अथेदमारभ्यतेऽपरीक्षित-कारकं नाम पञ्चमं तन्त्रम् । तस्यायमादिमः श्लोकः—
Summary
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Now begins the fifth book, titled Aparīkṣitakārakam (Ill-considered Action). This is its first verse:
सारांश
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अब 'अपरीक्षित-कारक' नामक पाँचवाँ तन्त्र आरम्भ होता है। यह उसका पहला श्लोक है।
५.१
कुदृष्टं कुपरिज्ञातं कुश्रुतं कुपरीक्षितम् ।
तन्नरेण न कर्तव्यं नापितेनात्र यत्कृतम् ॥
तन्नरेण न कर्तव्यं नापितेनात्र यत्कृतम् ॥
Summary
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A person should never perform an action that is poorly observed, misunderstood, improperly heard, or inadequately examined, just as the barber did in this instance.
सारांश
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मनुष्य को वह कार्य नहीं करना चाहिए जो ठीक से देखा, जाना, सुना या परीक्षित न हो, जैसा कि यहाँ नाई ने किया।
तद्यथानुश्रूयते-अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे पाटलिपुत्रं नाम नगरम् । तत्र मणिभद्रो नाम श्रेष्ठी प्रतिवसति स्म । तस्य च धर्मार्थ-काम-मोक्ष-कर्माणि कुर्वतो विधि-वशाद्धन-क्षयः सञ्जातः । ततो विभव-क्षयादपमान-परम्परया परं विषादं गतः । अथान्यदा रात्रौ सुप्तिश्चिन्तितवान्-अहो धिगियं दरिद्रता । उक्तं च—
Summary
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It is told that in the southern city of Pāṭaliputram lived a merchant named Maṇibhadra. Despite his virtuous life, he lost his wealth through fate. Dejected by the ensuing insults, he lamented his poverty one night while asleep, for as it is said—
सारांश
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दक्षिण भारत के पाटलिपुत्र में मणिभद्र नाम का एक सेठ रहता था। भाग्यवश धन नष्ट होने पर वह अत्यंत दुखी हुआ और एक रात सोते समय अपनी दरिद्रता पर विचार करने लगा।
५.२
शीलं शौचं क्षान्तिर्दाक्षिण्यं मधुरता कुले जन्म ।
न विराजन्ति हि सर्वे वित्तविहीनस्य पुसुषस्य ॥
न विराजन्ति हि सर्वे वित्तविहीनस्य पुसुषस्य ॥
Summary
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Character, purity, patience, courtesy, sweetness of speech, and noble birth—none of these shine or hold value in a man who is destitute of wealth.
सारांश
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शील, पवित्रता, क्षमा, उदारता, मधुर वाणी और कुलीन जन्म—ये सब गुण धनहीन व्यक्ति में शोभा नहीं देते।
५.३
मानो वा दर्पो वा विज्ञानं विभ्रमः सुबुद्धिर्वा ।
सर्वं प्रणश्यति समं वित्तविहीनो यदा पुरुषः ॥
सर्वं प्रणश्यति समं वित्तविहीनो यदा पुरुषः ॥
Summary
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Self-respect, pride, specialized knowledge, charm, or keen intellect—everything perishes simultaneously when a man becomes devoid of wealth.
सारांश
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जब मनुष्य धनहीन हो जाता है, तब उसका सम्मान, गर्व, ज्ञान, शोभा और बुद्धि—सब एक साथ नष्ट हो जाते हैं।
५.४
प्रतिदिवसं याति लयं वसन्तवाताहतेव शिशिरश्रीः ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामपि कुटुम्बभरचिन्तया सततम् ॥
बुद्धिर्बुद्धिमतामपि कुटुम्बभरचिन्तया सततम् ॥
Summary
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Even the intellect of the wise dissolves daily due to the constant worry of supporting a family, much like the beauty of winter fades when struck by the spring breeze.
सारांश
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वसंत की वायु से शिशिर की शोभा की भाँति, बुद्धिमानों की बुद्धि भी परिवार के भरण-पोषण की निरंतर चिंता से प्रतिदिन क्षीण होती जाती है।
५.५
नश्यति विपुलमतेरपि
बुद्धिः पुरुषस्य मन्दविभवस्य ।
घृतलवणतैलतण्डुल-
वस्त्रेन्धनचिन्तया सततम् ॥
बुद्धिः पुरुषस्य मन्दविभवस्य ।
घृतलवणतैलतण्डुल-
वस्त्रेन्धनचिन्तया सततम् ॥
Summary
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The intellect of even a profoundly intelligent man perishes when he is of meager means, consumed by the constant anxiety over basic necessities like ghee, salt, oil, rice, clothing, and fuel.
