अन्वयः
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परंतप, अस्य धर्मस्य अश्रद्दधानाः पुरुषाः माम् अप्राप्य मृत्युसंसारवर्त्मनि निवर्तन्ते ।
Summary
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O scorcher of foes, those who have no faith in this path fail to attain Me and return to the path of mortal existence, which is fraught with death.
सारांश
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हे अर्जुन, इस धर्म में श्रद्धा न रखने वाले मनुष्य मुझे प्राप्त न कर मृत्यु रूपी संसार के चक्र में बार-बार भटकते रहते हैं।
पदच्छेदः
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| अश्रद्दधानाः | अश्रद्दधान (अ+श्रत्√धा+शानच्, १.३) | those without faith |
| पुरुषाः | पुरुष (१.३) | persons |
| धर्मस्य | धर्म (६.१) | of the dharma |
| अस्य | इदम् (६.१) | of this |
| परंतप | परम्–तप (८.१) | O scorcher of foes |
| अप्राप्य | अप्राप्य (अ+प्र√आप्+ल्यप्) | not attaining |
| माम् | अस्मद् (२.१) | Me |
| निवर्तन्ते | निवर्तन्ते (नि√वृत् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | they return |
| मृत्युसंसारवर्त्मनि | मृत्यु–संसार–वर्त्मन् (७.१) | in the path of mortal existence |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | श्र | द्द | धा | नाः | पु | रु | षा |
| ध | र्म | स्या | स्य | प | रं | त | प |
| अ | प्रा | प्य | मां | नि | व | र्त | न्ते |
| मृ | त्यु | सं | सा | र | व | र्त्म | नि |
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