१.१
प्रचण्डसूर्यः स्पृहणीयचन्द्रमाः
सदावगाहक्षतवारिसंचयः ।
दिनान्तरम्योऽभ्युपशान्तमन्मथो
निदाघकालोऽयमुपागतः प्रिये ॥
सदावगाहक्षतवारिसंचयः ।
दिनान्तरम्योऽभ्युपशान्तमन्मथो
निदाघकालोऽयमुपागतः प्रिये ॥
Summary
AI
O beloved, this summer season has arrived, characterized by a fierce sun, a desirable moon, water reservoirs diminished by constant bathing, lovely evenings, and subdued passion.
सारांश
AI
हे प्रिये, ग्रीष्म ऋतु आ गई है, जिसमें सूर्य प्रचंड और चंद्रमा प्रिय हो जाता है। जल में निरंतर स्नान से जलाशयों का पानी कम हो जाता है, शामें सुखद होती हैं और कामेच्छा शांत हो जाती है।
१.२
निशाः शशाङ्कक्षतनीलराजयः
क्वचिद्विचित्रं जलयन्त्रमन्दिरम् ।
मणिप्रकाराः सरसं च चन्दनं
शुचौ प्रिये यान्ति जनस्य सेव्यताम् ॥
क्वचिद्विचित्रं जलयन्त्रमन्दिरम् ।
मणिप्रकाराः सरसं च चन्दनं
शुचौ प्रिये यान्ति जनस्य सेव्यताम् ॥
Summary
AI
O beloved, in summer, nights whose darkness is dispelled by the moon, mansions with wonderful water fountains, various gems, and moist sandalwood paste become enjoyable for people.
सारांश
AI
इस ऋतु में चांदनी रातें, जल-यंत्रों से युक्त शीतल भवन, विविध रत्न और सुगंधित चंदन लोगों के लिए अत्यंत सुखद और सेवन योग्य हो जाते हैं।
१.३
सुवासितं हर्म्यतलं मनोहरं
प्रियामुखोच्छ्वासविकम्पितं मधु ।
सुतन्त्रिगीतं मदनस्य दीपनं
शुचौ निशीथेऽनुभवन्ति कामिनः ॥
प्रियामुखोच्छ्वासविकम्पितं मधु ।
सुतन्त्रिगीतं मदनस्य दीपनं
शुचौ निशीथेऽनुभवन्ति कामिनः ॥
Summary
AI
In the summer, at midnight, lovers enjoy fragrant and charming palace terraces, wine stirred by the breath from their beloved's mouth, and well-strung music that kindles passion.
सारांश
AI
ग्रीष्म की रातों में प्रेमी जन महलों की सुगंधित छतों पर, सुंदरी की श्वास से महकती मदिरा और वीणा के मधुर स्वर के साथ कामोद्दीपक आनंद का अनुभव करते हैं।
१.४
नितम्बबिम्बैः सदुकूलमेखलैः
स्तनैः सहाराभरणैः सचन्दनैः ।
शिरोरुहैः स्नानकषायवासितैः
स्त्रियो निदाघं शमयन्ति कामिनाम् ॥
स्तनैः सहाराभरणैः सचन्दनैः ।
शिरोरुहैः स्नानकषायवासितैः
स्त्रियो निदाघं शमयन्ति कामिनाम् ॥
Summary
AI
Women alleviate the summer heat for their lovers with their rounded hips adorned with silk garments and girdles, with their breasts decorated with pearl necklaces and sandalwood paste, and with their hair made fragrant by bathing lotions.
सारांश
AI
स्त्रियां रेशमी वस्त्रों, मोतियों के हारों, शीतल चंदन और स्नान के बाद सुगंधित किए गए अपने केशों के माध्यम से प्रेमियों की ग्रीष्मकालीन तपन को शांत करती हैं।
१.५
नितान्तलाक्षारसरागरञ्जितै-
र्नितम्बिनीनां चरणैः सनूपुरैः ।
पदे पदे हंसरुतानुकारिभि-
र्जनस्य चित्तं क्रियते समन्मथम् ॥
र्नितम्बिनीनां चरणैः सनूपुरैः ।
पदे पदे हंसरुतानुकारिभि-
र्जनस्य चित्तं क्रियते समन्मथम् ॥
Summary
AI
The minds of people are filled with passion by the feet of beautiful women, which are deeply colored with the red dye of lac, adorned with anklets, and at every step, imitate the cackling of swans.
