४.१
नवप्रवालोद्गमसस्यरम्यः
प्रफुल्ललोध्रः परिपक्वशालिः ।
विलीनपद्मः प्रपतत्तुषारो
हेमन्तकालः समुपागतोऽयम् ॥
प्रफुल्ललोध्रः परिपक्वशालिः ।
विलीनपद्मः प्रपतत्तुषारो
हेमन्तकालः समुपागतोऽयम् ॥
Summary
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This Hemanta (early winter) season has arrived—lovely with its crops of fresh sprouts, with Lodhra trees in full bloom, with rice fully ripened, with lotuses withered, and with falling dew.
सारांश
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नयी कोपलों और फसलों से रमणीय, खिले हुए लोध्र वृक्षों, पकी हुई धान की बालियों, कुम्हलाए हुए कमलों और गिरती ओस वाला यह हेमन्त काल आ गया है।
४.२
मनोहरैश्चन्दनरागगौरै-
स्तुषारकुन्देन्दुनिभैश्च हारैः ।
विलासिनीनां स्तनशालिनीनां
नालंक्रियन्ते स्तनमण्डलानि ॥
स्तुषारकुन्देन्दुनिभैश्च हारैः ।
विलासिनीनां स्तनशालिनीनां
नालंक्रियन्ते स्तनमण्डलानि ॥
Summary
AI
The breasts of playful women, which are naturally prominent, are no longer adorned with necklaces—however charming, white with sandalwood paste, and resembling dew, jasmine, and the moon—because the cold makes such adornments unwelcome.
सारांश
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सुंदर और पुष्ट स्तनों वाली विलासिनी स्त्रियाँ अब अपने वक्षस्थल को चंदन के लेप और ओस, कुन्द या चन्द्रमा के समान धवल हारों से अलंकृत नहीं कर रही हैं।
४.३
न बाहुयुग्मेषु विलासिनीनां
प्रयान्ति सङ्गं वलयाङ्गदानि ।
नितम्बबिम्बेषु नवं दुकूलं
तन्वंशुकं पीनपयोधरेषु ॥
प्रयान्ति सङ्गं वलयाङ्गदानि ।
नितम्बबिम्बेषु नवं दुकूलं
तन्वंशुकं पीनपयोधरेषु ॥
Summary
AI
Bracelets and armlets no longer find a place on the arms of playful women. Similarly, new silk garments are not worn on their hips, nor fine fabrics on their full breasts, due to the cold of the season.
सारांश
AI
विलासिनी स्त्रियों की भुजाओं में अब कंगन और बाजूबंद शोभा नहीं पा रहे हैं, न ही उनके नितम्बों पर रेशमी वस्त्र और पुष्ट स्तनों पर महीन दुपट्टे शोभा दे रहे हैं।
४.४
काञ्चीगुणैः काञ्चनरत्नचित्रै-
र्नो भूषयन्ति प्रमदा नितम्बान् ।
न नूपुरैर्हंसरुतं भजद्भिः
पादाम्बुजान्यम्बुजकान्तिभाञ्जि ॥
र्नो भूषयन्ति प्रमदा नितम्बान् ।
न नूपुरैर्हंसरुतं भजद्भिः
पादाम्बुजान्यम्बुजकान्तिभाञ्जि ॥
Summary
AI
Women no longer adorn their hips with girdles studded with gold and gems, nor their lotus-like feet, which possess the beauty of lotuses, with anklets that imitate the cooing of swans.
सारांश
AI
युवतियाँ अब अपने नितम्बों को स्वर्ण और रत्नों से जड़ित करधनी से सुसज्जित नहीं कर रही हैं और न ही हंसों के समान शब्द करने वाले नूपुरों से अपने कमल जैसे चरणों को सजा रही हैं।
४.५
गात्राणि कालीयकचर्चितानि
सपत्त्रलेखानि मुखाम्बुजानि ।
शिरांसि कालागुरुधूपितानि
कुर्वन्ति नार्यः सुरतोत्सवाय ॥
सपत्त्रलेखानि मुखाम्बुजानि ।
शिरांसि कालागुरुधूपितानि
कुर्वन्ति नार्यः सुरतोत्सवाय ॥
Summary
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For the festival of love, women anoint their limbs with saffron paste, paint decorative patterns on their lotus-like faces, and perfume their hair with the smoke of dark aloe-wood.