सारांश
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धनहीन होने पर विशाल बुद्धि वाले व्यक्ति की मति भी घी, नमक, तेल, चावल, वस्त्र और ईंधन की निरंतर चिंता में नष्ट हो जाती है।
५.६
गणनमिव नष्ट-तारकं सुष्कमिव सरः श्मशानमिव रौद्रम् । प्रिय-दर्शनमपि रूक्षं भवति गृहं धन-विहीनस्य ॥
Summary
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The home of a person without wealth, even if otherwise pleasant-looking, appears harsh—like a sky without stars, a dried-up lake, or a terrifying cremation ground.
सारांश
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बिना तारों वाले आकाश, सूखे तालाब और श्मशान की तरह, धनहीन व्यक्ति का घर सुंदर होने पर भी नीरस और भयानक प्रतीत होता है।
५.७
न विभाव्यन्ते लघवो वित्तविहीनाः पुरोऽपि निवसन्तः ।
सततं जातविनष्टाः पयसामिव बुद्बुदाः पयसि ॥
सततं जातविनष्टाः पयसामिव बुद्बुदाः पयसि ॥
Summary
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People of low status who are devoid of wealth are not noticed even when living right in front of others, much like bubbles in water that are constantly born and destroyed.
सारांश
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धनहीन और साधारण लोग सामने रहते हुए भी वैसे ही अनदेखे रह जाते हैं, जैसे जल में निरंतर उत्पन्न और विलीन होने वाले बुलबुले।
५.८
सुकुलं कुशलं सुजनं
विहाय कुलकुशलशीलविकलेऽपि ।
आढ्ये कल्पतराविव
नित्यं रज्यन्ति जननिवहाः ॥
विहाय कुलकुशलशीलविकलेऽपि ।
आढ्ये कल्पतराविव
नित्यं रज्यन्ति जननिवहाः ॥
Summary
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Crowds of people abandon those of noble birth, competence, and virtue to constantly cling to a wealthy man, even if he lacks family, skill, or character, treating him like a wish-fulfilling Kalpataru.
सारांश
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लोग कुलीन और सज्जन व्यक्ति को छोड़कर, गुणहीन होने पर भी धनी व्यक्ति के पास वैसे ही जाते हैं जैसे कल्पवृक्ष के पास।
५.९
विफलमिह पूर्वसुकृतं विद्यावन्तोऽपि कुलसमुद्भूताः ।
यस्य यदा विभवः स्यात्तस्य तदा दासतां यान्ति ॥
यस्य यदा विभवः स्यात्तस्य तदा दासतां यान्ति ॥
Summary
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In this world, past good deeds seem futile. Even those who are learned and of noble birth become servants to whoever possesses wealth at any given time.
सारांश
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यहाँ पूर्व के पुण्य फलहीन हैं; विद्वान और उच्च कुल के लोग भी उसी की सेवा करते हैं जिसके पास धन होता है।
५.१०
लघुरयमाह न लोकः कामं गर्जन्तमपि पतिं पयसाम् ।
सर्वमलज्जाकरमिह यद्यत्कुर्वन्ति परिपूर्णाः ॥
सर्वमलज्जाकरमिह यद्यत्कुर्वन्ति परिपूर्णाः ॥
Summary
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The world does not call the ocean 'low' even though it roars excessively. Whatever the wealthy and powerful do in this world never brings them shame.
