असह्यवातोद्धतरेणुमण्डला
प्रचण्डसूर्यातपतापिता मही ।
न शक्यते द्रष्टुमपि प्रवासिभिः
प्रियावियोगानलदग्धमानसैः ॥
असह्यवातोद्धतरेणुमण्डला
प्रचण्डसूर्यातपतापिता मही ।
न शक्यते द्रष्टुमपि प्रवासिभिः
प्रियावियोगानलदग्धमानसैः ॥
प्रचण्डसूर्यातपतापिता मही ।
न शक्यते द्रष्टुमपि प्रवासिभिः
प्रियावियोगानलदग्धमानसैः ॥
अन्वयः
AI
असह्य-वात-उद्धत-रेणु-मण्डला, प्रचण्ड-सूर्य-आतप-तापिता मही प्रिया-वियोग-अनल-दग्ध-मानसैः प्रवासिभिः द्रष्टुम् अपि न शक्यते ।
Summary
AI
The earth, with dust clouds raised by unbearable winds and scorched by the heat of the fierce sun, cannot even be looked at by travelers whose minds are already burned by the fire of separation from their beloveds.
सारांश
AI
धूल भरी आंधियों और प्रचंड धूप से तपी हुई धरती को वे यात्री देख भी नहीं पा रहे हैं, जिनका मन प्रिया के वियोग की अग्नि में जल रहा है।
ऋतुसमुच्चयटीका (अमरकीर्तिसूरिः)
असह्येति ॥ मही प्रवासिभिः पान्थैर्द्रष्टुमपिन शक्यते न समर्थैर्भूयते । किंभूता मही — असह्यवातोद्धतरेणुमण्डला । असह्यो योऽसौ वातः असह्यवातः तेनोद्गतानि उच्छालितानि रेणुमण्डलानि रजः पूराणि यस्यां सा । पुनः किंभूता मही — प्रचण्डो रौद्रो योऽसौ सूर्यातपस्तेन तापिता तथा । किंभूतैः प्रवासिभिः — प्रियायाः स्त्रीयाया योऽसौ वियोगो विरहः स एवानलोऽग्निस्तेन दग्धं मानसं येषां ते तथा तैः । अनेन प्रवासिनामत्यन्ताप्रीतिकरोऽयमिति सूचितम् ॥
चन्द्रिकाटीका (मणिरामः)
असह्येति ॥ प्रियावियोगः कान्तावियोगः स एवानलोऽग्निस्तेन दग्धं भस्मीभूतं मानसमन्तःकरणं येषां तैस्तथोक्तैः प्रवासिभिर्विदेशवासिभिरसह्यः सोढुमशक्यो यो वातो वायुस्तेनोद्धतमूर्ध्वं क्षिप्तं रेणुमण्डलं यस्याः सा तथोक्ता । प्रचण्ड उग्रो यः सूर्यस्य तरणेरातपः उष्णं तेन तापिता सन्तापिता मही पृथ्वी द्रष्टुमपि न शक्यते गन्तुं न शक्यत इत्यत्र किं वक्तव्यमित्यर्थः ॥
पदच्छेदः
AI
| असह्यवातोद्धतरेणुमण्डला | असह्य–वात–उद्धत (उद्√धू+क्त)–रेणु–मण्डल (१.१) | with dust clouds raised by unbearable winds |
| प्रचण्डसूर्यातपतापिता | प्रचण्ड–सूर्य–आतप–तापित (√तप्+णिच्+क्त, १.१) | scorched by the heat of the fierce sun |
| मही | मही (१.१) | the earth |
| न | न | not |
| शक्यते | शक्यते (√शक् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is able to be |
| द्रष्टुम् | द्रष्टुम् (√दृश्+तुमुन्) | to be seen |
| अपि | अपि | even |
| प्रवासिभिः | प्रवासिन् (३.३) | by travelers |
| प्रियावियोगानलदग्धमानसैः | प्रिया–वियोग–अनल–दग्ध (√दह्+क्त)–मानस (३.३) | whose minds are burned by the fire of separation from their beloveds |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | स | ह्य | वा | तो | द्ध | त | रे | णु | म | ण्ड | ला |
| प्र | च | ण्ड | सू | र्या | त | प | ता | पि | ता | म | ही |
| न | श | क्य | ते | द्र | ष्टु | म | पि | प्र | वा | सि | भिः |
| प्रि | या | वि | यो | गा | न | ल | द | ग्ध | मा | न | सैः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.