सारांश
AI
रति-उत्सव के लिए स्त्रियाँ अपने शरीर पर कालीयक का लेप लगाती हैं, मुख पर पत्रलेखा बनाती हैं और अपने केशों को काले अगरु की धूप से सुवासित करती हैं।
४.६
रतिश्रमक्षामविपाण्डुवक्त्राः
सम्प्राप्तहर्षाभ्युदयास्तरुण्यः ।
हसन्ति नोच्चैर्दशनाग्रभिन्ना-
न्प्रपीड्यमानानधरानवेक्ष्य ॥
सम्प्राप्तहर्षाभ्युदयास्तरुण्यः ।
हसन्ति नोच्चैर्दशनाग्रभिन्ना-
न्प्रपीड्यमानानधरानवेक्ष्य ॥
Summary
AI
Young women, their faces pale and weary from the exertions of love-making, yet experiencing a surge of joy, do not laugh loudly upon seeing their own lips, which are being pressed and marked by their teeth to suppress their laughter.
सारांश
AI
रति-क्रीड़ा की थकान से पीले मुख वाली और हर्षित युवतियाँ, दांतों से कटे और पीड़ा देते हुए अपने अधरों को देखकर अब ऊँचे स्वर में नहीं हँसती हैं।
४.७
पीनस्तनोरःस्थलभागशोभा-
मासाद्य तत्पीडनजातखेदः ।
तृणाग्रलग्नैस्तुहिनैः पतद्भि-
राक्रन्दतीवोषसि शीतकालः ॥
मासाद्य तत्पीडनजातखेदः ।
तृणाग्रलग्नैस्तुहिनैः पतद्भि-
राक्रन्दतीवोषसि शीतकालः ॥
Summary
AI
The cold season, having attained the beauty of the region of women's full breasts and then feeling sorrow from pressing against them, seems to weep at dawn through the falling dewdrops clinging to the tips of grass blades.
सारांश
AI
पुष्ट स्तनों वाले वक्षस्थल की शोभा पाकर और फिर उनके मर्दन से पीड़ित हुआ यह शीतकाल, घास की नोकों पर जमी ओस की गिरती बूंदों के रूप में मानो प्रातःकाल रो रहा है।
४.८
प्रभूतशालिप्रसवैश्चितानि
मृगाङ्गनायूथविभूषितानि ।
मनोहरक्रौञ्चनिनादितानि
सीमान्तराण्युत्सुकयन्ति चेतः ॥
मृगाङ्गनायूथविभूषितानि ।
मनोहरक्रौञ्चनिनादितानि
सीमान्तराण्युत्सुकयन्ति चेतः ॥
Summary
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The borderlands, covered with abundant rice blossoms, adorned by herds of female deer, and filled with the charming calls of curlews, make the heart eager and restless.
सारांश
AI
प्रचुर धान की बालियों से लदे हुए, मृगियों के झुंडों से सुशोभित और क्रौंच पक्षियों के मधुर कलरव से गूंजते हुए खेतों के सीमांत मन को उत्सुक कर रहे हैं।
४.९
प्रफुल्लनीलोत्पलशोभितानि
सोन्मादकादम्बविभूषितानि ।
प्रसन्नतोयानि सुशीतलानि
सरांसि चेतांसि हरन्ति पुंसाम् ॥
सोन्मादकादम्बविभूषितानि ।
प्रसन्नतोयानि सुशीतलानि
सरांसि चेतांसि हरन्ति पुंसाम् ॥
Summary
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Lakes, beautified with blooming blue lotuses, adorned with intoxicated Kadamba birds, filled with clear and very cool water, captivate the minds of men.
सारांश
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खिले हुए नीलकमलों से सुशोभित, मदमस्त कदम्ब पक्षियों से युक्त, निर्मल जल वाले और अत्यंत शीतल सरोवर पुरुषों के चित्त को हर रहे हैं।
४.१०
मार्गं समीक्ष्यातिनिरस्तनीरं
प्रवासखिन्नं पतिमुद्वहन्त्यः ।
अवेक्ष्यमाणा हरिणेक्षणाक्ष्यः
प्रबोधयन्तीव मनोरथानि ॥
प्रवासखिन्नं पतिमुद्वहन्त्यः ।
अवेक्ष्यमाणा हरिणेक्षणाक्ष्यः
प्रबोधयन्तीव मनोरथानि ॥
Summary
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The deer-eyed women, seeing the road completely free of water and looking at their husbands weary from travel, seem to awaken their desires as they support them.
