ज्वलति पवनवृद्धः पर्वतानां दरीषु
स्फुटति पटुनिनादैः शुष्कवंशस्थलीषु ।
प्रसरति तृणमध्ये लब्धवृद्धिः क्षणेन
ग्लपयति मृगवर्गं प्रान्तलग्नो दवाग्निः ॥
ज्वलति पवनवृद्धः पर्वतानां दरीषु
स्फुटति पटुनिनादैः शुष्कवंशस्थलीषु ।
प्रसरति तृणमध्ये लब्धवृद्धिः क्षणेन
ग्लपयति मृगवर्गं प्रान्तलग्नो दवाग्निः ॥
स्फुटति पटुनिनादैः शुष्कवंशस्थलीषु ।
प्रसरति तृणमध्ये लब्धवृद्धिः क्षणेन
ग्लपयति मृगवर्गं प्रान्तलग्नो दवाग्निः ॥
अन्वयः
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पवन-वृद्धः, प्रान्त-लग्नः दव-अग्निः पर्वतानाम् दरीषु ज्वलति, शुष्क-वंश-स्थलीषु पटु-निनादैः स्फुटति, क्षणेन लब्ध-वृद्धिः सन् तृण-मध्ये प्रसरति, च मृग-वर्गम् ग्लपयति ।
Summary
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The forest fire, fanned by the wind, blazes in mountain caves. It crackles with loud noises in the dry bamboo groves. Spreading through the grass, it grows in an instant. Clinging to the forest edge, it torments the herds of deer.
सारांश
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हवा से बढ़कर पर्वतों की कंदराओं में जलती और सूखे बाँसों में चटचटाहट के साथ फैलती हुई दावानल घास के बीच क्षण भर में फैलकर वन के जीवों को व्याकुल कर रही है।
ऋतुसमुच्चयटीका (अमरकीर्तिसूरिः)
ज्वलतीति ॥ हि निश्चितं वह्निर्मृगाणां वर्गः समूहस्तं तपयति । किं भूतो वह्निः प्रान्तेषु लग्नः वनान्तेषु लग्नः । पुनः किं भूतः — पवनविद्धः सन् वायुप्रेरितः सन् । पर्वतानां दरीषु गुहासु पतति । पुनः किं भूतः पटुनिनादः सन् प्रकटरवः सन् । शुष्कवंशस्थलीषु शुष्का वंशा वेणुवृक्षा यत्रेदृश्यो याः स्थल्यः स्थलभूमयः तथा तासु स्फुटति । स्फुट स्फुट इति शब्दं करोतीत्यर्थः । तृणमध्ये क्षणेन लब्धवृद्धिः प्राप्तारिकः सन् प्रसरति ॥
चन्द्रिकाटीका (मणिरामः)
ज्वलतीति ॥ पवनेन वायुना वृद्धो वृद्धि प्राप्तो दवाग्निर्दावानलः ।
दवदावौ वनानिलौ इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.२१७ ) । पर्वतानां दरीषु कन्दरेषु ज्वलति । तथा शुष्का वंशा वेणवो यासु ताः स्थल्योऽकृत्रिमभूमयस्तासु पटुतरध्वनिभिः स्फुटति विकासभावमाप्नोति । तथा क्षणेन क्षणादेव लब्धा प्राप्ता बुद्धिर्येन तथोक्तः संस्तृणमध्ये प्रसरति । तथा प्रान्तलग्नः सन् मृगवर्गं हरिणसमूहं ग्लपयति व्याकुलं करोतीत्यर्थः ॥
पदच्छेदः
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| ज्वलति | ज्वलति (√ज्वल् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | blazes |
| पवनवृद्धः | पवन–वृद्ध (√वृध्+क्त, १.१) | fanned by the wind |
| पर्वतानाम् | पर्वत (६.३) | of mountains |
| दरीषु | दरी (७.३) | in caves |
| स्फुटति | स्फुटति (√स्फुट् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | crackles |
| पटुनिनादैः | पटु–निनाद (३.३) | with loud noises |
| शुष्कवंशस्थलीषु | शुष्क (√शुष्+क्त)–वंश–स्थली (७.३) | in the dry bamboo groves |
| प्रसरति | प्रसरति (प्र√सृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spreads |
| तृणमध्ये | तृण–मध्य (७.१) | through the grass |
| लब्धवृद्धिः | लब्ध (√लभ्+क्त)–वृद्धि (१.१) | having gained growth |
| क्षणेन | क्षण (३.१) | in an instant |
| ग्लपयति | ग्लपयति (√ग्लै +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | torments |
| मृगवर्गम् | मृग–वर्ग (२.१) | the herd of deer |
| प्रान्तलग्नः | प्रान्त–लग्न (√लग्+क्त, १.१) | clinging to the edge |
| दवाग्निः | दव–अग्नि (१.१) | the forest fire |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज्व | ल | ति | प | व | न | वृ | द्धः | प | र्व | ता | नां | द | री | षु |
| स्फु | ट | ति | प | टु | नि | ना | दैः | शु | ष्क | वं | श | स्थ | ली | षु |
| प्र | स | र | ति | तृ | ण | म | ध्ये | ल | ब्ध | वृ | द्धिः | क्ष | णे | न |
| ग्ल | प | य | ति | मृ | ग | व | र्गं | प्रा | न्त | ल | ग्नो | द | वा | ग्निः |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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