जगति तिमिरं मूर्च्छामब्जव्रजेऽपि चिकित्सतः
पितुरिव निजाद्दस्रावस्मादधीत्य भिषाज्यतः ।
अपिच शमनस्यासौ तातस्ततः किमु नौचिती
यदयमदयः कह्लाराणामुदेत्यपमृत्यवे ॥
जगति तिमिरं मूर्च्छामब्जव्रजेऽपि चिकित्सतः
पितुरिव निजाद्दस्रावस्मादधीत्य भिषाज्यतः ।
अपिच शमनस्यासौ तातस्ततः किमु नौचिती
यदयमदयः कह्लाराणामुदेत्यपमृत्यवे ॥
पितुरिव निजाद्दस्रावस्मादधीत्य भिषाज्यतः ।
अपिच शमनस्यासौ तातस्ततः किमु नौचिती
यदयमदयः कह्लाराणामुदेत्यपमृत्यवे ॥
अन्वयः
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असौ (सूर्यः) निजात् पितुः इव अस्मात् (सूर्यात्) अधीत्य भिषाज्यतः दस्रौ इव, जगति तिमिरम् अब्ज-व्रजे मूर्च्छाम् अपि चिकित्सति । अपि च असौ शमनस्य तातः । ततः अयम् अदयः कह्लाराणाम् अपमृत्यवे उदेति इति यत्, (तत्र) किमु न औचिती?
Summary
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Like the two Asvins who learned medicine from him, this sun acts as a physician, curing the world's darkness and the lotuses' fainting spell. Moreover, he is the father of Yama, the god of death. Therefore, is it not entirely proper that this merciless one rises to cause the untimely death of the white water-lilies?
पदच्छेदः
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| जगति | जगत् (७.१) | in the world |
| तिमिरम् | तिमिर (२.१) | darkness |
| मूर्च्छाम् | मूर्च्छा (२.१) | fainting spell |
| अब्जव्रजे | अब्ज–व्रज (७.१) | in the multitude of lotuses |
| अपि | अपि | also |
| चिकित्सतः | चिकित्सत् (√कित्+सन्+शतृ, १.१) | treating/curing |
| पितुः | पितृ (६.१) | of the father |
| इव | इव | like |
| निजात् | निज (५.१) | from his own |
| दस्रौ | दस्र (१.२) | the two Asvins |
| अस्मात् | इदम् (५.१) | from this (sun) |
| अधीत्य | अधीत्य (अधि√इ+ल्यप्) | having learned |
| भिषाज्यतः | भिषाज्यत् (√भिषज्+क्यच्+शतृ, १.२) | acting as physicians |
| अपिच | अपि–च | and also |
| शमनस्य | शमन (६.१) | of Yama |
| असौ | अदस् (१.१) | he |
| तातः | तात (१.१) | father |
| ततः | ततः | therefore |
| किमु | किमु | what |
| नौचिती | न–औचिती (१.१) | is it not proper? |
| यत् | यद् | that |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| अदयः | अदय (१.१) | merciless |
| कह्लाराणाम् | कह्लार (६.३) | of the white water-lilies |
| उदेति | उदेति (उद्√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | rises |
| अपमृत्यवे | अपमृत्यु (४.१) | for untimely death |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | ग | ति | ति | मि | रं | मू | र्च्छा | म | ब्ज | व्र | जे | ऽपि | चि | कि | त्स | तः |
| पि | तु | रि | व | नि | जा | द्द | स्रा | व | स्मा | द | धी | त्य | भि | षा | ज्य | तः |
| अ | पि | च | श | म | न | स्या | सौ | ता | त | स्त | तः | कि | मु | नौ | चि | ती |
| य | द | य | म | द | यः | क | ह्ला | रा | णा | मु | दे | त्य | प | मृ | त्य | वे |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
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