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काचिद्विभूषयति दर्पणसक्तहस्ता
बालातपेषु वनिता वदनारविन्दम् ।
दन्तच्छदं प्रियतमेन निपीतसारं
दन्ताग्रभिन्नमवकृष्य निरीक्षते च ॥

अन्वयः AI दर्पणसक्तहस्ता काचित् वनिता बालातपेषु वदनारविन्दं विभूषयति, च प्रियतमेन निपीतसारं दन्ताग्रभिन्नं दन्तच्छदम् अवकृष्य निरीक्षते।
Summary AI A certain woman, holding a mirror in her hand, adorns her lotus-like face in the morning sun. She also pulls down her lower lip, whose essence was drunk by her beloved and which was bitten by his teeth, and inspects it.
सारांश AI कोई युवती हाथ में दर्पण लिए सुबह की धूप में अपने मुख-कमल को सजा रही है और अपने प्रियतम द्वारा चूसे गए तथा दांतों से कटे हुए अपने निचले होंठ को बार-बार देख रही है।
पदच्छेदः AI
काचित्किम् (१.१) a certain
विभूषयतिविभूषयति (वि√भूष् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) adorns
दर्पणसक्तहस्तादर्पणसक्त (√सञ्ज्+क्त)हस्त (१.१) with a mirror held in hand
बालातपेषुबालआतप (७.३) in the morning sun
वनितावनिता (१.१) woman
वदनारविन्दम्वदनअरविन्द (२.१) her lotus-like face
दन्तच्छदम्दन्तच्छद (२.१) her lip
प्रियतमेनप्रियतम (३.१) by her beloved
निपीतसारम्निपीत (नि√पा+क्त)सार (२.१) whose essence was drunk
दन्ताग्रभिन्नम्दन्तअग्रभिन्न (√भिद्+क्त, २.१) bitten by the tip of a tooth
अवकृष्यअवकृष्य (अव√कृष्+ल्यप्) having pulled down
निरीक्षतेनिरीक्षते (निर्√ईक्ष् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) inspects
and
छन्दः वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३ १४
का चि द्वि भू ति र्प क्त स्ता
बा ला पे षु नि ता ना वि न्दम्
न्त च्छ दं प्रि मे नि पी सा रं
न्ता ग्र भि न्न कृ ष्य नि री क्ष ते
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