अन्वयः
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लोकाः जनकस्य हितस्य च सौहृदस्य प्रपालकस्य अपि न वाञ्छन्ति यथा पुत्रस्य बन्धनम् ।
Summary
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People do not desire the friendship of a father, a benefactor, or even a protector, just as a son does not desire captivity.
सारांश
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लोग किसी हितैषी मित्र, पिता या रक्षक को उतना नहीं चाहते, जितना पुत्र के मोह रूपी बंधन को चाहते हैं।
पदच्छेदः
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| सौहृदस्य | सौहृद (६.१) | of a friend |
| न | न | not |
| वाञ्छन्ति | वाञ्छन्ति (√वाञ्छ् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | desire |
| जनकस्य | जनक (६.१) | of a father |
| हितस्य | हित (६.१) | of a benefactor |
| च | च | and |
| लोकाः | लोक (१.३) | people |
| प्रपालकस्य | प्रपालक (६.१) | of a protector |
| अपि | अपि | even |
| यथा | यथा | just as |
| पुत्रस्य | पुत्र (६.१) | of a son |
| बन्धनम् | बन्धन (२.१) | bondage, attachment |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सौ | हृ | द | स्य | न | वा | ञ्छ | न्ति |
| ज | न | क | स्य | हि | त | स्य | च |
| लो | काः | प्र | पा | ल | क | स्या | पि |
| य | था | पु | त्र | स्य | ब | न्ध | नम् |
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