सारांश
AI
लाख के रस से रंगे और हंसों की ध्वनि करने वाले नूपुरों से सुसज्जित सुंदरियों के चरण हर कदम पर पुरुषों के मन में कामभाव जगाते हैं।
१.६
पयोधराश्चन्दनपङ्कचर्चिता-
स्तुषारगौरार्पितहारशेखराः ।
नितम्बदेशाश्च सहेममेखलाः
प्रकुर्वते कस्य मनो न सोत्सुकम् ॥
स्तुषारगौरार्पितहारशेखराः ।
नितम्बदेशाश्च सहेममेखलाः
प्रकुर्वते कस्य मनो न सोत्सुकम् ॥
Summary
AI
Whose mind is not filled with longing by breasts smeared with sandalwood paste and adorned with snow-white pearl necklaces, and by hip regions girdled with golden belts?
सारांश
AI
चंदन के लेप से चर्चित स्तन, उन पर सुशोभित शीतल मोतियों के हार और सुवर्ण की करधनी से सजे नितंब भला किसके मन में उत्कंठा पैदा नहीं करते।
१.७
समुद्गतस्वेदचिताङ्गसंधयो
विमुच्य वासांसि गुरूणि साम्प्रतम् ।
स्तनेषु तन्वंशुकमुन्नतस्तना
निवेशयन्ति प्रमदाः सयौवनाः ॥
विमुच्य वासांसि गुरूणि साम्प्रतम् ।
स्तनेषु तन्वंशुकमुन्नतस्तना
निवेशयन्ति प्रमदाः सयौवनाः ॥
Summary
AI
Now, youthful women with high breasts, their limbs covered in perspiration, are casting off their heavy garments and putting on fine, thin clothes over their bosoms.
सारांश
AI
पसीने से भीगी हुई युवतियां भारी वस्त्रों को त्यागकर अपने उन्नत स्तनों पर अत्यंत बारीक और झीने रेशमी वस्त्र धारण कर रही हैं।
१.८
सचन्दनाम्बुव्यजनोद्भवानिलैः
सहारयष्टिस्तनमण्डलार्पणैः ।
सवल्लकीकाकलिगीतनिस्वनै-
र्विबोध्यते सुप्त इवाद्य मन्मथः ॥
सहारयष्टिस्तनमण्डलार्पणैः ।
सवल्लकीकाकलिगीतनिस्वनै-
र्विबोध्यते सुप्त इवाद्य मन्मथः ॥
Summary
AI
Today, the god of love (Manmatha), as if asleep, is being awakened by breezes from fans sprinkled with sandalwood water, by the offering of breasts adorned with pearl strings, and by the sounds of sweet, soft songs accompanied by lutes.
सारांश
AI
चंदन मिश्रित जल से भीगे पंखों की हवा, स्तनों पर सुशोभित मोतियों की माला और वीणा की मधुर तान सोए हुए कामदेव को पुनः जागृत कर देती है।
१.९
सितेषु हर्म्येषु निशासु योषितां
सुखप्रसुप्तानि मुखानि चन्द्रमाः ।
विलोक्य नूनं भृशमुत्सुकश्चिरं
निशाक्षये याति ह्रियेव पाण्डुताम् ॥
सुखप्रसुप्तानि मुखानि चन्द्रमाः ।
विलोक्य नूनं भृशमुत्सुकश्चिरं
निशाक्षये याति ह्रियेव पाण्डुताम् ॥
Summary
AI
The moon, gazing at the peacefully sleeping faces of women on white palace terraces at night, surely becomes very eager and lingers long. Then, at the end of the night, it turns pale as if from shame.
सारांश
AI
धवल महलों में सोती हुई स्त्रियों के सुंदर मुखों को देखकर ईर्ष्यावश चंद्रमा रात्रि के अंत में लज्जा के कारण पीला पड़कर मानो अस्त हो जाता है।
१.१०
असह्यवातोद्धतरेणुमण्डला
प्रचण्डसूर्यातपतापिता मही ।
न शक्यते द्रष्टुमपि प्रवासिभिः
प्रियावियोगानलदग्धमानसैः ॥
प्रचण्डसूर्यातपतापिता मही ।
न शक्यते द्रष्टुमपि प्रवासिभिः
प्रियावियोगानलदग्धमानसैः ॥
Summary
AI
The earth, with dust clouds raised by unbearable winds and scorched by the heat of the fierce sun, cannot even be looked at by travelers whose minds are already burned by the fire of separation from their beloveds.
