इह न कतमश्चित्रं धत्ते तमिस्रततीर्दिशा-
मपि चतसृणामुत्सङ्गेषु श्रिता धयतां क्षणात् ।
तरुशरणतामेत्य च्छायामयं निवसत्तमः
शमयितुमभूदानैश्वर्यं यदर्यमरोचिषाम् ॥
इह न कतमश्चित्रं धत्ते तमिस्रततीर्दिशा-
मपि चतसृणामुत्सङ्गेषु श्रिता धयतां क्षणात् ।
तरुशरणतामेत्य च्छायामयं निवसत्तमः
शमयितुमभूदानैश्वर्यं यदर्यमरोचिषाम् ॥
मपि चतसृणामुत्सङ्गेषु श्रिता धयतां क्षणात् ।
तरुशरणतामेत्य च्छायामयं निवसत्तमः
शमयितुमभूदानैश्वर्यं यदर्यमरोचिषाम् ॥
अन्वयः
AI
इह कतमत् चित्रम् न (अस्ति)? यत् अर्यम-रोचिषाम्, चतसृणाम् दिशाम् उत्सङ्गेषु श्रिताः तमिस्र-ततीः क्षणात् धयताम् (अपि), तरु-शरणताम् एत्य निवसत् छाया-मयम् तमः शमयितुम् आनैश्वर्यम् अभूत् ।
Summary
AI
What wonder is there in this? That the rays of the sun, while in a moment dispelling the stretches of darkness resting in the laps of the four directions, were powerless to destroy the darkness in the form of shade that resides having taken refuge under the trees.
पदच्छेदः
AI
| इह | इह | here |
| न | न | not |
| कतमत् | कतम (१.१) | which |
| चित्रम् | चित्र (१.१) | wonder |
| धत्ते | धत्ते (√धा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is there |
| तमिस्रततीः | तमिस्र–तति (२.३) | the stretches of darkness |
| दिशाम् | दिश् (६.३) | of the directions |
| अपि | अपि | even |
| चतसृणाम् | चतुर् (६.३) | of the four |
| उत्सङ्गेषु | उत्सङ्ग (७.३) | in the laps |
| श्रिताः | श्रिता (√श्रि+क्त, २.३) | resting |
| धयताम् | धयत् (√धे+शतृ, ६.३) | of those who drink/dispel |
| क्षणात् | क्षण (५.१) | in a moment |
| तरुशरणताम् | तरु–शरणता (२.१) | the state of taking refuge in trees |
| एत्य | एत्य (आ√इ+ल्यप्) | having reached |
| छायामयं | छायामय (२.१) | consisting of shade |
| निवसत्तमः | निवसत् (√नि-वस्+शतृ)–तमस् (२.१) | the residing darkness |
| शमयितुम् | शमयितुम् (√शम्+णिच्+तुमुन्) | to destroy |
| अभूत् | अभूत् (√भू कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | there was |
| आनैश्वर्यम् | आनैश्वर्य (१.१) | powerlessness |
| यत् | यद् | that |
| अर्यमरोचिषाम् | अर्यमन्–रोचिस् (६.३) | of the rays of the sun |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ह | न | क | त | म | श्चि | त्रं | ध | त्ते | त | मि | स्र | त | ती | र्दि | शा |
| म | पि | च | त | सृ | णा | मु | त्स | ङ्गे | षु | श्रि | ता | ध | य | तां | क्ष | णात् |
| त | रु | श | र | ण | ता | मे | त्य | च्छा | या | म | यं | नि | व | स | त्त | मः |
| श | म | यि | तु | म | भू | दा | नै | श्व | र्यं | य | द | र्य | म | रो | चि | षाम् |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.