सारांश
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सूखे मार्गों को देखती हुई और विदेश से लौटने वाले अपने थके हुए पतियों की प्रतीक्षा करती हुई मृगनयनी स्त्रियाँ अपनी चितवन से मानो कामेच्छाओं को जगा रही हैं।
४.११
पाकं व्रजन्ती हिमजातशीतै-
राधूयमाना सततं मरुद्भिः ।
प्रिये प्रियङ्गुः प्रियविप्रयुक्ता
विपाण्डुतां याति विलासिनीव ॥
राधूयमाना सततं मरुद्भिः ।
प्रिये प्रियङ्गुः प्रियविप्रयुक्ता
विपाण्डुतां याति विलासिनीव ॥
Summary
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O dear one, the Priyangu creeper, constantly shaken by winds cold from the snow and now ripening, turns pale, just like a playful woman separated from her beloved.
सारांश
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ओस के कारण शीतल हवाओं से निरंतर झकझोरी जाती और पकती हुई प्रियंगु लता, अपने प्रियतम से बिछड़ी हुई किसी विरहिणी स्त्री के समान पीली पड़ती जा रही है।
४.१२
पुष्पासवामोदसुगन्धिवक्त्रो
निःश्वासवातैः सुरभीकृताङ्गः ।
परस्पराङ्गव्यतिषङ्गशायी
शेते जनः कामरसानुविद्धः ॥
निःश्वासवातैः सुरभीकृताङ्गः ।
परस्पराङ्गव्यतिषङ्गशायी
शेते जनः कामरसानुविद्धः ॥
Summary
AI
People, pierced by the essence of love, sleep while embracing each other. Their mouths are fragrant with the scent of flower-wine, and their bodies are perfumed by each other's breath.
सारांश
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फूलों के आसव की गंध से सुवासित मुख वाले और साँसों की सुगंध से महकते अंगों वाले लोग, काम-रस में डूबे हुए एक-दूसरे के अंगों से लिपटकर सो रहे हैं।
४.१३
दन्तच्छदैः सव्रणदन्तचिह्नैः
स्तनैश्च पाण्यग्रकृताभिलेखैः ।
संसूच्यते निर्दयमङ्गनानां
रतोपभोगो नवयौवनानाम् ॥
स्तनैश्च पाण्यग्रकृताभिलेखैः ।
संसूच्यते निर्दयमङ्गनानां
रतोपभोगो नवयौवनानाम् ॥
Summary
AI
The merciless lovemaking of young women is indicated by their lips bearing the marks of teeth-inflicted wounds, and by their breasts marked with nail-scratches.
सारांश
AI
नवयुवती स्त्रियों के होंठों पर दांतों के घाव और स्तनों पर नखों के निशान उनके निर्दयतापूर्वक किए गए रति-उपभोग को स्पष्ट रूप से सूचित कर रहे हैं।
४.१४
काचिद्विभूषयति दर्पणसक्तहस्ता
बालातपेषु वनिता वदनारविन्दम् ।
दन्तच्छदं प्रियतमेन निपीतसारं
दन्ताग्रभिन्नमवकृष्य निरीक्षते च ॥
बालातपेषु वनिता वदनारविन्दम् ।
दन्तच्छदं प्रियतमेन निपीतसारं
दन्ताग्रभिन्नमवकृष्य निरीक्षते च ॥
Summary
AI
A certain woman, holding a mirror in her hand, adorns her lotus-like face in the morning sun. She also pulls down her lower lip, whose essence was drunk by her beloved and which was bitten by his teeth, and inspects it.
सारांश
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कोई युवती हाथ में दर्पण लिए सुबह की धूप में अपने मुख-कमल को सजा रही है और अपने प्रियतम द्वारा चूसे गए तथा दांतों से कटे हुए अपने निचले होंठ को बार-बार देख रही है।
४.१५
अन्या प्रकामसुरतश्रमखिन्नदेहा
रात्रिप्रजागरविपाटलनेत्रपद्मा ।
स्रस्तांसदेशललिताकुलकेशपाशा
निद्रां प्रयाति मृदुसूर्यकराभितप्ता ॥
रात्रिप्रजागरविपाटलनेत्रपद्मा ।
स्रस्तांसदेशललिताकुलकेशपाशा
निद्रां प्रयाति मृदुसूर्यकराभितप्ता ॥
Summary
AI
Another woman, her body weary from intense lovemaking, her lotus-like eyes reddish from staying awake all night, and her mass of beautiful, dishevelled hair falling over her shoulders, goes to sleep, warmed by the gentle rays of the sun.