सारांश
AI
धूल भरी आंधियों और प्रचंड धूप से तपी हुई धरती को वे यात्री देख भी नहीं पा रहे हैं, जिनका मन प्रिया के वियोग की अग्नि में जल रहा है।
१.११
मृगाः प्रचण्डातपतापिता भृशं
तृषा महत्या परिशुष्कतालवः ।
वनान्तरे तोयमिति प्रधाविता
निरीक्ष्य भिन्नाञ्जनसंनिभं नभः ॥
तृषा महत्या परिशुष्कतालवः ।
वनान्तरे तोयमिति प्रधाविता
निरीक्ष्य भिन्नाञ्जनसंनिभं नभः ॥
Summary
AI
Deer, scorched by the fierce heat and with their palates parched by great thirst, run swiftly into the forest, mistaking the sky, which resembles powdered kohl, for water after seeing it.
सारांश
AI
प्रचंड गर्मी और प्यास से सूखे कंठ वाले मृग वन में काजल के समान काले आकाश को जल समझकर उसकी ओर आशा से दौड़ रहे हैं।
१.१२
सविभ्रमैः सस्मितजिह्मवीक्षितै-
र्विलासवत्यो मनसि प्रवासिनाम् ।
अनङ्गसंदीपनमाशु कुर्वते
यथा प्रदोषाः शशिचारुभूषणाः ॥
र्विलासवत्यो मनसि प्रवासिनाम् ।
अनङ्गसंदीपनमाशु कुर्वते
यथा प्रदोषाः शशिचारुभूषणाः ॥
Summary
AI
Playful women, with their coquettish and smiling side-glances, quickly kindle desire in the minds of travelers, just as the evenings, beautifully adorned by the moon, do.
सारांश
AI
स्त्रियों की मुस्कान और कटाक्ष भरे विलासपूर्ण संकेत यात्रियों के मन में कामेच्छा को उसी प्रकार बढ़ाते हैं, जैसे चंद्रमा से सुशोभित संध्या।
१.१३
रवेर्मयूखैरभितापितो भृशं
विदह्यमानः पथि तप्तपांसुभिः ।
अवाङ्मुखो जिह्मगतिः श्वसन्मुहुः
फणी मयूरस्य तले निषीदति ॥
विदह्यमानः पथि तप्तपांसुभिः ।
अवाङ्मुखो जिह्मगतिः श्वसन्मुहुः
फणी मयूरस्य तले निषीदति ॥
Summary
AI
A serpent, severely scorched by the sun's rays, burned by the hot dust on the path, with its head lowered and moving crookedly, breathing heavily again and again, sits under a peacock (its natural enemy).
सारांश
AI
सूर्य की किरणों और तपती धूल से झुलसा हुआ सांप हांफता हुआ और अपना मुख नीचे किए हुए मोर के पंखों के घेरे की छाया में जाकर बैठ गया है।
१.१४
तृषा महत्या हतविक्रमोद्यमः
श्वसन्मुहुर्दूरविदारिताननः ।
न हन्त्यदूरेऽपि गजान्मृगेश्वरो
विलोलजिह्वश्चलिताग्रकेसरः ॥
श्वसन्मुहुर्दूरविदारिताननः ।
न हन्त्यदूरेऽपि गजान्मृगेश्वरो
विलोलजिह्वश्चलिताग्रकेसरः ॥
Summary
AI
The lion, its strength and effort destroyed by great thirst, panting repeatedly with its mouth wide open, its tongue lolling and the tips of its mane trembling, does not attack elephants even when they are nearby.
सारांश
AI
भीषण प्यास से पराक्रम खो चुका और जीभ लपलपाता हुआ सिंह पास खड़े हाथियों को भी नहीं मार रहा है, वह केवल मुंह खोलकर हांफ रहा है।
१.१५
विशुष्ककण्ठोद्गतसीकराम्भसो
गभस्तिभिर्भानुमतोऽनुतापिताः ।
प्रवृद्धतृष्णोपहता जलार्थिनो
न दन्तिनः केसरिणोऽपि बिभ्यति ॥
गभस्तिभिर्भानुमतोऽनुतापिताः ।
प्रवृद्धतृष्णोपहता जलार्थिनो
न दन्तिनः केसरिणोऽपि बिभ्यति ॥
Summary
AI
Elephants, scorched by the sun's rays, with only foamy spray coming from their parched throats, afflicted by intense thirst and seeking water, are not even afraid of lions.
