बहुतर इव जातः शाल्मलीनां वनेषु
स्फुरति कनकगौरः कोटरेषु द्रुमाणाम् ।
परिणतदलशाखानुत्पतन्प्रांशुवृक्षा-
न्भ्रमति पवनधूतः सर्वतोऽग्निर्वनान्ते ॥
बहुतर इव जातः शाल्मलीनां वनेषु
स्फुरति कनकगौरः कोटरेषु द्रुमाणाम् ।
परिणतदलशाखानुत्पतन्प्रांशुवृक्षा-
न्भ्रमति पवनधूतः सर्वतोऽग्निर्वनान्ते ॥
स्फुरति कनकगौरः कोटरेषु द्रुमाणाम् ।
परिणतदलशाखानुत्पतन्प्रांशुवृक्षा-
न्भ्रमति पवनधूतः सर्वतोऽग्निर्वनान्ते ॥
अन्वयः
AI
पवनधूतः अग्निः शाल्मलीनाम् वनेषु बहुतरः जातः इव, द्रुमाणाम् कोटरेषु कनकगौरः सन् स्फुरति, तथा परिणतदलशाखान् प्रांशुवृक्षान् उत्पतन् सर्वतः वनान्ते भ्रमति।
Summary
AI
Fanned by the wind, the forest fire seems to multiply in the groves of silk-cotton trees. It gleams golden-yellow in the hollows of trees. Leaping upon tall trees with withered leaves and branches, it roams everywhere at the forest's edge.
सारांश
AI
सेमल के वनों में फैली और वृक्षों की कोटरों में सुनहरी आभा बिखेरती अग्नि, पवन के झोंकों के साथ सूखे पत्तों वाली ऊँची शाखाओं पर उछलती हुई पूरे वन में भ्रमण कर रही है।
ऋतुसमुच्चयटीका (अमरकीर्तिसूरिः)
बहुतर इति ॥ अग्निः पवनधूतः पवनप्रेरितः सन् वनान्ते वनस्यान्तः वनान्तस्तस्मिन् भ्रमति । किं भूतः अग्निः — शाल्मलीनां शाल्मलीवृक्षाणां वनेषूत्प्रेक्षते । पदुतरोऽतिशयेन प्रकटितसाधवो जात इव । पुनर्द्रुमाणं वृक्षाणं कोटिरेषु कनकवद्गौरो गौरवर्ण स्फुरति लगति । किं कुर्वन् — शुष्काश्च ते वृक्षाश्च शुष्कवृक्षास्तान् निर्दहन् प्रज्वालयन्। किंविशिषटान् शुष्कवृक्षान् परिहृतदलशाखान् परिहृतानि गतानि दलानि पत्राणि शाखा विटपाश्च येषां ते तथा तान् ॥
चन्द्रिकाटीका (मणिरामः)
बहुतर इति ॥ अग्निः शाल्मलीनां वनेषु बहुतरः प्रचुररूपो जात इव स्फुरति । द्रूमाणं कोटरेषु शाखागह्वरेषु कनकगौरः काञ्चनगौरः स्फुरति । पवनेन वायुना धूतः कम्पितः सन् अतएव परिणताः परिपक्वा दलानि पर्णानि शाखाश्च येषां तान् तथोक्तान् प्रांशुवृक्षानुन्नतद्रुमान् उत्पतन् सन् सर्वतः समन्ततो वनान्ते भ्रमति भ्रमणं करोतीत्यर्थः ॥
पदच्छेदः
AI
| बहुतरः | बहुतर (१.१) | much more |
| इव | इव | as if |
| जातः | जात (√जन्+क्त, १.१) | born |
| शाल्मलीनाम् | शाल्मली (६.३) | of the silk-cotton trees |
| वनेषु | वन (७.३) | in the forests |
| स्फुरति | स्फुरति (√स्फुर् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | flashes |
| कनकगौरः | कनक–गौर (१.१) | golden-yellow |
| कोटरेषु | कोटर (७.३) | in the hollows |
| द्रुमाणाम् | द्रुम (६.३) | of the trees |
| परिणतदलशाखान् | परिणत (परि√नम्+क्त)–दल–शाखा (२.३) | with withered leaves and branches |
| उतपतन् | उतपतत् (उत्√पत्+शतृ, १.१) | leaping up |
| प्रांशुवृक्षान् | प्रांशु–वृक्ष (२.३) | tall trees |
| भ्रमति | भ्रमति (√भ्रम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | roams |
| पवनधूतः | पवन–धूत (√धू+क्त, १.१) | fanned by the wind |
| सर्वतः | सर्वतः | everywhere |
| अग्निः | अग्नि (१.१) | the fire |
| वनान्ते | वन–अन्त (७.१) | at the forest's edge |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ब | हु | त | र | इ | व | जा | तः | शा | ल्म | ली | नां | व | ने | षु |
| स्फु | र | ति | क | न | क | गौ | रः | को | ट | रे | षु | द्रु | मा | णाम् |
| प | रि | ण | त | द | ल | शा | खा | नु | त्प | त | न्प्रां | शु | वृ | क्षा |
| न्भ्र | म | ति | प | व | न | धू | तः | स | र्व | तो | ऽग्नि | र्व | ना | न्ते |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.