सारांश
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लोग गरजते हुए समुद्र को भी छोटा नहीं कहते; इसी प्रकार समृद्ध व्यक्ति जो कुछ भी करते हैं, वह लज्जास्पद नहीं माना जाता।
एवं सम्प्रधार्य भूयोऽप्यचिन्तयत्-तदहमनशनं कृत्वा प्राणानुत्सृजामि । किमनेन व्यर्थ-जीवित-व्यसनेन ?एवं निश्चयं कृत्वा सुप्तः । अथ तस्य स्वप्ने पद्मनिधिः क्षपणक-रूपो दर्शनं दत्त्वा प्रोवाच-भोः श्रेष्ठिन् ! मा त्वं वैराग्यं गच्छ । अहं पद्मनिधिस्तव पूर्व-पुरुषोपार्जितः । तदनेनैव रूपेण प्रातस्त्वद्-गृहमागमिष्यामि । तत्त्वयाहं लगुड-प्रहारेण शिरसि ताडनीयः, येन कनक-मयो भूत्वाक्षयो भवामि ।
Summary
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Resolved to end his life by fasting, the merchant slept. In a dream, the treasure Padmanidhi appeared as a kṣapaṇaka (mendicant), saying, "Do not despair; I am your ancestral wealth. I will visit tomorrow in this form. Strike my head with a staff, and I shall turn into inexhaustible gold."
सारांश
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सेठ ने प्राण त्यागने का निश्चय किया, तभी स्वप्न में 'पद्मनिधि' ने भिक्षु रूप में आकर कहा कि वह उसके पूर्वजों की निधि है। कल वह उसके घर आएगा और सेठ को उसके सिर पर डंडा मारकर उसे सोने में बदलना होगा।
अथ प्रातः प्रबुद्धः सन्स्वप्नं स्मरंश्चिन्ता-चक्रमारूढस्तिष्ठति-अहो सत्योऽयं स्वप्नः किं वा असत्यो भविष्यति, न ज्ञायते । अथवा नूनं मिथ्यानेन भाव्यम् । यतोऽहमहर्-निशं केवलं वित्तमेव चिन्तयामि । उक्तं च—
Summary
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Waking up, he pondered whether the dream was a truth or a delusion born of his constant obsession with wealth. As it is said—
सारांश
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सुबह जागने पर सेठ को स्वप्न की सत्यता पर संदेह हुआ। उसे लगा कि दिन-रात धन की चिंता करने के कारण शायद उसने यह झूठा स्वप्न देखा है।
५.११
व्याधितेन सशोकेन चिन्ताग्रस्तेन जन्तुना ।
कामार्तेनाथ मत्तेन दृष्टः स्वप्नो निरर्थकः ॥
कामार्तेनाथ मत्तेन दृष्टः स्वप्नो निरर्थकः ॥
Summary
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A dream seen by a creature who is diseased, sorrowful, gripped by anxiety, afflicted by lust, or intoxicated is meaningless.
सारांश
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रोगी, शोकाकुल, चिंताग्रस्त, कामुक अथवा मदमत्त व्यक्ति द्वारा देखा गया स्वप्न अर्थहीन और निरर्थक होता है।
एतस्मिन्नन्तरे तस्य भार्यया कश्चिन्नापितः पाद-प्रक्षालनायाहूतः अत्रान्तरे च यथा-निर्दिष्टः क्षपणकः सहसा प्रादुर्बभूव । अथ स तमालोक्य प्रहृष्ट-मना यथासन्न-काष्ठ-दण्डेन तं शिरस्यताडयत् । सोऽपि सुवर्ण-मयो भूत्वा तत्-क्षणात्भूमौ निपतितः । अथ तं स श्रेष्ठी निभृतं स्व-गृह-मध्ये कृत्वा नापितं सन्तोष्य प्रोवाच-तदेतद्धनं वस्त्राणि च मया दत्तानि गृहाण । भद्र ! पुनः कस्यचिन्नाख्येयोऽयं वृत्तान्तः ।
Summary
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While a barber was visiting, the kṣapaṇaka appeared as predicted. The merchant struck him with a wooden staff, and he instantly turned into gold. The merchant hid the gold, rewarded the barber with clothes and money, and warned him to remain silent about the event.
सारांश
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जब नाई सेठ के घर आया, तभी वह भिक्षु वहाँ पहुँचा। सेठ ने उसे डंडे से मारा और वह सोने का होकर गिर पड़ा। सेठ ने नाई को धन-वस्त्र देकर यह बात गुप्त रखने को कहा।
नापितोऽपि स्व-गृहं गत्वा व्यचिन्तयत्-नूनमेते सर्वेऽपि नग्नकाः शिरसि ताडिताः काञ्चन-मया भवन्ति । तदहमपि प्रातः प्रभूतानाहूय लगुडैः शिरसि हन्मि, येन प्रभूतं हाटकं मे भवति । एवं चिन्तयतो महता कष्टेन निशातिचक्राम ।
Summary
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The barber, witnessing this, mistakenly concluded that all naked mendicants turn to gold when struck. He resolved to invite many monks the next day and beat them to gain riches, passing the night in eager anticipation.
