रम्याणि वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दा-
न्पर्युत्सुको भवति यत्सुखितोऽपि जन्तुः ।
तच्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्वं
भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि ॥
रम्याणि वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दा-
न्पर्युत्सुको भवति यत्सुखितोऽपि जन्तुः ।
तच्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्वं
भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि ॥
न्पर्युत्सुको भवति यत्सुखितोऽपि जन्तुः ।
तच्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्वं
भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि ॥
अन्वयः
AI
सुखितः अपि जन्तुः रम्याणि वीक्ष्य मधुराण् शब्दान् च निशम्य यत् पर्युत्सुकः भवति, तत् (सः) चेतसा अबोधपूर्वम् भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि नूनम् स्मरति।
Summary
AI
When a person, even if happy, becomes wistful on seeing beautiful things and hearing sweet sounds, it is because their mind unconsciously remembers friendships from past lives, which are firmly rooted in their inner nature.
पदच्छेदः
AI
| रम्याणि | रम्य (२.३) | beautiful things |
| वीक्ष्य | वीक्ष्य (वि√ईक्ष्+ल्यप्) | having seen |
| मधुरान् | मधुर (२.३) | sweet |
| च | च | and |
| निशम्य | निशम्य (नि√शम्+ल्यप्) | having heard |
| शब्दान् | शब्द (२.३) | sounds |
| पर्युत्सुकः | पर्युत्सुक (१.१) | wistful |
| भवति | भवति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | becomes |
| यत् | यत् | that |
| सुखितः | सुखित (१.१) | happy |
| अपि | अपि | even |
| जन्तुः | जन्तु (१.१) | a person |
| तत् | तत् | then |
| चेतसा | चेतस् (३.१) | with the mind |
| स्मरति | स्मरति (√स्मृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | remembers |
| नूनम् | नूनम् | surely |
| अबोधपूर्वम् | अबोध–पूर्व (२.१) | unconsciously |
| भावस्थिराणि | भाव–स्थिर (२.३) | firmly rooted in the nature |
| जननान्तरसौहृदानि | जननान्तर–सौहृद (२.३) | friendships of past lives |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| र | म्या | णि | वी | क्ष्य | म | धु | रां | श्च | नि | श | म्य | श | ब्दा |
| न्प | र्यु | त्सु | को | भ | व | ति | य | त्सु | खि | तो | ऽपि | ज | न्तुः |
| त | च्चे | त | सा | स्म | र | ति | नू | न | म | बो | ध | पू | र्वं |
| भा | व | स्थि | रा | णि | ज | न | ना | न्त | र | सौ | हृ | दा | नि |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.