सारांश
AI
धूप से झुलसे और प्यास से बेहाल हाथी जल की तलाश में इतने व्याकुल हैं कि वे अपने स्वाभाविक शत्रु सिंह से भी भयभीत नहीं हो रहे हैं।
१.१६
हुताग्निकल्पैः सवितुर्गभस्तिभिः
कलापिनः क्लान्तशरीरचेतसः ।
न भोगिनं घ्नन्ति समीपवर्तिनं
कलापचक्रेषु निवेशिताननम् ॥
कलापिनः क्लान्तशरीरचेतसः ।
न भोगिनं घ्नन्ति समीपवर्तिनं
कलापचक्रेषु निवेशिताननम् ॥
Summary
AI
Peacocks, their bodies and minds exhausted by the sun's rays which are like sacrificial fires, do not kill a nearby serpent that has hidden its head in the circle of their tail feathers.
सारांश
AI
अत्यधिक गर्मी के कारण मोर सुस्त हो गए हैं और वे अपने पंखों की छाया में सिर छिपाकर बैठे हुए सांप पर भी आक्रमण नहीं कर रहे हैं।
१.१७
सभद्रमुस्तं परिशुष्ककर्दमं
सरः खनन्नायतपोतृमण्डलैः ।
रवेर्मयूखैरभितापितो भृशं
वराहयूथो विशतीव भूतलम् ॥
सरः खनन्नायतपोतृमण्डलैः ।
रवेर्मयूखैरभितापितो भृशं
वराहयूथो विशतीव भूतलम् ॥
Summary
AI
A herd of wild boars, severely scorched by the sun's rays, digs up a lake bed—which has dried mud and Bhadramusta grass—with their long snouts, appearing as if they are trying to enter the earth itself.
सारांश
AI
धूप से तपे हुए जंगली सुअरों का झुंड मोथा घास वाले तालाबों की सूखी कीचड़ को अपनी थूथन से खोद रहा है, मानो वे धरती के भीतर समाना चाहते हों।
१.१८
विवस्वता तीक्ष्णतरांशुमालिना
सपङ्कतोयात्सरसोऽभितापितः ।
उत्प्लुत्य भेकस्तृषितस्य भोगिनः
फणातपत्रस्य तले निषीदति ॥
सपङ्कतोयात्सरसोऽभितापितः ।
उत्प्लुत्य भेकस्तृषितस्य भोगिनः
फणातपत्रस्य तले निषीदति ॥
Summary
AI
A frog, scorched by the sun with its intensely sharp rays, leaps out of a muddy pond and sits in the shade under the hood-umbrella of a thirsty serpent.
सारांश
AI
प्रचंड गर्मी से व्याकुल मेंढक तालाब से बाहर निकलकर प्यासे सांप के फण की छाया में बैठ गया है, जो उसके लिए छाते के समान है।
१.१९
समुद्धृताशेषमृणालजालकं
विपन्नमीनं द्रुतभीतसारसम् ।
परस्परोत्पीडनसंहतैर्गजैः
कृतं सरः सान्द्रविमर्दकर्दमम् ॥
विपन्नमीनं द्रुतभीतसारसम् ।
परस्परोत्पीडनसंहतैर्गजैः
कृतं सरः सान्द्रविमर्दकर्दमम् ॥
Summary
AI
A lake, with all its lotus stalks uprooted, its fish perished, and its cranes fled in fear, has been turned into thick, churned mud by elephants jostling and pressing against each other.
सारांश
AI
हाथियों के समूह ने परस्पर रगड़ और भार से तालाब के कमलों को उखाड़ दिया है, मछलियां मर गई हैं और जल कीचड़ में बदल गया है।
१.२०
रविप्रभोद्भिन्नशिरोमणिप्रभो
विलोलजिह्वाद्वयलीढमारुतः ।
विषाग्निसूर्यातपतापितः फणी
न हन्ति मण्डूककुलं तृषाकुलः ॥
विलोलजिह्वाद्वयलीढमारुतः ।
विषाग्निसूर्यातपतापितः फणी
न हन्ति मण्डूककुलं तृषाकुलः ॥
Summary
AI
A serpent, its head-jewel's glow enhanced by the sun's rays, licking the air with its flickering forked tongue, tormented by its own venom-fire and the sun's heat, and afflicted by thirst, does not attack a group of frogs.