सारांश
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नाई ने सोचा कि सभी भिक्षु सिर पर चोट खाने से सोने के बन जाते हैं। उसने भी बहुत सारा सोना पाने के लालच में अगले दिन कई भिक्षुओं को बुलाकर पीटने की योजना बनाई।
अथ प्रभातेऽभ्युत्थाय बृहल्लगुडमेकं प्रगुणीकृत्य, क्षपणक-विहारं गत्वा जिनेन्द्रस्य प्रदक्षिण-त्रयं विधाय, जानुभ्यामवनिं गत्वा वक्त्र-द्वार-न्यस्तोत्तरीयाञ्चलस्तार-स्वरेणेमं श्लोकमपठत्—
Summary
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At dawn, the barber prepared a large staff and went to the monastery. After performing three circumambulations of the Jinendra and kneeling in respect, he loudly recited a verse—
सारांश
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सुबह उठकर नाई ने एक बड़ा डंडा तैयार किया और जैन विहार जाकर भगवान जिनेन्द्र की वन्दना की और एक श्लोक पढ़ा।
५.१२
जयन्ति ते जिना येषां केवलज्ञानशालिनाम् ।
आ जन्मनः स्मरोत्पत्तौ मानसेनोषरायितम् ॥
आ जन्मनः स्मरोत्पत्तौ मानसेनोषरायितम् ॥
Summary
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Victorious are those Jinas endowed with absolute knowledge, whose minds acted as barren soil toward the growth of desire from the moment of their birth.
सारांश
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वे केवल-ज्ञान से संपन्न जिन विजयी हैं, जिनके मन ने जन्म से ही कामदेव की उत्पत्ति के लिए ऊसर भूमि की भाँति कार्य किया है।
५.१३
सा जिह्वा या जिनं स्तौति तच्चित्तं यज्जिने रतम् ।
तौ एव तु करौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ ॥
तौ एव तु करौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ ॥
Summary
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That tongue is true which praises the Jina; that mind is true which is devoted to the Jina; and those hands alone are praiseworthy which perform his worship.
सारांश
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वही जिह्वा सार्थक है जो जिन की स्तुति करे, वही चित्त श्रेष्ठ है जो जिन में लीन हो और वे ही हाथ प्रशंसनीय हैं जो उनकी पूजा करें।
५.१४
ध्यानव्याजमुपेत्य चिन्तयसि कामुन्मील्य चक्षुः क्षणं
पश्यानङ्गशरातुरं जनमिमं त्रातापि नो रक्षसि ।
मिथ्याकारुणिकोऽसि निर्घृणतरस्त्वत्तः कुतोऽन्यः पुमा-
न्सेर्ष्यं मारवधूभिरित्यभिहितो बौद्धो जिनः पातु वः ॥
पश्यानङ्गशरातुरं जनमिमं त्रातापि नो रक्षसि ।
मिथ्याकारुणिकोऽसि निर्घृणतरस्त्वत्तः कुतोऽन्यः पुमा-
न्सेर्ष्यं मारवधूभिरित्यभिहितो बौद्धो जिनः पातु वः ॥
Summary
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Under the pretext of meditation, the Jina is teased by the jealous wives of Māra for his indifference to their beauty and his supposed lack of compassion. May that Buddhist Jina protect you.
सारांश
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मार की पत्नियों द्वारा उलाहना दिए जाने पर भी ध्यान में लीन रहने वाले और करुणा के सागर बुद्ध आपकी रक्षा करें।
एवं संस्तूय, ततः प्रधान-क्षपणकणमासाद्य क्षिति-निहित-जानु-चरणः-नमोऽस्तु वन्दे इत्युच्चार्य, लब्ध-धर्म-वृद्ध्य्-आशीर्वादः सुख-मालिकानुग्रह-लब्ध-व्रतादेश उत्तरीय-निबद्ध-ग्रन्थिः सप्रश्रयमिदमाह-भगवनद्य विहरण-क्रिया समस्त-मुनि-समेतेनास्मद्-गृहे कर्तव्या ।
Summary
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After praising the monks, he approached the head kṣapaṇaka, received a blessing, and humbly invited the entire assembly of monks to his house for their daily meal.
