव मेरी उपासना में लगे रहते हैं।
९.१५
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥
Summary
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Others, sacrificing with the sacrifice of knowledge, worship Me as the one whose face is everywhere—viewing Me as one with them, as distinct from them, and in various other forms.
सारांश
AI
अन्य साधक ज्ञान-यज्ञ द्वारा एकत्व भाव से, विभिन्न रूपों में अथवा विश्वरूप मानकर मेरी अनेक प्रकार से उपासना करते हैं।
९.१६
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥
Summary
AI
I am the ritual, I am the sacrifice, I am the offering to the ancestors, I am the medicinal herb. I am the mantra, I am the clarified butter, I am the fire, and I am the oblation.
सारांश
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मैं ही वैदिक अनुष्ठान हूँ, मैं ही यज्ञ, श्राद्ध, औषधि, मंत्र, घी, अग्नि और आहुति की क्रिया भी मैं ही हूँ।
९.१७
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रम्ॐकार ऋक्साम यजुरेव च ॥
वेद्यं पवित्रम्ॐकार ऋक्साम यजुरेव च ॥
Summary
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I am the father of this world, the mother, the supporter, and the grandfather. I am the object of knowledge, the purifier, the syllable Om, and also the Rig, the Sama, and the Yajur Vedas.
सारांश
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मैं इस जगत का पिता, माता, धाता और पितामह हूँ। मैं ही जानने योग्य पवित्र ओंकार तथा ऋग्, साम और यजुर्वेद हूँ।
९.१८
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥
Summary
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I am the goal, the sustainer, the lord, the witness, the abode, the refuge, and the friend. I am the origin, the dissolution, the foundation, the treasure, and the imperishable seed.
सारांश
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मैं ही परम गति, भर्ता, स्वामी, साक्षी, निवास, शरण, मित्र, उत्पत्ति, प्रलय, आधार, आश्रय और अविनाशी बीज हूँ।
९.१९
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥
Summary
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O Arjuna, I give heat; I withhold and send forth the rain. I am immortality and also death; I am being as well as non-being.
सारांश
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मैं ही सूर्य रूप में तपता हूँ, वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। हे अर्जुन, मैं ही अमृत, मृत्यु और सत्-असत् सब कुछ हूँ।
९.२०
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥
Summary
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Those versed in the three Vedas, who drink the Soma juice and are purified of sin, worship Me through sacrifices and pray for passage to heaven. Reaching the meritorious world of Indra, they enjoy the divine pleasures of the gods in heaven.
सारांश
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वेदों के ज्ञाता सोमपायी पुरुष यज्ञों द्वारा मेरी पूजा कर स्वर्ग चाहते हैं। वे पुण्य स्वरूप इंद्रलोक में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं।
९.२१
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते ॥
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते ॥
Summary
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Having enjoyed that vast heavenly world, they enter the mortal world when their merit is exhausted. Thus, following the doctrines of the three Vedas and desiring sense pleasures, they attain a state of coming and going.
सारांश
AI
वे स्वर्ग के सुख भोगकर पुण्य समाप्त होने पर पुनः मृत्युलोक में आते हैं; कामनाओं के अधीन सकाम कर्मी जन्म-मृत्यु के चक्र को प्राप्त होते हैं।
९.२२
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
Summary
AI
To those people who worship Me alone, thinking of no other, and who are ever devoted, I provide what they lack and preserve what they have.
सारांश
AI
जो अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य युक्त भक्तों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।
९.२३
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥
Summary
AI
O son of Kunti, even those devotees who, endowed with faith, worship other gods, they too worship Me alone, though not according to the prescribed method.
सारांश
AI
हे कौन्तेय! जो भक्त श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओं का पूजन करते हैं, वे भी वास्तव में मेरा ही पूजन करते हैं, किंतु उनकी वह विधि अज्ञानपूर्ण होती है।
९.२४
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥
Summary
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For I am indeed the enjoyer and the lord of all sacrifices. But they do not know Me in reality, and therefore they fall.