सारांश
AI
धूप और विष की अग्नि से तपा हुआ प्यासा सांप अपनी दोहरी जीभ से हवा पी रहा है, पर वह पास ही स्थित मेंढकों के झुंड पर हमला नहीं करता।
१.२१
सफेनलालावृतवक्त्रसम्पुटं
विनिःसृतालोहितजिह्वमुन्मुखम् ।
तृषाकुलं निःसृतमद्रिगह्वरा-
दवेक्षमाणं महिषीकुलं जलम् ॥
विनिःसृतालोहितजिह्वमुन्मुखम् ।
तृषाकुलं निःसृतमद्रिगह्वरा-
दवेक्षमाणं महिषीकुलं जलम् ॥
Summary
AI
A herd of buffaloes, their mouths covered in foamy saliva, their reddish tongues hanging out, faces upturned, afflicted by thirst, has emerged from a mountain cave, looking for water.
सारांश
AI
मुख पर फेन और लार लपेटे, अपनी लाल जीभ बाहर निकाले हुए और प्यास से व्याकुल भैंसों का झुंड जल की खोज में पहाड़ की गुफाओं से बाहर निकल रहा है।
१.२२
पटुतरदवदाहोच्छुष्कसस्य प्ररोहाः
परुषपवनवेगोत्क्षिप्तसंशुष्कपर्णाः ।
दिनकरपरितापक्षीणतोयाः समन्ता-
द्विदधति भयमुच्चैर्वीक्ष्यमाणा वनान्ताः ॥
परुषपवनवेगोत्क्षिप्तसंशुष्कपर्णाः ।
दिनकरपरितापक्षीणतोयाः समन्ता-
द्विदधति भयमुच्चैर्वीक्ष्यमाणा वनान्ताः ॥
Summary
AI
The forest regions, when seen, inspire great fear all around. Their new shoots are withered by fierce forest fires, their dry leaves are tossed about by harsh winds, and their water sources are depleted by the sun's heat.
सारांश
AI
भीषण दावानल से सूखी फसलों, तेज हवा से उड़ते सूखे पत्तों और सूर्य की तपिश से सूखे जलाशयों वाले वन के ये प्रांत देखने मात्र से ही मन में भय उत्पन्न कर रहे हैं।
१.२३
श्वसिति विहगवर्गः शीर्णपर्णद्रुमस्थः
कपिकुलमुपयाति क्लान्तमद्रेर्निकुञ्जम् ।
भ्रमति गवययूथः सर्वतस्तोयमिच्छ-
ञ्शरभकुलमजिह्मं प्रोद्धरत्यम्बु कूपात् ॥
कपिकुलमुपयाति क्लान्तमद्रेर्निकुञ्जम् ।
भ्रमति गवययूथः सर्वतस्तोयमिच्छ-
ञ्शरभकुलमजिह्मं प्रोद्धरत्यम्बु कूपात् ॥
Summary
AI
The flock of birds, perched on trees with withered leaves, pants for breath. The exhausted troop of monkeys retreats to a mountain grove. The herd of wild oxen roams everywhere, seeking water. A herd of Sharabhas (mythical beasts) draws water straight up from a well.
सारांश
AI
पत्तों से रहित पेड़ों पर पक्षी हाँफ रहे हैं, थके हुए बंदर पहाड़ी निकुंजों की ओर जा रहे हैं, वनगायों का झुंड पानी खोज रहा है और शरभ कुओं से जल निकालने का प्रयास कर रहे हैं।
१.२४
विकचनवकुसुम्भस्वच्छसिन्दूरभासा
प्रबलपवनवेगोद्भूतवेगेन तूर्णम् ।
तटविटपलताग्रालिङ्गनव्याकुलेन
दिशि दिशि परिदग्धा भूमयः पावकेन ॥
प्रबलपवनवेगोद्भूतवेगेन तूर्णम् ।
तटविटपलताग्रालिङ्गनव्याकुलेन
दिशि दिशि परिदग्धा भूमयः पावकेन ॥
Summary
AI
The lands in every direction are swiftly scorched by the forest fire, which glows like fresh safflower or bright vermilion, whose speed is increased by the force of strong winds, and which is eager to embrace the tops of riverbank trees and creepers.