सारांश
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नाई ने प्रधान भिक्षु की वन्दना कर आशीर्वाद लिया और अत्यंत विनयपूर्वक उनसे समस्त मुनियों के साथ अपने घर पधारने की प्रार्थना की।
तच्छ्रुत्वा नापित आह—भगवन् ! वेद्म्यहं युष्मद्-धर्मम् । परं भवतो बहु-श्रावका आह्वयन्ति । साम्प्रतं पुनः पुस्तकाच्छादन-योग्यानि कर्पटानि बहु-मूल्यानि प्रगुणीकृतानि । तथा पुस्तकानां लेखनार्थं लेखकानां च वित्तं सञ्चितमास्ते तत्सर्वथा कालोचितं कार्यम् ।
Summary
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To entice them, the barber claimed he understood their dharma and offered expensive cloth for book covers and funds for scribes, insisting that these gifts be accepted at the proper time.
सारांश
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नाई ने भिक्षुओं से कहा कि उसने उनके लिए वस्त्रों और लेखन कार्य हेतु धन का उचित प्रबंध किया है, अतः वे उसके घर अवश्य चलें।
ततो नापितोऽपि स्व-गृहं गतः । तत्र च गत्वा खदिर-मयं लगुडं सज्जीकृत्य कपाट-युगलं द्वारि समाधाय सार्ध-प्रहरैक-समये भूयोऽपि विहार-द्वारमाश्रित्य सर्वान्भक्ति-युक्तानपि परिचित-श्रावकान्परित्यज्य प्रहृष्ट-मनसस्तस्य पृष्ठतो ययुः । अथवा साध्विदमुच्यते—
Summary
AI
Returning home, the barber prepared a khadira wood staff and bolted his doors. Driven by greed, the monks followed him, abandoning even their regular devotees. As it is aptly said—
सारांश
AI
नाई ने घर जाकर डंडा तैयार किया। नियत समय पर कई भिक्षु लोभ और श्रद्धावश उसके पीछे-पीछे उसके घर की ओर चल दिए।
५.१५
एकाकी गृहसन्त्यक्तः पाणिपात्रो दिगम्बरः ।
सोऽपि सम्बाध्यते लोके तृष्णया पश्य कौतुकम् ॥
सोऽपि सम्बाध्यते लोके तृष्णया पश्य कौतुकम् ॥
Summary
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Observe the wonder: even one who lives alone, has abandoned his home, uses his hands as a bowl, and is sky-clad is still tormented by craving in this world.
सारांश
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आश्चर्य है कि घर छोड़ने वाला, नग्न रहने वाला और हाथ को पात्र बनाने वाला तपस्वी भी इस संसार में तृष्णा से बँधा रहता है।
५.१६
जीर्यन्ते जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।
चक्षुः श्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका तरुणायते ॥
चक्षुः श्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका तरुणायते ॥
Summary
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As a person ages, the hair decays, the teeth decay, and the eyes and ears decay; yet, craving alone remains forever young.
सारांश
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वृद्धावस्था में बाल सफेद हो जाते हैं, दाँत गिर जाते हैं, आँख-कान शिथिल हो जाते हैं, किंतु तृष्णा सदैव युवा बनी रहती है।
ततः परं गृह-मध्ये तान्प्रवेश्य द्वारं निभृतं पिधाय, लगुड-प्रहारैः शिरस्यताडयत् । तेऽपि ताड्यमाना एके मृताः,अन्ये भिन्न-मस्तका फूत्कर्तुमुपचक्रमिरे । अत्रान्तरे तमाक्रन्दमाकर्ण्य कोटर-क्षपालेनाभिहितम्-भो भोः किमयं कोलाहलो नगर-मध्ये ? तद्गम्यताम् ।
Summary
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Once they were inside, he locked the doors and beat the monks with the staff. Some died while others screamed in agony. Hearing the commotion, the city guards rushed to the scene to investigate the noise.