सारांश
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मैं ही समस्त यज्ञों का भोक्ता और स्वामी हूँ, परंतु जो मुझे तत्व से नहीं जानते, वे अधोगति को प्राप्त होते हैं।
९.२५
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥
Summary
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Votaries of the gods go to the gods; votaries of the ancestors go to the ancestors; worshippers of the spirits go to the spirits; and My worshippers come to Me.
सारांश
AI
देवताओं के उपासक देवताओं को, पितरों के उपासक पितरों को और भूतों के उपासक भूतों को प्राप्त होते हैं, किंतु मेरे भक्त मुझे प्राप्त करते हैं।
९.२६
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
Summary
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Whoever offers Me with devotion a leaf, a flower, a fruit, or water—that offering of love from a pure-hearted soul, I accept.
सारांश
AI
शुद्ध भाव से जो भक्त मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, मैं उसके द्वारा प्रेमपूर्वक दी गई उस भेंट को स्वीकार करता हूँ।
९.२७
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥
Summary
AI
O son of Kunti, whatever you do, whatever you eat, whatever you offer in sacrifice, whatever you give away, and whatever austerities you perform—do that as an offering to Me.
सारांश
AI
हे कौन्तेय! तुम जो भी कार्य, भोजन, हवन, दान या तप करते हो, वह सब मुझे ही समर्पित कर दो।
९.२८
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥
Summary
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Thus you will be freed from the bonds of action and their good and evil results. With your mind steadfast in the yoga of renunciation, you will be liberated and come to Me.
सारांश
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ऐसा करने से तुम कर्मों के शुभ-अशुभ फल रूपी बंधनों से मुक्त हो जाओगे और संन्यास योग से युक्त होकर मुझे प्राप्त होगे।
९.२९
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
Summary
AI
I am equal to all beings; none is hateful or dear to Me. But those who worship Me with devotion are in Me, and I am also in them.
सारांश
AI
मैं सभी प्राणियों में समान हूँ, न मेरा कोई प्रिय है न अप्रिय। जो मुझे भक्ति से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।
९.३०
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
Summary
AI
Even if a person of the most evil conduct worships Me with single-minded devotion, they are to be regarded as righteous, for they have rightly resolved.
सारांश
AI
यदि कोई परम दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भजन करता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिए क्योंकि उसका निश्चय सही है।
९.३१
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
Summary
AI
He quickly becomes righteous and attains everlasting peace. O son of Kunti, know for certain that My devotee never perishes.
सारांश
AI
वह शीघ्र ही धर्मात्मा बनकर परम शांति पाता है। हे कौन्तेय! तुम यह निश्चित जान लो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता।
९.३२
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥
Summary
AI
O Partha, for those who take refuge in Me, even if they are of sinful birth—women, Vaishyas, as well as Shudras—they also attain the supreme goal.
सारांश
AI
हे पार्थ! स्त्री, वैश्य, शूद्र या पापयोनि—जो भी मेरा आश्रय लेते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।
९.३३
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥
Summary
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How much more then for the righteous Brahmanas, the devotees, and the royal sages? Therefore, having come to this transient and joyless world, worship Me.
सारांश
AI
फिर पुण्यशील ब्राह्मणों और राजर्षियों का तो कहना ही क्या! इस अनित्य और सुखरहित संसार में तुम निरंतर मेरा ही भजन करो।
९.३४
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥
Summary
AI
Fix your mind on Me, be My devotee, worship Me, and bow down to Me. Thus, having completely absorbed yourself in Me and having Me as your supreme goal, you will surely come to Me.
सारांश
AI
मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा और नमस्कार करो। मुझमें तल्लीन होकर तुम निश्चित ही मुझे प्राप्त होगे।
॥ इति नवमोऽध्यायः (राजविद्याराजगुह्ययोगः) ॥
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