सारांश
AI
ताजे खिले कुसुम के फूलों और सिन्दूर जैसी आभा वाली दावानल, प्रचंड हवा के वेग से बढ़ती हुई तटों के वृक्षों और लताओं को अपनी लपटों में लपेटकर दसों दिशाओं में धरती को जला रही है।
१.२५
ज्वलति पवनवृद्धः पर्वतानां दरीषु
स्फुटति पटुनिनादैः शुष्कवंशस्थलीषु ।
प्रसरति तृणमध्ये लब्धवृद्धिः क्षणेन
ग्लपयति मृगवर्गं प्रान्तलग्नो दवाग्निः ॥
स्फुटति पटुनिनादैः शुष्कवंशस्थलीषु ।
प्रसरति तृणमध्ये लब्धवृद्धिः क्षणेन
ग्लपयति मृगवर्गं प्रान्तलग्नो दवाग्निः ॥
Summary
AI
The forest fire, fanned by the wind, blazes in mountain caves. It crackles with loud noises in the dry bamboo groves. Spreading through the grass, it grows in an instant. Clinging to the forest edge, it torments the herds of deer.
सारांश
AI
हवा से बढ़कर पर्वतों की कंदराओं में जलती और सूखे बाँसों में चटचटाहट के साथ फैलती हुई दावानल घास के बीच क्षण भर में फैलकर वन के जीवों को व्याकुल कर रही है।
१.२६
बहुतर इव जातः शाल्मलीनां वनेषु
स्फुरति कनकगौरः कोटरेषु द्रुमाणाम् ।
परिणतदलशाखानुत्पतन्प्रांशुवृक्षा-
न्भ्रमति पवनधूतः सर्वतोऽग्निर्वनान्ते ॥
स्फुरति कनकगौरः कोटरेषु द्रुमाणाम् ।
परिणतदलशाखानुत्पतन्प्रांशुवृक्षा-
न्भ्रमति पवनधूतः सर्वतोऽग्निर्वनान्ते ॥
Summary
AI
Fanned by the wind, the forest fire seems to multiply in the groves of silk-cotton trees. It gleams golden-yellow in the hollows of trees. Leaping upon tall trees with withered leaves and branches, it roams everywhere at the forest's edge.
सारांश
AI
सेमल के वनों में फैली और वृक्षों की कोटरों में सुनहरी आभा बिखेरती अग्नि, पवन के झोंकों के साथ सूखे पत्तों वाली ऊँची शाखाओं पर उछलती हुई पूरे वन में भ्रमण कर रही है।
१.२७
गजगवयमृगेन्द्रा वह्निसंतप्तदेहाः
सुहृद इव समेता द्वंद्वभावं विहाय ।
हुतवहपरिखेदादाशु निर्गत्य कक्षा-
द्विपुलपुलिनदेशां निम्नगां संविशन्ति ॥
सुहृद इव समेता द्वंद्वभावं विहाय ।
हुतवहपरिखेदादाशु निर्गत्य कक्षा-
द्विपुलपुलिनदेशां निम्नगां संविशन्ति ॥
Summary
AI
Elephants, gayals, and lions, their bodies scorched by the fire, abandon their mutual enmity. Coming together like friends, distressed by the fire, they quickly emerge from the thickets and enter a river with vast sandy banks.
सारांश
AI
अग्नि से तप्त शरीर वाले हाथी, जंगली बैल और सिंह अपनी स्वाभाविक शत्रुता त्यागकर मित्रों की भाँति साथ आकर आग से बचने के लिए विस्तृत तटों वाली नदियों में प्रवेश कर रहे हैं।
१.२८
कमलवनचिताम्बुः पाटलामोदरम्यः
सुखसलिलनिषेकः सेव्यचन्द्रांशुहारः ।
व्रजतु तव निदाघः कामिनीभिः समेतो
निशि सुललितगीते हर्म्यपृष्ठे सुखेन ॥
सुखसलिलनिषेकः सेव्यचन्द्रांशुहारः ।
व्रजतु तव निदाघः कामिनीभिः समेतो
निशि सुललितगीते हर्म्यपृष्ठे सुखेन ॥
Summary
AI
May your summer—with its waters filled with lotuses, delightful with the fragrance of Patala flowers, pleasant with cool baths, and enjoyable with moonbeams and pearl necklaces—pass happily. May you spend it with your beloveds on a mansion terrace at night, filled with charming songs.
सारांश
AI
कमलों से युक्त जल, पाटल पुष्पों की सुगंध, चंद्रमा की किरणों और सुंदर संगीत के बीच कामिनियों के साथ महलों की छतों पर विहार करते हुए आपका यह ग्रीष्म काल सुखपूर्वक व्यतीत हो।
॥ इति प्रथमः सर्गः ॥
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.