सारांश
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भिक्षुओं को भीतर ले जाकर नाई ने द्वार बंद किया और उन पर डंडों से प्रहार किया। भिक्षुओं का करुण क्रंदन सुनकर नगर के रक्षक वहाँ आ पहुँचे।
ते स सर्वे तदादेशकारिणस्तत्-सहिता वेगात्तद्-गृहं गता यावत्पश्यन्ति तावद्रुधिर-प्लावित-देहाः पलायमाना नग्नका दृष्टाः पृष्टाश्च-भोः किमेतत् ? ते प्रोचुर्यथावस्थितं नापित-वृत्तम् ।
Summary
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The guards arrived to find blood-soaked monks fleeing the house. Upon inquiry, the monks explained the barber's violent actions exactly as they had occurred.
सारांश
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रक्षकों ने देखा कि खून से लथपथ भिक्षु भाग रहे हैं। पूछने पर भिक्षुओं ने नाई की सारी करतूत रक्षकों को बता दी।
तैरपि स नापितो बद्धो हत-शेषैः सह धर्माधिष्ठानं नीतः । तैर्नापितः पृष्टः-भोः ! किमेतत्भवता कुकृत्यमनुष्ठितम् ?
Summary
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The guards arrested the barber and brought him, along with the surviving monks, to the court of justice, demanding an explanation for his heinous crime.
सारांश
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रक्षकों ने नाई को बंदी बनाकर न्यायालय पहुँचाया, जहाँ न्यायाधीशों ने उससे इस कुकृत्य का कारण पूछा।
स आह—किं करोमि ? मया श्रेष्ठि-मणिभद्र-गृहे दृष्ट एवंविधो व्यतिकरः । सोऽपि सर्वं मणिप्रभ-वृत्तान्तं यथा-दृष्टमकथयत् ।
Summary
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The barber explained that he was merely emulating what he had witnessed at the house of the merchant Maṇibhadra, detailing the entire incident.
सारांश
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नाई ने बताया कि उसने सेठ मणिभद्र के घर ऐसा ही होते देखा था। उसने पूरी घटना को वैसे ही कह सुनाया जैसा उसने देखा था।
ततः श्रेष्ठिनमाहूय ते भणितवन्तः-भोः श्रेष्ठिन् ! किं त्वया कश्चित्क्षपणको व्यापादितः ?
Summary
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The judges then summoned the merchant and questioned him whether he had indeed killed a mendicant.
सारांश
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न्यायाधीशों ने सेठ मणिभद्र को बुलाकर पूछा कि क्या उन्होंने किसी भिक्षु की हत्या की है।
ततः तेनापि सर्वः क्षपणक-वृत्तान्तस्तेषां निवेदितः । अथ तैरभिहितम्-अहो शूलमारोप्यतामसौ दुष्टात्मा कुपरिक्षितकारी नापितः । तथानुष्ठिते तैरभिहितम्—
Summary
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The merchant narrated the supernatural event of the kṣapaṇaka. The judges ordered the wicked barber, who acted without due examination, to be impaled. They then remarked—
सारांश
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सेठ ने भिक्षु के स्वर्णमय होने का सारा वृत्तांत सुनाया। न्यायाधीशों ने बिना सोचे-समझे कार्य करने वाले उस दुष्ट नाई को मृत्युदंड देने का आदेश दिया।
५.१७
कुक्कुटं कुपरिज्ञातं कुश्रुतं कुपरीक्षितम् ।
तन्नरेण न कर्तव्यं नापितेनात्र यत्कृतम् ॥
तन्नरेण न कर्तव्यं नापितेनात्र यत्कृतम् ॥
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A person should never perform an action that is poorly understood, ill-heard, or unexamined, just as the barber did in this instance.
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जो कार्य ठीक से परखा या समझा न गया हो, उसे मनुष्य को कदापि नहीं करना चाहिए, जैसा कि इस कथा में नाई ने किया।
५.१८
अपरीक्ष्य न कर्तव्यं कर्तव्यं सुपरीक्षितम् ।
पश्चाद्भवति सन्तापो ब्राह्मणी नकुलं यथा ॥
पश्चाद्भवति सन्तापो ब्राह्मणी नकुलं यथा ॥
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One should not act without examination; an action should only be performed after thorough investigation. Otherwise, one suffers remorse afterwards, just as the Brāhmaṇa woman did regarding the mongoose.
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बिना सोचे-समझे कोई कार्य नहीं करना चाहिए; अन्यथा बाद में वैसा ही पश्चाताप होता है जैसा ब्राह्मणी को नेवले को मारकर हुआ।
मणिभद्र आह—कथमेतत् ?