सारांश
AI
अत्यधिक रति-श्रम से थकी हुई, रात्रि-जागरण के कारण लाल नेत्रों वाली और कंधों पर बिखरे हुए बालों वाली कोई अन्य स्त्री सुबह की मंद धूप में सो रही है।
४.१६
निर्माल्यदाम परिभुक्तमनोज्ञगन्धं
मूर्ध्नोऽपनीय घननीलशिरोरुहान्ताः ।
पीनोन्नतस्तनभरानतगात्रयष्ट्यः
कुर्वन्ति केशरचनामपरास्तरुण्यः ॥
मूर्ध्नोऽपनीय घननीलशिरोरुहान्ताः ।
पीनोन्नतस्तनभरानतगात्रयष्ट्यः
कुर्वन्ति केशरचनामपरास्तरुण्यः ॥
Summary
AI
Other young women, their slender bodies bent by their plump, high breasts, remove used garlands—whose pleasing fragrance has been enjoyed—from their heads. With the ends of their dense, dark hair now free, they arrange their hair.
सारांश
AI
अन्य युवतियाँ, जो पुष्ट स्तनों के भार से झुकी हुई हैं, अपने घने काले बालों से बासी मालाएँ हटाकर अब अपने केशों का नया विन्यास बना रही हैं।
४.१७
अन्या प्रियेण परिभुक्तमवेक्ष्य गात्रं
हर्षान्विता विरचिताधरचारुशोभा ।
कूर्पासकं परिदधाति नखक्षताङ्गी
व्यालम्बिनीलललितालककुञ्चिताक्षी ॥
हर्षान्विता विरचिताधरचारुशोभा ।
कूर्पासकं परिदधाति नखक्षताङ्गी
व्यालम्बिनीलललितालककुञ्चिताक्षी ॥
Summary
AI
Another woman, her limbs marked by her lover's nails and her eyes framed by charming dark curls, looks at her body enjoyed by her beloved. Filled with joy, she enhances the beauty of her lips and puts on a bodice.
सारांश
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कोई अन्य स्त्री अपने प्रिय द्वारा उपभोग किए गए अंगों को देखकर हर्षित है और अपने अधरों को सजाकर, नख-क्षतों को ढकने के लिए चोली पहन रही है।
४.१८
अन्याश्चिरं सुरतकेलिपरिश्रमेण
खेदं गताः प्रशिथिलीकृतगात्रयष्ट्यः ।
संहृष्यमाणपुलकोरुपयोधरान्ता
अभ्यञ्जनं विदधति प्रमदाः सुशोभाः ॥
खेदं गताः प्रशिथिलीकृतगात्रयष्ट्यः ।
संहृष्यमाणपुलकोरुपयोधरान्ता
अभ्यञ्जनं विदधति प्रमदाः सुशोभाः ॥
Summary
AI
Other very beautiful women, fatigued by the long exertion of love-play, their slender bodies languid, anoint themselves. The regions of their thighs and breasts are still thrilling with goosebumps.
सारांश
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चिरकाल तक रति-क्रीड़ा के श्रम से थकी हुई और शिथिल अंगों वाली अन्य सुंदरी स्त्रियाँ, पुलकित शरीर के साथ अपने अंगों पर तेल का उबटन लगा रही हैं।
४.१९
बहुगुणरमणीयो योषितां चित्तहारी
परिणतबहुशालिव्याकुलग्रामसीमा ।
विनिपतिततुषारः क्रौञ्चनादोपगीतः
प्रदिशतु हिमयुक्तः काल एषः सुखं वः ॥
परिणतबहुशालिव्याकुलग्रामसीमा ।
विनिपतिततुषारः क्रौञ्चनादोपगीतः
प्रदिशतु हिमयुक्तः काल एषः सुखं वः ॥
Summary
AI
May this dewy season—delightful with many qualities, stealing the minds of women, with village boundaries filled with abundant ripe rice, covered in fallen frost, and heralded by the cries of curlews—grant you happiness.
सारांश
AI
अनेक गुणों से रमणीय, स्त्रियों के मन को हरने वाला, पकी हुई धान की बालियों से युक्त खेतों वाला, गिरती ओस और क्रौंच के स्वर से गुंजायमान यह हिमकाल आप सबको सुख प्रदान करे।
॥ इति चतुर्थः सर्गः ॥
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