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Maṇibhadra asked, "How did this happen?"
सारांश
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मणिभद्र ने पूछा—यह कैसे हुआ?
ते धर्माधिकारिणः प्रोचुः—
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Those judicial officers replied:
सारांश
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उन धर्माधिकारियों ने कहा—
कथा १ ब्राह्मणी-नकुल-कथा
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Story 1: The Tale of the Brahmin's Wife and the Mongoose.
सारांश
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कथा १: ब्राह्मणी और नेवले की कहानी।
कस्मिंश्चिदधिष्ठाने देवशर्मा नाम ब्राह्मणः प्रतिवसति स्म । तस्य भार्या प्रसूता सुतमजनयत् । तस्मिन्नेव दिने नकुली नकुलं प्रसूय सृता । अथ सा सुत-वत्सला दारकवत्तमपि नकुलं स्तन्य-दानाभ्यङ्ग-मर्दनादिभिः पुपोष, परं तस्य न विश्वसिति । अपत्य-स्नेहस्य सर्व-स्नेहातिरिक्ततया सततमेवमाशङ्कते यत्कदाचिदेष स्व-जाति-दोष-वशादस्य दारकस्य विरुद्धमाचरिष्यति इति । उक्तं च—
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In a certain city lived a Brahmin named Devaśarmā. His wife bore a son, and on that same day, a mongoose was born whose mother died. The Brahmin's wife raised the mongoose like her own child with nursing and care, yet she never fully trusted it. Fearing its natural predatory instincts might harm her son, she remained perpetually anxious, as it is said:
सारांश
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किसी स्थान पर देवशर्मा नाम का ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। उसी दिन एक नेवली ने भी बच्चे को जन्म दिया और मर गई। उस ब्राह्मणी ने पुत्र-मोह के कारण नेवले के बच्चे का भी अपने पुत्र की तरह पालन-पोषण किया, किंतु वह उस पर पूर्ण विश्वास नहीं करती थी। उसे सदैव भय रहता था कि अपनी जाति के स्वभाववश यह नेवला कभी उसके पुत्र को हानि पहुँचा सकता है।
५.१९
कुपुत्रोऽपि भवेत्पुंसां हृदयानन्दकारकः ।
दुर्विनीतः कुरूपोऽपि मूर्खोऽपि व्यसनी खलः ॥
दुर्विनीतः कुरूपोऽपि मूर्खोऽपि व्यसनी खलः ॥
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Even a bad son—be he ill-mannered, ugly, foolish, addicted to vices, or wicked—can still bring joy to the hearts of his parents.
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चाहे पुत्र उद्दंड, कुरूप, मूर्ख या दुष्ट ही क्यों न हो, वह अपने माता-पिता के हृदय को आनंद ही प्रदान करता है।
५.२०
एवं च भाषते लोकश्चन्दनं किल शीतलम् ।
पुत्रगात्रस्य संस्पर्शश्चन्दनादतिरिच्यते ॥
पुत्रगात्रस्य संस्पर्शश्चन्दनादतिरिच्यते ॥
Summary
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People say that sandalwood is cool, but the touch of a son's body surpasses even sandalwood in its cooling and soothing effect.
सारांश
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संसार में चंदन को शीतल माना जाता है, परंतु पुत्र के अंगों का स्पर्श चंदन से भी कहीं अधिक शीतलता प्रदान करने वाला होता है चुका।
५.२१
सौहृदस्य न वाञ्छन्ति जनकस्य हितस्य च ।
लोकाः प्रपालकस्यापि यथा पुत्रस्य बन्धनम् ॥
लोकाः प्रपालकस्यापि यथा पुत्रस्य बन्धनम् ॥
Summary
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People do not desire the friendship of a father, a benefactor, or even a protector, just as a son does not desire captivity.
सारांश
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लोग किसी हितैषी मित्र, पिता या रक्षक को उतना नहीं चाहते, जितना पुत्र के मोह रूपी बंधन को चाहते हैं।
अथ सा कदाचिच्छय्यायां पुत्रं शाययित्वा जल-कुम्भमादाय पतिमुवाच-ब्राह्मण, जलार्थमहं तडागे यास्यामि । त्वया पुत्रोऽयं नकुलाद्रक्षणीयः ।
Summary
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Once, placing her son on the bed, she took a water-pot and told her husband, "Brahmin, I am going to the pond for water. You must protect our son from the mongoose."
सारांश
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एक बार वह अपने पुत्र को पालने में सुलाकर और जल का घड़ा लेकर अपने पति से बोली—हे ब्राह्मण, मैं जल लेने तालाब पर जा रही हूँ। तुम इस बालक की नेवले से रक्षा करना।
अथ तस्यां गतायां, पृष्ठे ब्राह्मणोऽपि शून्यं गृहं मुक्त्वा भिक्षार्थं क्वचिन्निर्गतः । मातापि तं रुधिर-क्लिन्न-मुखमालोक्य शङ्कित-चित्ता नूनमनेन दुरात्मना दारको भक्षितः इति निश्चिन्त्य कोपात्तस्योपरि तं जल-कुम्भं चिक्षेप ।
Summary
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After she left, the Brahmin also departed to seek alms, leaving the house empty. Upon her return, seeing the mongoose with a blood-stained mouth, the mother suspected the creature had devoured her child. In a fit of rage, she threw the water-pot at it.
सारांश
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ब्राह्मणी के जाने के बाद ब्राह्मण भी घर सूना छोड़कर भिक्षा के लिए चला गया। लौटने पर जब माँ ने नेवले का मुख रक्त से सना हुआ देखा, तो उसे लगा कि निश्चित ही इस दुष्ट ने बालक को खा लिया है। क्रोध में आकर उसने जल से भरा घड़ा नेवले पर दे मारा।
एवं सा नकुलं व्यापाद्य यावत्प्रलपन्ती गृहे आगच्छति, तावत्सुतस्तथैव सुप्तस्तिष्ठति । समीपे कृष्ण-सर्पं खण्डशः कृतमवलोक्य पुत्र-वध-शोकेनात्म-शिरो वक्षः-स्थलं च ताडितुमारब्धा ।
Summary
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Having killed the mongoose, she entered the house wailing, only to find her son sleeping peacefully. Seeing a black cobra nearby torn to pieces, she realized the truth and began striking her head and chest in agonizing grief.
सारांश
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नेवले को मारकर जब वह विलाप करती हुई घर के भीतर गई, तो उसने देखा कि पुत्र सुख से सो रहा है। पास ही एक काले साँप के टुकड़े पड़े देख उसे अपनी भूल का अहसास हुआ और वह शोक में अपना सिर और छाती पीटने लगी।
अत्रान्तरे ब्राह्मणो गृहीत-निर्वापः समायातो यावत्पश्यति तावत्पुत्र-शोकोऽभितप्ता ब्राह्मणी प्रलपति-भो भो लोभात्मन् ! लोभाभिभूतेन त्वया न कृतं मद्-वचः । तदनुभव साम्प्रतं पुत्र-मृत्यु-दुःख-वृक्ष-फलम् । अथवा साध्विदमुच्यते—
Summary
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Meanwhile, the Brahmin returned with alms and found his wife scorched by grief, lamenting, "O greedy soul! Overcome by greed, you ignored my words. Now reap the bitter fruit of the tree of misery from this death." Or as it is said:
सारांश
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इसी बीच ब्राह्मण भिक्षा लेकर आया। उसे देखकर शोकातुर ब्राह्मणी विलाप करते हुए बोली—हे लोभी! लोभ के वश में होकर तुमने मेरी बात नहीं मानी। अब तुम इस पुत्र-वियोग के दुःख रूपी वृक्ष के फल को भोगो। जैसा कि कहा गया है—
५.२२
अतिलोभो न कर्तव्यः कर्तव्यस्तु प्रमाणतः ।
अतिलोभजदोषेण जम्बुको निधनं गतः ॥
अतिलोभजदोषेण जम्बुको निधनं गतः ॥
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Excessive greed should not be practiced; instead, one should act with moderation. Due to the fault arising from excessive greed, the jackal met its death.
सारांश
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अत्यधिक लोभ नहीं करना चाहिए, लोभ की एक सीमा होनी चाहिए। लोभ के दोष के कारण ही सियार की मृत्यु हुई थी।
॥ इति पञ्चमं तन्त्रम् (अपरीक्षितकारकम्) ॥
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